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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०१ |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०१ | | :--- | :--- | | स्य, जुह्वामिव फलश्रुतेरर्थवादत्वा-<br>नुपपत्तिः। <br><br> प्रतिषिद्धानिष्टफलसम्बन्धश्च वेदादेव विज्ञायते। न चानुष्ठेयः सः। न च प्रतिषिद्धविषये प्रवृत्तक्रियस्य अकरणादन्यदनुष्ठेयमस्ति। अकर्तव्यताज्ञाननिष्ठतैव हि परमार्थतः प्रतिषेधविधीनां स्यात्। <br><br> क्षुधार्तस्य प्रतिषेधज्ञानसंस्कृतस्य अभक्ष्येऽभोज्ये वा प्रत्युपस्थिते कलञ्जाभिशस्तान्नादौ 'इदं भक्ष्यमदो भोज्यम्' इति वा ज्ञानमुत्पन्नम्, तद्विषयया प्रतिषेधज्ञानस्मृत्या बाध्यते। मृगतृष्णिकायामिव पेयज्ञानं तद्विषययाथात्म्यविज्ञानेन। तस्मिन्बाधिते स्वाभाविकविपरीतज्ञानेऽनर्थकरी तल्लक्षणभोजनप्रवृत्तिर्न भवति। विपरीत- | विषयमें जिस प्रकार फलश्रुति अर्थवाद है उस प्रकार उसके अर्थवाद होनेकी भी सम्भावना नहीं है। <br><br> इसके सिवा प्रतिषिद्ध कर्मानुष्ठानसे अनिष्ट फलका सम्बन्ध होना भी वेदसे ही जाना जाता है और वह (प्रतिषिद्ध कर्म) अनुष्ठेय भी नहीं होता; तथा जो पुरुष क्रियामें प्रवृत्त है उसके लिये प्रतिषिद्ध विषयके न करनेसे ही दूसरे प्रकारका कर्म अनुष्ठेय नहीं हो जाता; क्योंकि वस्तुतः प्रतिषिद्धसम्बन्धी विधियोंका तात्पर्य उनकी अकर्त्तव्यताका ज्ञान करानेमें ही है। यदि प्रतिषेधज्ञानके संस्कारसे युक्त किसी क्षुधार्त्त पुरुषके सामने अभक्ष्य और अभोज्य कलञ्ज¹ या ²अभिशस्त अन्न उपस्थित हो तो उसे जो 'यह भक्ष्य है, यह भोज्य है' ऐसा ज्ञान उत्पन्न होगा। वह उसकी भोजनसम्बन्धिनी प्रतिषेधज्ञानस्मृतिसे बाधित हो जायगा, जिस प्रकार कि मृगतृष्णाके स्वरूपका ज्ञान होनेपर उसमें पेयबुद्धि नहीं रहती। उस स्वाभाविक विपरीत ज्ञानके बाधित हो जानेपर उसके भक्षण या भोजनमें अनर्थकारिणी प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वह प्रवृत्ति तो विपरीतज्ञानजनित थी |


