बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 752, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकꣳ सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च यो वै तत् काप्य सूत्रं विद्यात्तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स वेदवित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत्तदहं वेद तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वाꣳस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत् सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयाद् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥
फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा; वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वद्वारा गृहीत थी। हमने उस (गन्धर्व) से पूछा, 'तू कौन है ?' उसने कहा, 'मैं आथर्वण कबन्ध हूँ।' उसने कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, 'काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो जिसके द्वारा यह लोक, परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं ?' तब उस काप्य पतञ्चलने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको भीतरसे नियमित करता हे ?' उस पतञ्चल काप्यने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा; 'काप्य ! जो कोई उस सूत्र और उस अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्मवेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है।'