भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७४०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
प्राण्युपभोगाश्रयाकारपरिणतानि भूतानि संहतानि तान्येव पञ्चेति बहुवचनभाञ्जि।उपभोगके आश्रय (शरीर) के आकारमें परिणत हुए परस्परसंहत वे ही पाँच भूत हैं, इसलिये वे बहुवचनके भागी हैं।
कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति—स होवाच याज्ञवल्क्यो हे गार्गि मातिप्राक्षीः स्वं प्रश्नम्, न्यायप्रकारमतीत्य आगमेन प्रष्टव्यां देवतामनुमानेन मा प्राक्षीरित्यर्थः; पृच्छन्त्याश्च मा ते तव मूर्धा शिरो व्यपप्तद् विस्पष्टं पतेत्; देवतायाः स्वप्रश्न आगमविषयः; तं प्रश्नविषयमतिक्रान्तो गार्ग्याः प्रश्नः; आनुमानिकत्वात् स यस्या देवतायाः प्रश्नः सातिप्रश्न्या, नातिप्रश्न्यानातिप्रश्न्या, स्वप्रश्नविषयैव, केवलागमगम्येत्यर्थः; तामनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि। अतो गार्गि मातिप्राक्षीः,[गार्गी—] 'अच्छा तो, वे ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' इसपर उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! तू अपने प्रश्नको अतिप्रश्न न कर, अर्थात् न्यायोचित प्रकारको छोड़कर आचार्यपरम्पराद्वारा पूछनेयोग्य शास्त्रगम्य देवताको अनुमानसे मत पूछ। इस प्रकार पूछनेसे तेरा मूर्द्धा—मस्तक व्यपतित—विस्पष्टतया पतित न हो जाय!' यह देवताका स्वप्रश्न शास्त्रका विषय है; गार्गीका प्रश्न आनुमानिक होनेके कारण उस प्रश्नविषयका अतिक्रमण कर गया है; यह प्रश्न जिस देवताके विषयमें है, वह अतिप्रश्न्या हो रही है; किंतु वह नातिप्रश्न्या—अतिप्रश्न करनेके अयोग्य अर्थात् अपने प्रश्नकी ही विषय है; तात्पर्य यह है कि 'वह केवल आचार्योपदेशसे शास्त्रद्वारा ही जानी जा सकती है, उस अनतिप्रश्न्या देवताके विषयमें तू अतिप्रश्न करती है। अतः हे गार्गि! यदि तुझे मरनेकी इच्छा न हो तो

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४१

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४१


मर्तुं चेन्नेच्छसि। ततो ह गार्गी वाचक्नवी उपरराम ॥ १ ॥अतिप्रश्न न कर।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये षष्ठं गार्गीब्राह्मणम् ॥ ६ ॥


सप्तम ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-आरुणि-संवाद

इदानीं ब्रह्मलोकानामन्तरतमं सूत्रं वक्तव्यमिति तदर्थ आरम्भः; तच्च आगमेनैव प्रष्टव्यमितीतिहासने आगमोपन्यासः क्रियते—अब ब्रह्मलोकोंका जो अन्तरतम सूत्र है, उसे बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। उसे आगम (आचार्योपदेश) के द्वारा ही विचारना चाहिये, इसलिये इतिहासके द्वारा आगमका उपन्यास किया जाता है—

सूत्र और अन्तर्यामीके विषयमें प्रश्न

अथ हैनमुद्दालक आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेष्ववसाम, पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाँश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत् सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तद् भगवन् वेदेति

७४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकꣳ सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च यो वै तत् काप्य सूत्रं विद्यात्तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स वेदवित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत्तदहं वेद तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वाꣳस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत् सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयाद् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा; वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वद्वारा गृहीत थी। हमने उस (गन्धर्व) से पूछा, 'तू कौन है ?' उसने कहा, 'मैं आथर्वण कबन्ध हूँ।' उसने कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, 'काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो जिसके द्वारा यह लोक, परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं ?' तब उस काप्य पतञ्चलने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको भीतरसे नियमित करता हे ?' उस पतञ्चल काप्यने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा; 'काप्य ! जो कोई उस सूत्र और उस अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्मवेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है।'

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३


तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने उन ( काप्य आदि ) से सूत्र और अन्तर्यामीको बताया। उसे मैं जानता हूँ। हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गौतम ! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ।' [उद्दालक-] 'ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है—'मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ' [ किंतु यों व्यर्थ ढोल पीटनेसे क्या लाभ ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो ] जिस प्रकार तुम जानते हो वह कहो' ॥ १ ॥

