भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 759, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 759

ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४९


अन्तर्यामीका निरूपण

यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥

जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शरीर है और जो भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ३ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यः पृथिव्यां तिष्ठन् भवति, सोऽन्तर्यामी, सर्वः पृथिव्यां तिष्ठतीति सर्वत्र प्रसङ्गो मा भूदिति विशिनष्टि—पृथिव्या अन्तरोऽभ्यन्तरः । तत्रैतत् स्यात् पृथिवीदेवतैव अन्तर्यामीत्यत आह—यमन्तर्यामिणं पृथिवी देवतापि न वेद मद्यन्यः कश्चिद्वर्तत इति । यस्य पृथिवी शरीरम्—यस्य च पृथिव्येव शरीरम्, नान्यत्—पृथिवीदेवताया यच्छरीरम्, तदेव शरीरं यस्य; शरीरग्रहणं चोपलक्षणार्थम्, करणं च पृथिव्याः, तस्य स्वकर्मप्रयुक्तंजो पृथिवीमें रहनेवाला है, वह अन्तर्यामी है; किंतु पृथिवीमें तो सभी रहते हैं, अतः इससे सर्वत्र अन्तर्यामीका प्रसङ्ग न हो जाय, इसलिये उसका विशेषण बतलाते हैं—'जो पृथिवीके अन्तर-भीतर है।' इससे यह शङ्का हो सकती है कि पृथिवी देवता ही अन्तर्यामी है, इसलिये फिर कहते हैं—'जिस अन्तर्यामीको पृथिवी देवता भी नहीं जानती कि 'मेरे भीतर और भी कोई है।' जिसका पृथिवी शरीर है अर्थात् पृथिवी ही जिसका शरीर है, कोई और नहीं; यानी जो पृथिवी देवताका शरीर है, वही जिसका शरीर है; यहां 'शरीर' शब्द उपलक्षणार्थक है, अर्थात् केवल शरीर ही नहीं, पृथिवी देवताका जो करण (इन्द्रिय) है, वही उसका करण भी है। पृथिवी