१. मांस। २. ब्रह्महत्यादि पापसे दूषित पुरुषका अन्न।

१०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१०२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| ज्ञाननिमित्तायाः प्रवृत्तेर्निवृत्तिरेव, न पुनर्यत्नः कार्यस्तदभावे । तस्मात्प्रतिषेधविधीनां वस्तुयाथात्म्यज्ञाननिष्ठतैव, न पुरुषव्यापारनिष्ठतागन्धोऽप्यस्ति । | अतः उसकी निवृत्ति ही हो जाती है, उसके अभावके लिये उसे फिर कोई यत्न नहीं करना पड़ता । अतः प्रतिषेधविधियोंका वस्तुके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान करानेमें ही तात्पर्य है, उनमें पुरुषकी व्यापारनिष्ठताकी गन्ध भी नहीं है । | | तथेहापि परमात्मादियाथात्म्यज्ञानविधीनां तावन्मात्रपर्यवसानतैव स्यात् । तथा तद्विज्ञानसंस्कृतस्य तद्विपरीतार्थज्ञाननिमित्तानां प्रवृत्तीनामनर्थार्थत्वेन ज्ञायमानत्वात् परमात्मादियाथात्म्यज्ञानस्मृत्या स्वाभाविके तन्निमित्तविज्ञाने बाधितेऽभावः स्यात् । | इसी प्रकार यहाँ भी परमात्मादिके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विधियोंका तात्पर्य केवल उतनेहीमें है । तथा उसके ज्ञानके संस्कारसे युक्त पुरुषको उससे विपरीत पदार्थोंके ज्ञानकी निमित्तभूता प्रवृत्तियोंकी अनर्थार्थकताका ज्ञान हो जानेसे परमात्मादिके स्वरूपज्ञानकी स्मृतिसे स्वाभाविक प्रवृत्तिविषयक ज्ञानके बाधित हो जानेसे प्रवृत्तिका अभाव ही हो जाता है । | | ननु कलञ्जादिभक्षणादेरनर्थार्थत्ववस्तुयाथात्म्यज्ञानस्मृत्या स्वाभाविके तद्भक्ष्यत्वादिविषयविपरीतज्ञाने निवर्तिते तद्भक्षणाद्यनर्थप्रवृत्त्यभाववदप्रतिषेधविषयत्वाच्छास्त्रविहितप्रवृत्त्यभावो न युक्त इति चेत् । | पूर्व०—किंतु कलञ्जभक्षणादि अनर्थार्थक वस्तुओंके स्वरूपज्ञानकी स्मृतिसे उनके भक्ष्यत्वादिविषयक स्वभावसिद्ध विपरीत ज्ञानके निवृत्त हो जानेपर जैसे उनके भक्षणादिकी अनर्थमयी प्रवृत्तिका अभाव हो जाता है वैसे ही शास्त्रविहित प्रवृत्तिका अभाव होना तो उचित नहीं है, क्योंकि वह प्रतिषेधका विषय नहीं है । |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
न, विपरीतज्ञाननिमित्तत्वानर्थार्थत्वाभ्यां तुल्यत्वात्। कलञ्जभक्षणादिप्रवृत्तेः मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वम्। अनर्थार्थत्वं च यथा, तथा शास्त्रविहितप्रवृत्तीनामपि। तस्मात् परमात्मयाथात्म्यविज्ञानवतः शास्त्रविहितप्रवृत्तीनामपि मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वेन अनर्थार्थत्वेन च तुल्यत्वात् परमात्मज्ञानेन विपरीतज्ञाने निवर्तिते युक्त एवाभावः।**सिद्धान्ती—**ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि विपरीतज्ञानके कारण और अनर्थके लिये होनेसे ये दोनों समान ही हैं। जिस प्रकार कलञ्जभक्षणादिकी प्रवृत्ति मिथ्याज्ञानके कारण और अनर्थकी हेतु होती है उसी प्रकार शास्त्रविहित प्रवृत्तियाँ भी हैं। अतः जिसे परमात्माके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान हो गया है उसकी दृष्टिमें शास्त्रविहित प्रवृत्तियाँ भी मिथ्याज्ञानकी हेतु और अनर्थकी प्राप्ति करानेवाली होनेमें कलञ्जभक्षणादिके समान ही हैं, इसलिये परमात्मज्ञानसे उनके विपरीत ज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर उनका भी अभाव हो जाना उचित ही है।
ननु तत्र युक्तः, नित्यानां तु केवलशास्त्रनिमित्तत्वात्, अनर्थार्थत्वाभावाच्चाभावो न युक्त इति चेत् ?**पूर्व०—**माना, वहाँ अभाव होना उचित है किंतु नित्य कर्मोंका त्याग करना तो उचित नहीं है; क्योंकि वे केवल शास्त्रविहित हैं और किसी प्रकारके अनर्थकी भी प्राप्ति करानेवाले नहीं हैं। ऐसा कहें तो ?
न अविद्यारागद्वेषादिदोषवतो विहितत्वात्। यथा स्वर्गकामादिदोषवतो दर्शपूर्णमासादीनि**सिद्धान्ती—**यह बात नहीं है; उनका विधान भी अविद्या और राग-द्वेषादि दोषयुक्त पुरुषोंके ही लिये है। जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादि

१०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

१०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १


| काम्यानि कर्माणि विहितानि तथा सर्वानर्थबीजाविद्यादिदोषवतस्तज्जनितेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहाररागद्वेषादिदोषवतश्च तत्प्रेरिताविशेषप्रवृत्तेरिष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारार्थिनो नित्यानि कर्माणि विधीयन्ते, न केवलं शास्त्रनिमित्तान्येव । | काम्य कर्मोंका विधान स्वर्गकामादि दोषयुक्त पुरुषोंके लिये किया गया है, उसी प्रकार सब प्रकारके अनर्थके बीजभूत अविद्यादि दोषवान् तथा उनसे होनेवाली इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छा एवं इष्टनिवृत्ति और अनिष्टप्राप्तिके द्वेषरूप दोषसे युक्त तथा उन रागद्वेषसे प्रेरित होकर समानरूपसे प्रवृत्त होनेवाले एवं इष्ट-प्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये नित्यकर्मोंका विधान किया गया है, वे केवल शास्त्रजनित ही नहीं हैं। | | न चाग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्यपशुबन्धसोमानां कर्मणां स्वतः काम्यनित्यत्वविवेकोऽस्ति । कर्तृगतेन हि स्वर्गादिकामदोषेण कामार्थता । तथा अविद्यादिदोषवतः स्वभावप्राप्तेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारार्थिनः तदर्थान्येव नित्यानि इति युक्तम्, तं प्रति विहितत्वात् । | इसके सिवा अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध और सोमादि कर्मोंका स्वतः कोई काम्यत्व या नित्यत्वका विवेक नहीं होता। कर्ताकी स्वर्गादिसम्बन्धिनी कामनाके दोषसे ही उनकी सकाम्यता सिद्ध होती है। इसी प्रकार जो अविद्यादि दोषसे युक्त है और जिसे स्वभावप्राप्त इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिकी इच्छा है, उसीके लिये नित्य-कर्म हैं—ऐसा मानना उचित ही है, क्योंकि उसीके लिये उनका विधान है। | | न परमात्मयाथात्म्यविज्ञान- | जिसे परमात्माके वास्तविक |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
वतः शमोपायव्यतिरेकेण किञ्चित्कर्म विहितमुपलभ्यते। कर्मनिमित्तदेवतादिसर्वसाधनविज्ञा- <br><br> नोपमर्देन ह्यात्मज्ञानं विधीयते, <br><br> न चोपमर्दितक्रियाकारकादिविज्ञानस्य कर्मप्रवृत्तिरुपपद्यते। <br><br> विशिष्टक्रियासाधनादिविज्ञानपूर्वकत्वात्क्रियाप्रवृत्तेः। न हि देश- <br><br> कालाद्यनवच्छिन्नास्थूलद्वयादिब्रह्मप्रत्ययधारिणः कर्मावसरोऽस्ति।स्वरूपका ज्ञान है उसके लिये तो शम (शान्ति) का साधन करनेके सिवा और कोई भी कर्म विहित नहीं देखा जाता, क्योंकि आत्मज्ञान तो कर्मके निमित्तभूत देवतादि सब प्रकारके साधनोंके विज्ञानकी निवृत्ति करके ही होता है और जिसके क्रिया-कारकादि विज्ञानकी निवृत्ति हो गयी है उसकी कर्ममें प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है; कारण, क्रियाकी प्रवृत्ति तो विशिष्ट क्रिया और साधनादिके विज्ञानपूर्वक ही होती है। जिसकी देश-कालादि-से अनवच्छिन्न, अस्थूल और अद्वयादिस्वरूप ब्रह्मप्रत्ययमें धारणा है उसे तो कर्मका कोई अवसर ही नहीं है।
भोजनादिप्रवृत्त्यवसरवत्स्यादिति चेत् ?पूर्व०—भोजनादिकी प्रवृत्तिके अवसरके समान उसे कर्मका भी अवसर हो सकता है—ऐसा कहें तो ?
न, अविद्यादिकेवलदोषनिमित्तत्वाद्भोजनादिप्रवृत्तेरावश्यकत्वानुपपत्तेः। न तु तथानियतं कदाचित्क्रियते कदाचिन्न क्रियते चेति नित्यं कर्मोपपद्यते। केवलदोष-सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि भोजनादिमें प्रवृत्त होनेकी आवश्यकता केवल अविद्यादि दोषके ही कारण होती हो—ऐसा मानना उचित नहीं है। इसके सिवा भोजनादिके समान नित्य कर्मका, कभी किया जाय और कभी न किया जाय—ऐसा अनियत होना भी सम्भव नहीं है। भोजनादि कर्म केवल क्षुधादि दोषके कारण होते