अथ हैनमुद्दालको नामतः, अरुणस्यापत्यमारुणिः पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाच; मद्रेषु देशेष्ववसामोषितवन्तः, पतञ्चलस्य—पतञ्चलो नामतस्तस्यैव कपिगोत्रस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयाना यज्ञशास्त्राध्ययनं कुर्वाणाः । तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता; तमपृच्छाम—कोऽसीति; सोऽब्रवीत् कबन्धो नामतः, अथर्वणोऽपत्यमाथर्वण इति ।फिर उस याज्ञवल्क्यसे उद्दालक नामसे प्रसिद्ध आरुणि—अरुणके पुत्रने पूछा। वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें पतञ्चलके—जो नामसे पतञ्चल था उस काप्य-कपिगोत्रीयके घर यज्ञ—यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वसे गृहीत थी [अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था]। उससे हमने पूछा, 'तू कौन है?' उसने कहा, 'मैं नामसे कबन्ध तथा गोत्रतः आथर्वण—अथर्वाका पुत्र हूँ।'
सोऽब्रवीद् गन्धर्वः पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च तच्छिष्यान्— वेत्थ नु त्वं हे काप्य जानीषे तत् सूत्रम् ? किं तत् ? येन सूत्रेणायं च लोक इदं च जन्म, परश्च लोकः परं चउस गन्धर्वने पतञ्चल काप्य और उसके याज्ञिक शिष्योंसे पूछा, 'हे काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो ? वह कौन ? जिस सूत्रके द्वारा यह लोक — यह जन्म, परलोक—

| ७४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [३. अध्याय ३ |

| ७४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [३. अध्याय ३ | | :--- | :--- |

| प्रतिपत्तव्यं जन्म, सर्वाणि च भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि, सन्दब्धानि सङ्ग्रथितानि स्रगिव सूत्रेण विष्टब्धानि भवन्ति येन—तत् किं सूत्रं वेत्थ ? सोऽब्रवीदेवं पृष्टः काप्यः—नाहं तद् भगवन् वेदेति, तत् सूत्रं नाहं जाने हे भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । | आगे प्राप्त होनेवाला जन्म और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूत संदृब्ध—संग्रथित—सूत्रसे मालाके समान सम्यक् प्रकारसे धारण किये हुए हैं, क्या उस सूत्रको तुम जानते हो ?' इस प्रकार पूछे जानेपर उस काप्यने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' 'हे भगवन् !' इस प्रकार सत्कार करते हुए उसने कहा, 'मैं उस सूत्रको नहीं जानता।' | | सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्व उपाध्यायमस्मांश्च—वेत्थ न त्वं काप्य तमन्तर्यामिणम् ? अन्तर्यामीति विशेष्यते—य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरोऽभ्यन्तरः सन् यमयति नियमयति, दारुयन्त्रमिव भ्रामयति, स्वं स्वमुचितव्यापारं कारयतीति । सोऽब्रवीदेवमुक्तः पतञ्चलः काप्यः—नाहं तं जाने भगवन्निति सम्पूजयन्नाह । | 'उस गन्धर्वने उपाध्यायसे और हमसे फिर पूछा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो ?' 'अन्तर्यामी' इस पदका विशेषण बतलाता है—'जो इस लोकको, परलोकको और सम्पूर्ण भूतोंको अन्तर--भीतर रहकर नियमित करता है—काष्ठयन्त्रके समान भ्रमित अर्थात् अपना-अपना उचित व्यापार कराता है [ क्या उसे तुम जानते हो ?]'। इस प्रकार कहे जानेपर उस पतञ्चल काप्यने 'भगवन् !' इस प्रकार सत्कार करते हुए कहा, 'मैं उसे नहीं जानता।' | | सोऽब्रवीत् पुनर्गन्धर्वः; सूत्रतदन्तर्गतान्तर्यामिणोर्विज्ञानं स्तूयते—यः कश्चिद् वै तत् सूत्रं हे काप्य विद्याद् विजानीयात् तं चान्तर्या- | 'उस गन्धर्वने फिर कहा; अब सूत्र और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामीके विज्ञानकी स्तुति की जाती है—'हे काप्य ! तुममेंसे जो कोई भी उस सूत्रको और सूत्रके अन्तर्गत उसी सूत्रके नियन्ता अन्तर्यामीको |

