बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1157, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४३ |
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| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रव्रजिष्यन्नस्मीति तच्चकार विजहार प्रव्रजितवानित्यर्थः । | की थी कि मैं परिव्राजक (संन्यासी) होनेवाला हूँ वही किया अर्थात् परिव्राजक हो गये । |
| परिसमाप्ता ब्रह्मविद्या संन्यासपर्यवसाना । एतावानुपदेशः, एतद् वेदानुशासनम्, एषा परमनिष्ठा, एष पुरुषार्थकर्तव्यतान्त इति । | इस प्रकार जिसका संन्यासमें पर्यवसान हुआ है, वह ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । इतना ही उपदेश है, यही वेदकी आज्ञा है, यही परमनिष्ठा है और यही पुरुषार्थ अर्थात् कर्तव्यताका अन्त है । |
| इदानीं विचार्यते शास्त्रार्थशास्त्रार्थपरामर्शो विवेकप्रतिपत्तये । मिथोविरुद्धवच- यत आकुलानि हि नोपन्यासश्च वाक्यानि दृश्यन्ते—<br>“यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्”<br>“यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत” “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” (ईश० २) “एतद् वै जरामर्यं सत्रं यदग्निहोत्रम्” (महानारा० २५ । १) इत्यादीन्येकाश्रम्यज्ञापकानि, अन्यानि चाश्रमान्तरप्रतिपादकानि वाक्यानि—<br>“विदित्वा व्युत्थाय प्रव्रजन्ति”<br>“ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्” (जाबालोप० ४) “यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा” | अब शास्त्रके तात्पर्यका विवेकज्ञान होनेके लिये विचार किया जाता है, क्योंकि परस्परविरोधी वाक्य देखे जाते हैं— “जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र करे”, “जीवनपर्यन्त दर्शपूर्ण-मासद्वारा यजन करे”, “इस लोकमें कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे”, “यह जो अग्निहोत्र है, जरामरणपर्यन्त होनेवाला सत्र है” इत्यादि वाक्य गार्हस्थ्यरूप एक ही आश्रमके ज्ञापक हैं और इनके सिवा दूसरे वाक्य अन्य आश्रमके प्रतिपादक हैं— “ज्ञान होनेपर गृहस्थाश्रमसे ऊँचे उठकर परिव्राजक हो जाते हैं”, “ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थाश्रमी बने और गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर परिव्राजक हो जाय”, “अथवा इसके विपरीत ब्रह्मचर्यसे, गृहसे या वनसे ही परिव्राजक |