बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 758, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 758
| ७४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| समुद्रस्येवोर्मयः, तदेतद् वायव्यं तत्त्वं सूत्रमित्यभिधीयते । | जिसके बाह्य भेद हैं, वह यह वायु-तत्त्व 'सूत्र' कहा जाता है । |
| वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दब्धानि भवन्ति सङ्ग्रथितानि भवन्तीति प्रसिद्धमेतत्। अस्ति च लोके प्रसिद्धिः, कथम् ? यस्माद् वायुः सूत्रम्, वायुना विधृतं सर्वम्; तस्माद् वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुः कथयन्ति—व्यस्रंसिषत विस्रस्तान्यस्य पुरुषस्याङ्गानीति; सूत्रापगमे हि मण्यादीनां प्रोतानामवस्रंसनं दृष्टम्; एवं वायुः सूत्रम्, तस्मिन् मणिवत् प्रोतानि यद् यस्याङ्गानि स्युस्ततो युक्तमेतद् वाय्वपगमेऽवस्रंसनमङ्गानाम् अतो वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दब्धानि भवन्तीति निगमयति । | 'हे गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत सन्दब्ध—संग्रथित हैं- यह प्रसिद्ध है। लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है, कैसी ? क्योंकि वायु सूत्र है, इसलिये वायुने सबको धारण किया है; इसीसे हे गौतम ! मृत पुरुषके विषयमें ऐसा कहते हैं कि इस पुरुषके अङ्ग विस्रस्त हो गये हैं; यह देखा गया है कि सूत्र (धागे) के न रहनेपर उसमें पिरोये हुए मणि आदि बिखर जाते हैं, इसी प्रकार वायु सूत्र है और यदि उसमें उस प्राणीके अङ्ग मणियोंके समान पिरोये हुए हैं, तो वायुके निवृत्त होनेपर इसके अङ्गोंका विशीर्ण हो जाना उचित ही है; इसीसे याज्ञवल्क्य ऐसा निगमन करते हैं कि 'हे गौतम ! ये वायुरूप सूत्रसे संग्रथित हैं।' |
| एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सम्यगुक्तं सूत्रम्; तदन्तर्गतं त्विदानीं तस्यैव सूत्रस्य नियन्तारमन्तर्यामिणं ब्रूहीत्युक्त आह ॥ २ ॥ | [गौतमने कहा—] 'याज्ञवल्क्य ! यह ठीक ऐसा ही है, तुमने सूत्रका यथार्थ वर्णन किया है। अब तुम उसके अन्तर्वर्ती और उस सूत्रके ही नियन्ता अन्तर्यामीका वर्णन करो।' गौतमके ऐसा कहनेपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—॥ २ ॥ |