ब्राह्मण ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७४५

ब्राह्मण ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ७४५

| मिणं सूत्रान्तर्गतं तस्यैव सूत्रस्य नियन्तारं विद्यात् यः—इत्येवमुक्तेन प्रकारेण, स हि ब्रह्मवित् परमात्मवित् स लोकांश्च भूरादीनन्तर्यामिणा नियम्यमानाँल्लोकान् वेत्ति, स देवांश्चाग्न्यादीँल्लोकस्थो जानाति, वेदांश्च सर्वप्रमाणभूतान् वेत्ति, भूतानि च ब्रह्मादीनि सूत्रेण ध्रियमाणानि तदन्तर्गतेनान्तर्यामिणा नियम्यमानानि वेत्ति, स आत्मानं च कर्तृत्वभोक्तृत्वविशिष्टं तेनैवान्तर्यामिणा नियम्यमानं वेत्ति, सर्वं च जगत् तथाभूतं वेत्तीति। | उक्त प्रकारसे जान ले वही ब्रह्मवित्—परमात्माको जाननेवाला है; वही अन्तर्यामीसे नियम्यमान भूरादि लोकोंको जानता है, सबके प्रमाणभूत वेदोंको जानता है तथा सूत्रसे धारण किये हुए और उसके अन्तर्वर्ती अन्तर्यामीसे नियमित होते हुए ब्रह्मादि भूतोंको जानता है। वह उस अन्तर्यामीसे ही नियमित होते हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्वविशिष्ट आत्माको जानता है तथा सम्पूर्ण जगत्‌को भी ऐसा ही जानता है।' | | एवं स्तुते सूत्रान्तर्यामिविज्ञाने प्रलुब्धः काप्योऽभिमुखीभूतः, वयं च; तेभ्यश्चास्मभ्यमभिमुखीभूतेभ्योऽब्रवीद् गन्धर्वः सूत्रमन्तर्यामिणं च; तदहं सूत्रान्तर्यामिविज्ञानं वेद गन्धर्वाल्लब्धागमः सन्। तच्चेद् याज्ञवल्क्य सूत्रं तं चान्तर्यामिणमविद्वांश्चेदब्रह्मवित् सन् यदि ब्रह्मगवीरुदजसे ब्रह्मविदां स्वभूता गा उदजसे उन्नयसि त्वम् | 'सूत्र और अन्तर्यामीके विज्ञानकी इस प्रकार स्तुति होनेपर अत्यन्त लुब्ध होकर काप्य और हम उसके अभिमुख हुए; इस प्रकार अपने अभिमुख हुए हमलोगोंके प्रति उस गन्धर्वने सूत्र और अन्तर्यामीका वर्णन किया; सो मैं गन्धर्वसे आचार्योपदेश प्राप्त करके उस सूत्र और अन्तर्यामीके विज्ञानको जानता हूँ; अतः हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले अर्थात् अब्रह्मवित् होकर तुम 'ब्रह्मगवी:'—ब्रह्मवेत्ताओंकी स्वभूता गोओंको अन्यायसे ले जाओगे तो |

७४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| अन्यायेन, ततो मच्छापदग्धस्य मूर्धा शिरस्ते तव विस्पष्टं पतिष्यति। | मेरे शापसे दग्ध तुम्हारा मूर्धा-शिर विस्पष्टतया (निश्चय ही) गिर जायगा।' | | एवमुक्तो याज्ञवल्क्य आह—<br>वेद जानाम्यहं हे गौतमेति गोत्रतः, तत् सूत्रं यद् गन्धर्वस्तुभ्यमुक्तवान् यं चान्तर्यामिणं गन्धर्वाद् विदितवन्तो यूयम्, तं चान्तर्यामिणं वेदाहमिति। | इस प्रकार कहे जानेपर याज्ञवल्क्यने 'हे गौतम!' इस प्रकार गोत्रतः सम्बोधन करते हुए कहा, 'तुम्हारे प्रति गन्धर्वने जिस सूत्रका वर्णन किया है, उसे मैं जानता हूँ तथा तुमलोगोंने जिस अन्तर्यामीको गन्धर्वसे जाना है, उस अन्तर्यामीको भी मैं जानता हूँ।' | | एवमुक्ते प्रत्याह गौतमः—<br>यः कश्चित् प्राकृत इदं यत्त्वयोक्तं ब्रूयात्—कथम् ? वेद वेदेति—आत्मानं श्लाघयन्, किं तेन गर्जितेन कार्येण दर्शय; यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥ | याज्ञवल्क्यके इस प्रकार कहनेपर गौतमने उत्तरमें कहा, 'जो कोई साधारण पुरुष भी ऐसा, जैसा कि तुमने कहा है, कह सकता है; किस प्रकार कह सकता है? 'मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ' इस प्रकार अपनी बड़ाई करता हुआ कह सकता है, परंतु उसके उस गर्जनसे क्या लाभ है? तुम कार्यद्वारा उसे दिखाओ जैसा जानते हो वैसा कहो' ॥ १ ॥ |

सूत्रका निरूपण

स होवाच वायुर्वै गौतम तत् सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७४७

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७४७


सन्दब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेत-
माहुर्व्यस्र्ꣳसिषतास्याङ्गानीति वायुना हि गौतम
सूत्रेण सन्दब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्या-
न्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥

उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गौतम ! वायु ही वह सूत्र है; गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और समस्त भूतसमुदाय गूँथे हुए हैं। हे गौतम ! इसीसे मरे हुए पुरुषको ऐसा कहते हैं कि इसके अङ्ग विस्रस्त (विशीर्ण) हो गये हैं; क्योंकि हे गौतम ! वे वायुरूप सूत्रसे ही संग्रथित होते हैं।' [आरुणि—] 'हे याज्ञवल्क्य ! ठीक है, यह तो ऐसा ही है, अब तुम अन्तर्यामीका वर्णन करो' ॥ २ ॥


| स होवाच याज्ञवल्क्यः। ब्रह्मलोका यस्मिन्नोताश्च प्रोताश्च वर्तमाने काले, यथा पृथिव्यप्सु, तत् सूत्रम् आगमगम्यं वक्तव्यमिति तदर्थं प्रश्नान्तरमुत्थापितम्; अतस्तन्निर्णयायाह—वायुर्वै गौतम तत् सूत्रम्, नान्यत्; वायुरिति सूक्ष्ममाकाशवद्विष्टम्भकं पृथिव्यादीनाम्, यदात्मकं सप्तदशविधं लिङ्गं कर्मवासनासमवायि प्राणिनाम्, यत्तत् समष्टिव्यष्ट्यात्मकम्, यस्य बाह्या भेदाः सप्तसप्त मरुद्गणाः | उस याज्ञवल्क्यने कहा। जिस प्रकार जलमें पृथिवी ओतप्रोत है उसी प्रकार जिसमें वर्तमान कालमें ब्रह्मलोक ओतप्रोत हैं, शास्त्रद्वारा जानने योग्य उस सूत्रका वर्णन करना है, इसीलिये एक अन्य प्रश्न उठाया गया था, उसका निर्णय करनेके लिये याज्ञवल्क्य कहते हैं, 'हे गौतम ! वायु ही वह सूत्र है, और कुछ नहीं।' यहाँ वायु—यह आकाशके समान सूक्ष्म तत्त्व है और पृथिवी आदि भूतोंको धारण करनेवाला है; प्राणियोंका यह कर्म-वासनासमवायी (कर्म-संस्कारसे युक्त) सत्रह अवयवोंवाला लिङ्गदेह जिससे उत्पन्न हुआ है, जो समष्टि एवं व्यष्टिरूप है तथा समुद्रकी तरङ्गोंके समान उन्चास मरुद्गण |

७४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७४८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
समुद्रस्येवोर्मयः, तदेतद् वायव्यं तत्त्वं सूत्रमित्यभिधीयते ।जिसके बाह्य भेद हैं, वह यह वायु-तत्त्व 'सूत्र' कहा जाता है ।
वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दब्धानि भवन्ति सङ्ग्रथितानि भवन्तीति प्रसिद्धमेतत्। अस्ति च लोके प्रसिद्धिः, कथम् ? यस्माद् वायुः सूत्रम्, वायुना विधृतं सर्वम्; तस्माद् वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुः कथयन्ति—व्यस्रंसिषत विस्रस्तान्यस्य पुरुषस्याङ्गानीति; सूत्रापगमे हि मण्यादीनां प्रोतानामवस्रंसनं दृष्टम्; एवं वायुः सूत्रम्, तस्मिन् मणिवत् प्रोतानि यद् यस्याङ्गानि स्युस्ततो युक्तमेतद् वाय्वपगमेऽवस्रंसनमङ्गानाम् अतो वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दब्धानि भवन्तीति निगमयति ।'हे गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत सन्दब्ध—संग्रथित हैं- यह प्रसिद्ध है। लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है, कैसी ? क्योंकि वायु सूत्र है, इसलिये वायुने सबको धारण किया है; इसीसे हे गौतम ! मृत पुरुषके विषयमें ऐसा कहते हैं कि इस पुरुषके अङ्ग विस्रस्त हो गये हैं; यह देखा गया है कि सूत्र (धागे) के न रहनेपर उसमें पिरोये हुए मणि आदि बिखर जाते हैं, इसी प्रकार वायु सूत्र है और यदि उसमें उस प्राणीके अङ्ग मणियोंके समान पिरोये हुए हैं, तो वायुके निवृत्त होनेपर इसके अङ्गोंका विशीर्ण हो जाना उचित ही है; इसीसे याज्ञवल्क्य ऐसा निगमन करते हैं कि 'हे गौतम ! ये वायुरूप सूत्रसे संग्रथित हैं।'
एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सम्यगुक्तं सूत्रम्; तदन्तर्गतं त्विदानीं तस्यैव सूत्रस्य नियन्तारमन्तर्यामिणं ब्रूहीत्युक्त आह ॥ २ ॥[गौतमने कहा—] 'याज्ञवल्क्य ! यह ठीक ऐसा ही है, तुमने सूत्रका यथार्थ वर्णन किया है। अब तुम उसके अन्तर्वर्ती और उस सूत्रके ही नियन्ता अन्तर्यामीका वर्णन करो।' गौतमके ऐसा कहनेपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—॥ २ ॥