१०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
निमित्तत्वात्तु भोजनादिकर्मणोऽनियतत्वं स्यात्। दोषोद्भवविभवयोरनियतत्वात् कामानाभिव काम्येषु। शास्त्रनिमित्तकालाद्यपेक्षत्वाच्च नित्यानामनियतत्वानुपपत्तिः। दोषनिमित्तत्वे सत्यपि यथा काम्याग्निहोत्रस्य शास्त्रविहितत्वात् सायं प्रातःकालाद्यपेक्षत्वमेवम्।हैं, इसलिये उनका तो अनियत होना सम्भव है, क्योंकि काम्य विषयोंकी कामनाके समान उन दोषोंकी उत्पत्ति और निवृत्ति अनियत हैं; किंतु शास्त्रजनित कालादिकी अपेक्षावाले होनेसे नित्य कर्मोंका अनियत होना नहीं बन सकता। जिस प्रकार काम्य अग्निहोत्रको शास्त्रविहित होनेके कारण सायंकाल, प्रातःकालादिकी अपेक्षा है उसी प्रकार दोषनिमित्तक होनेपर भी नित्यकर्मोंको नियमकी अपेक्षा है।
तद्भोजनादिप्रवृत्तौ नियमवत्स्यादिति चेत् ?पूर्व०- वह नियम भोजनादिकी प्रवृत्ति होनेपर भिक्षाटनादिके नियमके समान हो सकता है। ऐसा कहें तो !
न, नियमस्याक्रियात्वात् क्रियायाश्चाप्रयोजकत्वान्नासौ ज्ञानस्यापवादकरः। तस्मात् परमात्मयाथा-सिद्धान्ती- ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि नियम क्रियारूप नहीं है और क्रिया प्रयोजक नहीं होती; इसलिये यह (भिक्षाटनादिका नियम) ज्ञानका विरोधी नहीं है।^१ अतः परमात्मस्वरूपके ज्ञानसे सम्बन्ध

१ तात्पर्य यह है कि भिक्षाटनादिके विषयमें जो शास्त्रकी विधि है वह जिज्ञासुके लिये है। ज्ञानवान् शास्त्रविधिसे प्रेरित होकर उसका अनुसरण नहीं करता, अपि तु उसमें उसकी प्रवृत्ति स्वभावतः ही होती है। इसलिये वह विधि ज्ञानकी विरोधिनी नहीं है। किंतु नित्यकर्मादिके लिये जो विधि है उसमें हेयोपादेयबुद्धिवाले पुरुषकी ही प्रवृत्ति हो सकती है, इसलिये बोधवान्‌का उसमें प्रवृत्त न होना स्वाभाविक ही है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७


