भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1156, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1156
११४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

जहाँ [अविद्यावस्थामें] द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यका रसास्वादन करता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका मनन करता है, अन्य अन्यका स्पर्श करता है और अन्य अन्यको विशेषरूपसे जानता है। किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसका रसास्वादन करे, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका मनन करे, किसके द्वारा किसका स्पर्श करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा पुरुष इस सबको जानता है, उसे किस साधनसे जाने ? वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है—उसका ग्रहण नहीं किया जाता, अशीर्य है—उसका विनाश नहीं होता, असङ्ग है—आसक्त नहीं होता, अबद्ध है—वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? इस प्रकार तुझे उपदेश कर दिया गया। अरी मैत्रेयि ! निश्चय जान, इतना ही अमृतत्व है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यजी परिव्राजक (संन्यासी) हो गये ॥ १५ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतावदेतावन्मात्रं यदेतन्नेति नेत्यद्वैतात्मदर्शनमिदं चान्यसहकारिकारणनिरपेक्षमेवारे मैत्रेय्यमृतत्वसाधनम् । यत् पृष्टवत्यसि 'यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूह्यमृतत्वसाधनम्' इति, तदेतावदेवेति विज्ञेयं त्वयेति हैवं किलामृतत्वसाधनमात्मज्ञानं प्रियायै भार्यायै उक्त्वा याज्ञवल्क्यः किं कृतवान् ? यत् पूर्वं प्रतिज्ञातंहे मैत्रेयि ! 'एतावत्'—बस, इतना ही जो कि यह 'नेति नेति' इस प्रकार अद्वैत आत्माका साक्षात्कार करना है, वही किसी दूसरे सहकारी कारणकी अपेक्षासे रहित अमृतत्वका साधन है। तूने जो पूछा था कि श्रीमान् जो अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें,' सो वह साधन इतना ही है—ऐसा तुझे जानना चाहिये। इस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको यह अमृतत्वका साधनरूप आत्मज्ञान बतलाकर याज्ञवल्क्यने क्या किया ? जिसकी उन्होंने पहले प्रतिज्ञा