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४९

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४९


अन्तर्यामीका निरूपण

यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥

जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शरीर है और जो भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ३ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यः पृथिव्यां तिष्ठन् भवति, सोऽन्तर्यामी, सर्वः पृथिव्यां तिष्ठतीति सर्वत्र प्रसङ्गो मा भूदिति विशिनष्टि—पृथिव्या अन्तरोऽभ्यन्तरः । तत्रैतत् स्यात् पृथिवीदेवतैव अन्तर्यामीत्यत आह—यमन्तर्यामिणं पृथिवी देवतापि न वेद मद्यन्यः कश्चिद्वर्तत इति । यस्य पृथिवी शरीरम्—यस्य च पृथिव्येव शरीरम्, नान्यत्—पृथिवीदेवताया यच्छरीरम्, तदेव शरीरं यस्य; शरीरग्रहणं चोपलक्षणार्थम्, करणं च पृथिव्याः, तस्य स्वकर्मप्रयुक्तंजो पृथिवीमें रहनेवाला है, वह अन्तर्यामी है; किंतु पृथिवीमें तो सभी रहते हैं, अतः इससे सर्वत्र अन्तर्यामीका प्रसङ्ग न हो जाय, इसलिये उसका विशेषण बतलाते हैं—'जो पृथिवीके अन्तर-भीतर है।' इससे यह शङ्का हो सकती है कि पृथिवी देवता ही अन्तर्यामी है, इसलिये फिर कहते हैं—'जिस अन्तर्यामीको पृथिवी देवता भी नहीं जानती कि 'मेरे भीतर और भी कोई है।' जिसका पृथिवी शरीर है अर्थात् पृथिवी ही जिसका शरीर है, कोई और नहीं; यानी जो पृथिवी देवताका शरीर है, वही जिसका शरीर है; यहां 'शरीर' शब्द उपलक्षणार्थक है, अर्थात् केवल शरीर ही नहीं, पृथिवी देवताका जो करण (इन्द्रिय) है, वही उसका करण भी है। पृथिवी

७५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| हि कार्यं करणं च पृथिवीदेवतायाः; तदस्य स्वकर्माभावादन्तर्यामिणो नित्यमुक्तत्वात्।<br><br>परार्थकत्र्तव्यतास्वभावत्वात् परस्य यत् कार्यं करणं च तदेवास्य, न स्वतः; तदाह—यस्य पृथिवी शरीरमिति। | देवताको कार्य और करण (देह और इन्द्रिय) उसके कर्मानुसार प्राप्त हुए हैं; वे ही इस अन्तर्यामीके हैं; क्योंकि नित्यमुक्त होनेके कारण उसके कोई स्वकर्म नहीं हैं। परार्थ-कर्तव्यता—दूसरेके अर्थको करना यह अन्तर्यामीका स्वभाव है, अतः जो दूसरेके देह और इन्द्रिय हैं; वे ही इसके भी हैं, स्वतः इसके कोई देह या इन्द्रिय नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है कि जिसका पृथिवी शरीर है। | | देवताकार्यकरणस्येश्वरसाक्षिमात्रसान्निध्येन हि नियमेन प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्; य ईदृगीश्वरो नारायणाख्यः, पृथिवीं पृथिवीदेवताम्, यमयति नियमयति स्वव्यापारे, अन्तरोऽभ्यन्तरस्तिष्ठन्, एष त आत्मा, ते तव, मम च सर्वभूतानां चेत्युपलक्षणार्थमेतत्; अन्तर्यामी यस्त्वया पृष्टः, अमृतः सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत् ॥ ३ ॥ | देवताके देह और इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति-निवृत्ति साक्षिमात्र ईश्वरके सांनिध्यसे नियमानुसार हुआ करती है, जो ऐसा नारायणसंज्ञक ईश्वर पृथिवीको—पृथिवी देवताको नियमित करता है—पृथिवीके भीतर विद्यमान रहकर अपने व्यापारमें नियुक्त करता है, यह तुम्हारा आत्मा है, तुम्हारा अर्थात् तुम्हारा और मेरा समस्त प्राणियोंका आत्मा है—इस प्रकार 'ते (तुम्हारा)' यह कथन सबके उपलक्षणके लिये है। यही अन्तर्यामी है, जिसके विषयमें तुमने पूछा है और यह अमृत यानी सम्पूर्ण संसार-धर्मोंसे रहित है ॥ ३ ॥ |

ब्राह्मण ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७५१

ब्राह्मण ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ७५१

योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥४॥ योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्निः शरीरं योऽग्निमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥५॥ योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न वेद यस्यान्तरिक्षँ शरीरं योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥६॥ यो वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥ यो दिवि तिष्ठन् दिवोऽन्तरो यं द्यौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥ य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यन्मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥९॥ यो दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो दिशोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥१०॥ यश्चन्द्रतारके तिष्ठँश्चन्द्रतारकादन्तरो यं चन्द्रतारकं न वेद यस्य चन्द्रतारकँ शरीरं यश्चन्द्रतारकमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥११॥ य आकाशे तिष्ठन्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥१२॥ यस्तमसि तिष्ठँस्तमसोऽन्तरो यं तमो

