भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 766, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 766
७५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है, मननका विषय न होनेवाला किंतु मनन करनेवाला है और विशेषतया ज्ञात न होनेवाला किंतु विशेषरूपसे जाननेवाला है। यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। इससे भिन्न सब नाशवान् है। इसके पश्चात् अरुणका पुत्र उद्दालक प्रश्न करनेसे निवृत्त हो गया ॥ २३ ॥

| अथाध्यात्मम्—यः प्राणे प्राणवायुसहिते घ्राणे, यो वाचि, चक्षुषि, श्रोत्रे, मनसि, त्वचि, विज्ञाने, बुद्धौ, रेतसि प्रजनने। कस्मात् पुनः कारणात् पृथिव्यादिदेवता महाभागाः सत्यो मनुष्यादिवदात्मनि तिष्ठन्तमात्मनो नियन्तारमन्तर्यामिणं न विदुरित्यत आह—अदृष्टो न दृष्टो न विषयीभूतः चक्षुर्दर्शनस्य कस्यचित्, स्वयं तु चक्षुषि सन्निहितत्वादृशिस्वरूप इति द्रष्टा। | अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—जो प्राणमें—प्राणवायुसहित घ्राणेन्द्रियमें, जो वाणीमें, नेत्रमें, श्रोत्रमें, मनमें, त्वक्में, विज्ञान यानी बुद्धिमें तथा रेत (वीर्य)—प्रजननेन्द्रियमें रहनेवाला है। किंतु पृथिवी आदि [के अधिष्ठाता] देवता बड़े प्रभावशाली होनेपर भी मनुष्यादिके समान अपने भीतर रहनेवाले अपने नियामक अन्तर्यामीको क्यों नहीं जानते ? इसपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—वह अदृष्ट—न देखा हुआ अर्थात् किसीकी भी नेत्रदृष्टिका विषयीभूत नहीं है, किंतु स्वयं नेत्रमें सन्निहित होनेके कारण दर्शनस्वरूप है, इसलिये द्रष्टा है। | | तथाश्रुतः श्रोत्रगोचरत्वमनापन्नः कस्यचित्, स्वयं त्वलुप्तश्रवणशक्तिः सर्वश्रोत्रेषु सन्निहितत्वाच्छ्रोता। तथामतो मनःसङ्कल्प- | इसी प्रकार वह अश्रुत—किसीके भी श्रोत्रकी विषयताको अप्राप्त किंतु स्वयं जिसकी श्रवण-शक्ति लुप्त नहीं होती—ऐसा है और समस्त श्रोत्रोंमें सन्निहित होनेके कारण श्रोता है; ऐसे ही वह अमत-मनके संकल्पोंकी |