भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 767, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 767

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ [७५७


विषयतामनापन्नः; दृष्टश्रुते एव हि सर्वः सङ्कल्पयति; अदृष्टत्वादश्रुतत्वादेवामतः; अलुप्तमननशक्तित्वात् सर्वमनःसु सन्निहितत्वाच्च मन्ता। तथाविज्ञातो निश्चयगोचरतामनापन्नो रूपादिवत् सुखादिवद्वा, स्वयं त्वलुप्तविज्ञानशक्तित्वात्तत्सन्निधानाच्च विज्ञाता।विषयताको अप्राप्त है; क्योंकि सब लोग देखे-सुने पदार्थोंका ही संकल्प करते हैं, अतः अदृष्ट और अश्रुत होनेके कारण ही वह अमत है; तथा मनन-शक्ति लुप्त न होनेसे और समस्त मनोंमें सन्निहित होनेके कारण वह मन्ता है। इसी तरह अविज्ञात—रूपादि अथवा सुखादिके समान निश्चयकी विषयताको अप्राप्त किंतु स्वयं जिसकी विज्ञान-शक्ति लुप्त नहीं है—ऐसा एवं बुद्धिमें सन्निहित होनेके कारण विज्ञाता है।
तत्र यं पृथिवी न वेद यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति चान्ये नियन्तव्या विज्ञातारोऽन्यो नियन्ता अन्तर्यामीति प्राप्तम्, तदन्यत्वाशङ्कानिवृत्त्यर्थमुच्यते— नान्योऽतः, नान्यः अतोऽस्मादन्तर्यामिणो नान्योऽस्ति द्रष्टा, तथा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता, नान्योऽतोऽस्ति मन्ता, नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता।यहाँ 'जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसे समस्त भूत नहीं जानते' इत्यादि कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि जिनका नियमन किया जाता है, वे विज्ञाता भिन्न हैं और उनका नियमन करनेवाला अन्तर्यामी उनसे भिन्न है। उनके भिन्नत्वकी आशङ्काको निवृत्त करनेके लिये यह कहा जाता है—'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' अर्थात् अतः—इस अन्तर्यामीसे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है। इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, तथा इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है।