| त्म्यज्ञानविधेरपि तद्विपरीतस्थूलद्वैतादिज्ञाननिवर्तकत्वात् सामर्थ्यात्सर्वकर्मप्रतिषेधविध्यर्थत्वं सम्पद्यते; कर्मप्रवृत्त्यभावस्य तुल्यत्वाद् यथा प्रतिषेधविषये। तस्मात् प्रतिषेधविधिवच्च वस्तुप्रतिपादनं तत्परत्वं च सिद्धं शास्त्रस्य ॥ १॥ . | रखनेवाली ( तत्त्वमसि आदि ) विधि भी उससे विपरीत स्थूल एवं द्वैतादि ज्ञानकी निवृत्ति करनेवाली होनेसे अपनी सामर्थ्यसे ही सब प्रकारसे कर्मका प्रतिषेध करनेवाली हो जाती है, क्योंकि उसमें कर्मकी प्रवृत्तिका अभाव वैसा ही है जैसा कि प्रतिषेधविषयक वाक्योंमें¹। अतः प्रतिषेधविधिके समान ही तत्त्वमसि आदि शास्त्रका वस्तुप्रतिपादक और कर्म-निषेधपरक होना भी सिद्ध होता है ॥ १॥ |


वाक्‌का उद्गान और उसका पापविद्ध होना

ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥

उन देवताओंने वाक्‌से कहा, “तुम हमारे लिये उद्गान करो।” वाक्‌ने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उनके लिये उद्गान किया। उसने जो वाणीमें भोग था उसे देवताओंके लिये गान किया और जो शुभ भाषण करती थी उसे अपने लिये गाया। तब असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके


¹ जैसे निषेध शास्त्रको मानकर निषिद्ध भक्षण आदिमें प्रवृत्ति नहीं होती, उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि वचनोंके सामर्थ्यसे कर्मोंमें प्रवृत्तिका अभाव होता है। इस प्रकार दोनोंमें समानता है।

१०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह वाक् जो अननुरूप (निषिद्ध) भाषण करती है वही वह पाप है, वही वह पाप है ॥ २ ॥

| ते देवा हैवं विनिश्चित्य, वाचं वागभिमानिनीं देवतामूचु-रुक्तवन्तः। त्वं नोऽस्मभ्यमुद्गा-यौद्गात्रं कर्म कुरुष्व। वाग्देवता-निर्वर्त्यमौद्गात्रं कर्म दृष्टवन्तः, तामेव च देवतां जपमन्त्राभिधेयाम् “असतो मा सद्गमय” (बृ० उ० १।३।२८) इति। अत्र चोपासनायाः कर्मणश्च कर्तृत्वेन वागादय एव विवक्ष्यन्ते। कस्मात्? यस्मात्परमार्थतस्तत्-कर्तृकस्तद्विषय एव च सर्वो ज्ञानकर्मसंव्यवहारः। वक्ष्यति हि “ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यात्मकर्तृत्वाभावं विस्तरतः षष्ठे। | उन देवताओंने ऐसा निश्चय कर वाक्—वाक्‌के अभिमानी देवतासे कहा, “तुम हमारे लिये उद्गान यानी उद्गाताका कर्म करो।” उन्होंने औद्गात्रकर्मको वाग्देवतासे ही सम्पन्न होने योग्य देखा और उसी देवताको “मुझे असत्‌से सत्‌के प्रति ले जा” इस जपमन्त्रका भी अभिधेय जाना। यहाँ भी उपासना और कर्मके कर्तारूपसे वागादि ही विवक्षित हैं। क्यों? क्योंकि ज्ञान और कर्मसम्बन्धी सारा व्यवहार वस्तुतः उन्हींसे होनेवाला और उन्हींका विषय है। छठे अध्यायमें “मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है” इत्यादि श्रुति विस्तारपूर्वक उस (व्यवहार) की आत्मकर्तृकता (आत्माके द्वारा किये जाने) का अभाव बतलावेगी। | | इहापि चाध्यायान्ते उपसंहरि-ष्यति अव्याकृतादिक्रियाकारक-फलजातम् “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” (१।६।१) इति अविद्या-विषयम्। अव्याकृतात्तु यत्परं | यहाँ भी अध्यायकी समाप्तिमें “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” इस वाक्यद्वारा अव्याकृतादि क्रिया, कारक और फलसमूह अविद्याके ही विषय हैं—इस प्रकार श्रुति उपसंहार करेगी। तथा अव्याकृतसे |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९


