भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 768
७५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| यस्मात् परो नास्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, योऽदृष्टो द्रष्टा, अश्रुतः श्रोता, अमतो मन्ता, अविज्ञातो विज्ञाता, अमृतः सर्वसंसारधर्मवर्जितः सर्वसंसारिणां कर्मफलविभागकर्ता—एष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः अस्मादीश्वरादात्मनोऽन्यदार्तम् । ततो ह उद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ १५–२३ ॥ | जिससे भिन्न कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है, जो दिखायी न देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है; मनका अविषय किंतु मनन करनेवाला है, स्वयं अविज्ञात किंतु विज्ञाता है तथा अमृत—सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित एवं समस्त संसारियोंके कर्मफलोंका विभाग करनेवाला है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है; इस ईश्वर आत्मासे भिन्न और सब आर्त (विनाशी) है। तब अरुणका पुत्र उद्दालक निवृत्त हो गया ॥ १५–२३ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये सप्तममन्तर्यामिब्राह्मणम् ॥ ७ ॥


अष्टम ब्राह्मण

| अतः परमशनायादिविनिर्मुक्तं निरुपाधिकं साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तरं ब्रह्म वक्तव्यमित्यत आरम्भः— | इससे आगे क्षुधादिरहित निरुपाधिक साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर ब्रह्मका निरूपण करना है, इसलिये आरम्भ किया जाता है— |

दो प्रश्न पूछनेके लिये गार्गीका आज्ञा माँगना

अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ता-