७५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥ यस्तेजसि तिष्ठꣳस्तेजोऽन्तरो यं तेजो न वेद यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥

जो जलमें रहनेवाला जलके भीतर है, जिसे जल नहीं जानता, जल जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर जलका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥४॥ जो अग्निमें रहनेवाला अग्निके भीतर है, जिसे अग्नि नहीं जानता, अग्नि जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अग्निका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥५॥ जो अन्तरिक्षमें रहनेवाला अन्तरिक्षके भीतर है, जिसे अन्तरिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अन्तरिक्षका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥६॥ जो वायुमें रहनेवाला वायुके भीतर है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वायुका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥७॥ जो द्युलोकमें रहनेवाला द्युलोकके भीतर है, जिसे द्युलोक नहीं जानता, द्युलोक जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर द्युलोकका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥८॥ जो आदित्यमें रहनेवाला आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आदित्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥९॥ जो दिशाओंमें रहनेवाला दिशाओंके भीतर है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं और जो भीतर रहकर दिशाओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥१०॥ जो चन्द्रमा और ताराओंमें रहनेवाला चन्द्रमा और ताराओंके भीतर है, जिसे चन्द्रमा और ताराएँ नहीं जानतीं, चन्द्रमा और ताराएँ जिसका

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३


शरीर हैं और जो भातर रहकर चन्द्रमा और ताराओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ११ ॥ जो आकाशमें रहनेवाला आकाशके भीतर है, जिसे आकाश नहीं जानता, आकाश जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आकाशका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १२ ॥ जो तममें रहनेवाला तमके भीतर है, जिसे तम नहीं जानता, तम जिसका शरीर है और जो भोतर रहकर तमका नियमन करता है वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १३ ॥ जो तेजमें रहनेवाला तेजके भीतर है, जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर तेजका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है, यह अधिदैवत-दर्शन हुआ, आगे अधिभूत-दर्शन है ॥ १४ ॥

| समानमन्यत्। योऽप्सु तिष्ठन्—<br>अग्नौ, अन्तरिक्षे, वायौ, दिवि,<br>आदित्ये, दिक्षु, चन्द्रतारके,<br>आकाशे, यस्तमस्यावरणात्मके<br>बाह्ये तमसि, तेजसि तद्विपरीते<br>प्रकाशसामान्ये इत्येवमधिदैवतम्<br>अन्तर्यामिविषयं दर्शनं देवतासु।<br>अथाधिभूतं भूतेषु ब्रह्मादिस्त-<br>म्बपर्यन्तेषु अन्तर्यामिदर्शन-<br>मधिभूतम् ॥ ४-१४ ॥ | शेष सब तृतीय मन्त्रके समान ही<br>है। जो जलमें, अग्निमें, अन्तरिक्षमें,<br>वायुमें, द्युलोकमें, आदित्यमें,<br>दिशाओंमें, चन्द्रमा एवं ताराओंमें<br>और आकाशमें रहनेवाला है; जो<br>तम अर्थात् आवरणात्मक बाह्य<br>तममें, तेज अर्थात् तमसे विपरीत<br>सामान्य प्रकाशमें रहनेवाला है;<br>इस प्रकार यह अन्तर्यामिविषयक<br>अधिदैवत—देवतान्तर्गत दर्शन है,<br>इससे आगे अधिभूत-दर्शन है,<br>ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त<br>भूतोंमें जो अन्तर्यामिदर्शन है, वह<br>अधिभूत-दर्शन है ॥ ४-१४ ॥ |


यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः

बृ० उ० ४८—

७५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥ यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १६॥ यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद यस्य वाक् शरीरं यो वाचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥ यश्चक्षुषि तिष्ठँश्चक्षुषोऽन्तरो यं चक्षुर्न वेद यस्य चक्षुः शरीरं यश्चक्षुरन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १८ ॥ यः श्रोत्रे तिष्ठञ्छ्रोत्रादन्तरो यँ श्रोत्रं न वेद यस्य श्रोत्रँ शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १९ ॥ यो मनसि तिष्ठन् मनसोऽन्तरो यं मनो न वेद यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २० ॥ यस्त्वचि तिष्ठँस्त्वचोऽन्तरो यं त्वङ् न वेद यस्य त्वक् शरीरं यस्त्वचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २१ ॥ यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानँ शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २२ ॥ यो रेतसि तिष्ठन् रेतसोऽन्तरो यँ रेतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेतोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५५

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५५


विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तं ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥

जो समस्त भूतोंमें स्थित रहनेवाला समस्त भूतोंके भीतर है, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, समस्त भूत जिसके शरीर हैं और जो भीतर रहकर समस्त भूतोंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। यह अधिभूतदर्शन है, अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है ॥१५॥ जो प्राणमें रहनेवाला प्राणके भीतर है, जिसे प्राण नहीं जानता, प्राण जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर प्राणका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १६ ॥ जो वाणीमें रहनेवाला वाणीके भीतर है, जिसे वाणी नहीं जानती, वाणी जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वाणीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १७ ॥ जो नेत्रमें रहनेवाला नेत्रके भीतर है, जिसे नेत्र नहीं जानता, नेत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर नेत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १८ ॥ जो श्रोत्रमें रहनेवाला श्रोत्रके भीतर है, जिसे श्रोत्र नहीं जानता, श्रोत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर श्रोत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १६ ॥ जो मनमें रहनेवाला मनके भीतर है, जिसे मन नहीं जानता, मन जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर मनका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ २० ॥ जो त्वक्में रहनेवाला त्वक्‌के भीतर है, जिसे त्वक् नहीं जानती, त्वक् जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर त्वक्का नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ २१ ॥ जो विज्ञानमें रहनेवाला विज्ञानके भीतर है, जिसे विज्ञान नहीं जानता, विज्ञान जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर विज्ञानका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥२२॥ जो वीर्यमें रहनेवाला वीर्यके भीतर है, जिसे वीर्य नहीं जानता, वीर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वीर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। वह दिखायी न

७५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है, मननका विषय न होनेवाला किंतु मनन करनेवाला है और विशेषतया ज्ञात न होनेवाला किंतु विशेषरूपसे जाननेवाला है। यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। इससे भिन्न सब नाशवान् है। इसके पश्चात् अरुणका पुत्र उद्दालक प्रश्न करनेसे निवृत्त हो गया ॥ २३ ॥

| अथाध्यात्मम्—यः प्राणे प्राणवायुसहिते घ्राणे, यो वाचि, चक्षुषि, श्रोत्रे, मनसि, त्वचि, विज्ञाने, बुद्धौ, रेतसि प्रजनने। कस्मात् पुनः कारणात् पृथिव्यादिदेवता महाभागाः सत्यो मनुष्यादिवदात्मनि तिष्ठन्तमात्मनो नियन्तारमन्तर्यामिणं न विदुरित्यत आह—अदृष्टो न दृष्टो न विषयीभूतः चक्षुर्दर्शनस्य कस्यचित्, स्वयं तु चक्षुषि सन्निहितत्वादृशिस्वरूप इति द्रष्टा। | अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—जो प्राणमें—प्राणवायुसहित घ्राणेन्द्रियमें, जो वाणीमें, नेत्रमें, श्रोत्रमें, मनमें, त्वक्में, विज्ञान यानी बुद्धिमें तथा रेत (वीर्य)—प्रजननेन्द्रियमें रहनेवाला है। किंतु पृथिवी आदि [के अधिष्ठाता] देवता बड़े प्रभावशाली होनेपर भी मनुष्यादिके समान अपने भीतर रहनेवाले अपने नियामक अन्तर्यामीको क्यों नहीं जानते ? इसपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—वह अदृष्ट—न देखा हुआ अर्थात् किसीकी भी नेत्रदृष्टिका विषयीभूत नहीं है, किंतु स्वयं नेत्रमें सन्निहित होनेके कारण दर्शनस्वरूप है, इसलिये द्रष्टा है। | | तथाश्रुतः श्रोत्रगोचरत्वमनापन्नः कस्यचित्, स्वयं त्वलुप्तश्रवणशक्तिः सर्वश्रोत्रेषु सन्निहितत्वाच्छ्रोता। तथामतो मनःसङ्कल्प- | इसी प्रकार वह अश्रुत—किसीके भी श्रोत्रकी विषयताको अप्राप्त किंतु स्वयं जिसकी श्रवण-शक्ति लुप्त नहीं होती—ऐसा है और समस्त श्रोत्रोंमें सन्निहित होनेके कारण श्रोता है; ऐसे ही वह अमत-मनके संकल्पोंकी |