संस्कृतहिन्दी
परमात्मारूयं विद्याविषयम् अनामरूपकर्मात्मकम् "नेति नेति" (२।३।६) इति इतरप्रत्याख्यानेनोपसंहरिष्यति पृथक्। यस्तु वागादिसमाहारोपाधिपरिकल्पितः संसार्थ्यात्मा तं च वागादिसमाहारपक्षपातिनमेव दर्शयिष्यति "एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति" (२।४।१२) इति। तस्माद्युक्ता वागादीनामेव ज्ञानकर्मकर्तृत्वफलप्राप्तिविवक्षा।आगे जो नाम, रूप और कर्मसे रहित परमात्मसंज्ञक विद्याका विषय है उसका "नेति नेति" इस वाक्यद्वारा परमात्मेतर वस्तुका बाध करके अलग ही उपसंहार करेगी। और जो वागादिसंघातरूप उपाधिसे कल्पित संसारी आत्मा है उसे "इन भूतोंसे उत्पन्न होकर वह इन्हींके नाशके साथ नष्ट हो जाता है" इस वाक्यद्वारा वागादि संघातका पक्षपाती ही प्रदर्शित करेगी। अतः वागादिको ही ज्ञान और कर्मका कर्तृत्व है तथा उन्हें ही उनके फलकी प्राप्ति होती है—ऐसी विवक्षा उचित ही है।
तथेति तथास्त्विति देवैरुक्ता वाक्तेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय उद्गायदुद्गानं कृतवती। कः पुनरसौ देवेभ्योऽर्थाय उद्गानकर्मणा वाचा निर्वर्तितः कार्यविशेषः? इत्युच्यते—यो वाचि निमित्तभूतायां वागादिसमुदायस्य य उपकारो निष्पद्यते वदनादिव्यापारेण, स एव। सर्वेषां ह्यसौ वाग्वदनाभिनिर्वृत्तो भोगः फलम्।देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वाक्ने 'तथा'—तथास्तु (ऐसा ही हो) यह कहकर उन प्रार्थी देवताओंके लिये उद्गान किया। किंतु इस उद्गानकर्मके द्वारा वाणीसे देवताओंके लिये कौन-सा कार्यविशेष निष्पन्न हुआ? सो बतलाते हैं। वाणीके निमित्तभूत होनेपर उसके भाषणादि व्यापारद्वारा वागादि समुदायका जो उपकार होता है वही उनका कार्यविशेष है। उन सबको वाणीके भाषणसे होनेवाला यह भोगरूप फल ही प्राप्त होता है।

११० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

११०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तं भोगं सा त्रिषु पवमानेषु कृत्वा अवशिष्टेषु नवसु स्तोत्रेषु वाचनिकमार्त्विज्यं फलं यत्कल्याणं शोभनं वदति वर्णान्भिनिर्वर्तयति तद् आत्मने मह्यमेव। तद्ध्यसाधारणं वाग्देवतायाः कर्म यत्सम्यग्वर्णानामुच्चारणम्। अतस्तदेव विशेष्यते यत्कल्याणं वदतीति। यत्तु वदनकार्यं सर्वसंघातोपकारात्मकं तद्याजमानमेव। | उस भोगको तीन पवमानोंमें करके उसने शेष नौ स्तोत्रोंमें जो ऋत्विक्-सम्बन्धी वाचनिक¹ फल था अर्थात् वह जो कल्याण यानी सुन्दर भाषण—वर्णोच्चारण करती थी उसे अपने लिये अर्थात् यह मेरे लिये ही हो—इस प्रकार गान किया। ⁕ वर्णोंका जो ठीक-ठीक उच्चारण है यही वाग्देवताका असाधारण कर्म है। अतः 'यत्कल्याणं वदति' इस वाक्यद्वारा उसीको विशेष्यरूपसे बतलाया गया है। तथा समस्त संघातका उपकारक जो भाषणकार्य है वह यजमानसम्बन्धी ही है। | | तत्र कल्याणवदनात्मसम्बन्धासङ्गावसरं देवताया रन्ध्रं प्रतिलभ्य ते विदुरसुराः, कथम्? अनेनोद्गात्रा नोऽस्मान्स्वाभाविकं ज्ञानं कर्म चाभिभूयातीत्य शास्त्रजनितकर्मज्ञानरूपेण ज्योतिषोद्गा- | तब, कल्याणवदनका मेरेसे सम्बन्ध है—इस प्रकारके अभिनिवेशका अवसररूप वाग्देवताका छिद्र देखकर उन असुरोंने जाना; क्या जाना? इस उद्गानकर्मद्वारा ये हमें अर्थात् स्वाभाविक ज्ञान और कर्मको दबाकर उद्गातारूप शास्त्रजनित कर्म-ज्ञानरूप ज्योतिसे हमारा |


