बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 760, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| हि कार्यं करणं च पृथिवीदेवतायाः; तदस्य स्वकर्माभावादन्तर्यामिणो नित्यमुक्तत्वात्।<br><br>परार्थकत्र्तव्यतास्वभावत्वात् परस्य यत् कार्यं करणं च तदेवास्य, न स्वतः; तदाह—यस्य पृथिवी शरीरमिति। | देवताको कार्य और करण (देह और इन्द्रिय) उसके कर्मानुसार प्राप्त हुए हैं; वे ही इस अन्तर्यामीके हैं; क्योंकि नित्यमुक्त होनेके कारण उसके कोई स्वकर्म नहीं हैं। परार्थ-कर्तव्यता—दूसरेके अर्थको करना यह अन्तर्यामीका स्वभाव है, अतः जो दूसरेके देह और इन्द्रिय हैं; वे ही इसके भी हैं, स्वतः इसके कोई देह या इन्द्रिय नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है कि जिसका पृथिवी शरीर है। | | देवताकार्यकरणस्येश्वरसाक्षिमात्रसान्निध्येन हि नियमेन प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्; य ईदृगीश्वरो नारायणाख्यः, पृथिवीं पृथिवीदेवताम्, यमयति नियमयति स्वव्यापारे, अन्तरोऽभ्यन्तरस्तिष्ठन्, एष त आत्मा, ते तव, मम च सर्वभूतानां चेत्युपलक्षणार्थमेतत्; अन्तर्यामी यस्त्वया पृष्टः, अमृतः सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत् ॥ ३ ॥ | देवताके देह और इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति-निवृत्ति साक्षिमात्र ईश्वरके सांनिध्यसे नियमानुसार हुआ करती है, जो ऐसा नारायणसंज्ञक ईश्वर पृथिवीको—पृथिवी देवताको नियमित करता है—पृथिवीके भीतर विद्यमान रहकर अपने व्यापारमें नियुक्त करता है, यह तुम्हारा आत्मा है, तुम्हारा अर्थात् तुम्हारा और मेरा समस्त प्राणियोंका आत्मा है—इस प्रकार 'ते (तुम्हारा)' यह कथन सबके उपलक्षणके लिये है। यही अन्तर्यामी है, जिसके विषयमें तुमने पूछा है और यह अमृत यानी सम्पूर्ण संसार-धर्मोंसे रहित है ॥ ३ ॥ |