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ [७५७

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ [७५७


विषयतामनापन्नः; दृष्टश्रुते एव हि सर्वः सङ्कल्पयति; अदृष्टत्वादश्रुतत्वादेवामतः; अलुप्तमननशक्तित्वात् सर्वमनःसु सन्निहितत्वाच्च मन्ता। तथाविज्ञातो निश्चयगोचरतामनापन्नो रूपादिवत् सुखादिवद्वा, स्वयं त्वलुप्तविज्ञानशक्तित्वात्तत्सन्निधानाच्च विज्ञाता।विषयताको अप्राप्त है; क्योंकि सब लोग देखे-सुने पदार्थोंका ही संकल्प करते हैं, अतः अदृष्ट और अश्रुत होनेके कारण ही वह अमत है; तथा मनन-शक्ति लुप्त न होनेसे और समस्त मनोंमें सन्निहित होनेके कारण वह मन्ता है। इसी तरह अविज्ञात—रूपादि अथवा सुखादिके समान निश्चयकी विषयताको अप्राप्त किंतु स्वयं जिसकी विज्ञान-शक्ति लुप्त नहीं है—ऐसा एवं बुद्धिमें सन्निहित होनेके कारण विज्ञाता है।
तत्र यं पृथिवी न वेद यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति चान्ये नियन्तव्या विज्ञातारोऽन्यो नियन्ता अन्तर्यामीति प्राप्तम्, तदन्यत्वाशङ्कानिवृत्त्यर्थमुच्यते— नान्योऽतः, नान्यः अतोऽस्मादन्तर्यामिणो नान्योऽस्ति द्रष्टा, तथा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता, नान्योऽतोऽस्ति मन्ता, नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता।यहाँ 'जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसे समस्त भूत नहीं जानते' इत्यादि कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि जिनका नियमन किया जाता है, वे विज्ञाता भिन्न हैं और उनका नियमन करनेवाला अन्तर्यामी उनसे भिन्न है। उनके भिन्नत्वकी आशङ्काको निवृत्त करनेके लिये यह कहा जाता है—'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' अर्थात् अतः—इस अन्तर्यामीसे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है। इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, तथा इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है।

७५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| यस्मात् परो नास्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, योऽदृष्टो द्रष्टा, अश्रुतः श्रोता, अमतो मन्ता, अविज्ञातो विज्ञाता, अमृतः सर्वसंसारधर्मवर्जितः सर्वसंसारिणां कर्मफलविभागकर्ता—एष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः अस्मादीश्वरादात्मनोऽन्यदार्तम् । ततो ह उद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ १५–२३ ॥ | जिससे भिन्न कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है, जो दिखायी न देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है; मनका अविषय किंतु मनन करनेवाला है, स्वयं अविज्ञात किंतु विज्ञाता है तथा अमृत—सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित एवं समस्त संसारियोंके कर्मफलोंका विभाग करनेवाला है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है; इस ईश्वर आत्मासे भिन्न और सब आर्त (विनाशी) है। तब अरुणका पुत्र उद्दालक निवृत्त हो गया ॥ १५–२३ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये सप्तममन्तर्यामिब्राह्मणम् ॥ ७ ॥


अष्टम ब्राह्मण

| अतः परमशनायादिविनिर्मुक्तं निरुपाधिकं साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तरं ब्रह्म वक्तव्यमित्यत आरम्भः— | इससे आगे क्षुधादिरहित निरुपाधिक साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर ब्रह्मका निरूपण करना है, इसलिये आरम्भ किया जाता है— |

दो प्रश्न पूछनेके लिये गार्गीका आज्ञा माँगना

अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ता-

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७५९

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७५९


हममं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १॥

फिर वाचक्नवीने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! अब मैं इनसे दो प्रश्न पूछूँगी। यदि ये मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी इन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वादमें नहीं जीत सकेगा।' [ ब्राह्मण-] 'अच्छा गार्गि ! पूछ' ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ ह वाचक्नव्युवाच । पूर्वं याज्ञवल्क्येन निषिद्धा मूर्धपातभयादुपरता सती पुनः प्रष्टुं ब्राह्मणानाज्ञां प्रार्थयते—हे ब्राह्मणा भगवन्तः पूजावन्तः शृणुत मम वचः; हन्ताहमिमं याज्ञवल्क्यं पुनर्द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि, यद्यनुमतिर्भवतामस्ति; तौ प्रश्नौ चेद्यदि वक्ष्यति कथयिष्यति मे, कथञ्चिन्न वै जातु कदाचिद् युष्माकं मध्ये इमं याज्ञवल्क्यं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं ब्रह्मवदनं प्रति जेता न वै कश्चिद् भवेदिति । एवमुक्ता ब्राह्मणा अनुज्ञां प्रददुः—पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥फिर वाचक्नवीने कहा। पहले याज्ञवल्क्यके निषेध करनेपर मस्तक गिर जानेके भयसे मौन हुई वाचक्नवी पुनः प्रश्न करनेके लिये ब्राह्मणोंसे आज्ञा माँगती है—'हे भगवान्—पूजावान् ब्राह्मणगण ! मेरी बात सुनिये; यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो मैं इन याज्ञवल्क्यजीसे दो प्रश्न ओर पूछूँगी। यदि ये उन दो प्रश्नोंका मुझे उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी इन याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्मसम्बन्धी वादमें कभी किसी प्रकार भी जीतनेवाला नहीं हो सकेगा। इस प्रकार कहे जानेपर ब्राह्मणोंने 'हे गार्गि ! तू पूछ' ऐसा कहकर अपनी अनुमति दे दी ॥ १ ॥

सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