बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 753, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 753
ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३
तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने उन ( काप्य आदि ) से सूत्र और अन्तर्यामीको बताया। उसे मैं जानता हूँ। हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गौतम ! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ।' [उद्दालक-] 'ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है—'मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ' [ किंतु यों व्यर्थ ढोल पीटनेसे क्या लाभ ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो ] जिस प्रकार तुम जानते हो वह कहो' ॥ १ ॥
| अथ हैनमुद्दालको नामतः, अरुणस्यापत्यमारुणिः पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाच; मद्रेषु देशेष्ववसामोषितवन्तः, पतञ्चलस्य—पतञ्चलो नामतस्तस्यैव कपिगोत्रस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयाना यज्ञशास्त्राध्ययनं कुर्वाणाः । तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता; तमपृच्छाम—कोऽसीति; सोऽब्रवीत् कबन्धो नामतः, अथर्वणोऽपत्यमाथर्वण इति । | फिर उस याज्ञवल्क्यसे उद्दालक नामसे प्रसिद्ध आरुणि—अरुणके पुत्रने पूछा। वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें पतञ्चलके—जो नामसे पतञ्चल था उस काप्य-कपिगोत्रीयके घर यज्ञ—यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वसे गृहीत थी [अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था]। उससे हमने पूछा, 'तू कौन है?' उसने कहा, 'मैं नामसे कबन्ध तथा गोत्रतः आथर्वण—अथर्वाका पुत्र हूँ।' |
| सोऽब्रवीद् गन्धर्वः पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च तच्छिष्यान्— वेत्थ नु त्वं हे काप्य जानीषे तत् सूत्रम् ? किं तत् ? येन सूत्रेणायं च लोक इदं च जन्म, परश्च लोकः परं च | उस गन्धर्वने पतञ्चल काप्य और उसके याज्ञिक शिष्योंसे पूछा, 'हे काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो ? वह कौन ? जिस सूत्रके द्वारा यह लोक — यह जन्म, परलोक— |