१. "अथात्मनेऽन्नाद्यमागायेत्"—इसके पश्चात् अपने लिये भक्ष्यरूप अन्नका आगान करे—इस वचनद्वारा श्रुत जो ऋत्विजोंका फल था।
⁕ ज्योतिष्टोममें बारह स्तोत्र हैं। उनमेंसे 'पवमान' नामक तीन स्तोत्रोंसे यजमानके फलका सम्पादन कर शेष नौ स्तोत्रोंसे उसने कल्याणवदनका सामर्थ्य अपने लिये गान किया।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १११ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ१११

शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
त्रात्मना अत्येष्यन्त्यतिगमिष्यन्ति। इत्येवं विज्ञाय तमूद्गातारमभिद्रुत्याभिगम्य स्वेन आसङ्गलक्षणेन पाप्मनाविध्यंस्ताडितवन्तः संयोजितवन्त इत्यर्थः।<br><br>स यः स पाप्मा प्रजापतेः पूर्वजन्मावस्थस्य वाचि क्षिप्तः स एष प्रत्यक्षीक्रियते। कोऽसौ ? यदेवेदमप्रतिरूपमननुरूपं शास्त्रप्रतिषिद्धं वदति येन प्रयुक्तोऽसभ्यबीभत्सानृताद्यनिच्छन्नपि वदति। अनेन कार्येणाप्रतिरूपवदनेन अनुगम्यमानः प्रजापतेः कार्यभूतासु प्रजासु वाचि वर्तते। स एवाप्रतिरूपवदनेनानुमितः स प्रजापतेर्वाचि गतः पाप्मा, कारणानुविधायि हि कार्यमिति ॥ २ ॥अतिगमन—उल्लङ्घन करेंगे। इस प्रकार जानकर उस उद्गाताके पास जाकर उन्होंने अपने अभिनिवेशरूप पापसे उसे विद्ध—ताड़ित अर्थात् संयुक्त कर दिया।<br><br>वह जो पाप पूर्वजन्मावस्थित प्रजापतिकी वाणीमें डाला गया था वही यह प्रत्यक्ष किया जाता है। वह कौन-सा है? यह जो अप्रतिरूप—अननुरूप यानी शास्त्रसे प्रतिषिद्ध भाषण करती है। जिससे प्रेरित होकर ही यह इच्छा न होनेपर भी असभ्यतापूर्ण, बीभत्स और अनृतादि भाषण करती है। इस अननुरूप भाषणरूप कार्यसे अनुगत होता हुआ वह पाप प्रजापतिकी कार्यभूता प्रजाओंकी वाणीमें विद्यमान है। प्रजापतिकी वाणीमें पहुँचा हुआ वही पाप अननुरूप भाषणसे अनुमित होता है, क्योंकि कार्य तो कारणका अनुवर्त्तन करनेवाला होता है ॥ २ ॥

प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मनका उद्गान तथा उनका पापविद्ध होना

अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यः प्राण उदगायद्यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं

११२ वृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

जिघ्रति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥

फिर उन्होंने प्राणसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब प्राणने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। प्राणमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ सूँघता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उनके समीप जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप सूँघता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ३ ॥

अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यश्चक्षुरुद्गायद्यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं पश्यति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥४॥

फिर उन्होंने चक्षुसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो" तब चक्षुने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। चक्षुमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ दर्शन करता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप देखता है यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ४ ॥

अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुद्गायद्यःश्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ११३


शृणोति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्य-
न्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदे-
वेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५॥

फिर उन्होंने श्रोत्रसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब श्रोत्रने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। श्रोत्रमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और वह जो शुभ श्रवण करता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप श्रवण करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ५ ॥

अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यो
मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं
संकल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्ये-
ष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा
यदेवेदमप्रतिरूपं संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता
देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाविध्यन् ॥६॥

फिर उन्होंने मनसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब मनने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। मनमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और वह जो शुभ संकल्प करता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप संकल्प करता है यही वह पाप है, यही वह पाप है। इस प्रकार निश्चय ही इन देवताओंको पापका संसर्ग हुआ और ऐसे ही [असुरोंने] इन्हें पापसे विद्ध किया ॥ ६ ॥

बृ० उ० ८—

११४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

११४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तथैव घ्राणादिदेवता उद्गीथनिर्वर्तकत्वाज्जपमन्त्रप्रकाश्या उपास्याश्चेति क्रमेण परीक्षितवन्तः। देवानां चैतन्निश्चितमासीत्—वागादिदेवताः क्रमेण परीक्ष्यमाणाः कल्याणविषयविशेषात्मसम्बन्धासङ्गहेतोरासुरपाप्मसंसर्गाद् उद्गीथनिर्वर्तनासमर्थाः। अतोऽनभिधेयाः “असतो मा सद्मय” इत्यनुपास्याश्च, अशुद्धत्वादितराण्यापकत्वाच्चेति ।<br><br>एवमु खल्वनुक्ता अप्येतास्त्वगादिदेवताः कल्याणाकल्याणकार्यदर्शनादेवं वागादिवदेव, एनाः पाप्मनाऽविध्यन्पाप्मना विद्धवन्त इति यदुक्तं तत्पाप्मभिरुपासृजन्पाप्मभिः संसर्गं कृतवन्त इत्येतत् ॥ ३-६ ॥ | इसी प्रकार घ्राणादि देवता उद्गीथ कर्मके कर्ता होनेसे जप-मन्त्रद्वारा प्रकाश्य और उपास्य हैं—ऐसा जानकर देवताओंने क्रमशः उनकी परीक्षा की। देवताओंको उनके विषयमें यही निश्चय था कि क्रमशः परीक्षा किये जानेपर वागादि देवता कल्याणविषयविशेषका अपने-से सम्बन्ध रखनेकी आसक्तिके कारण आसुर पापका संसर्ग हो जानेसे उद्गीथकर्मका निर्वाह करनेमें समर्थ नहीं हैं। अतः अशुद्ध और दूसरोंमें अव्यापक होनेके कारण “मुझको असत्से सत्की ओर ले जाओ” इस जपमन्त्रसे अप्रकाश्य और अनुपास्य हैं।<br><br>इसी प्रकार, न कहे जानेपर भी, शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके कार्य देखे जानेसे त्वगादि अन्य देवगण भी वागादिके समान ही हैं। इन्हें भी असुरोंने पापसे वेध दिया है। ऊपर जो कहा गया है कि ‘पापसे वेध दिया’ उसका यही तात्पर्य है कि पापके द्वारा उन्हें संश्लिष्ट कर दिया यानी पापसे उनका संसर्ग कर दिया ॥३-६॥ |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ११५

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ११५

मुख्य प्राणका उद्गान, उसका पापविद्ध न होना तथा उसकी उपासनाका फल

वागादिदेवता उपासीना अपि मृत्यवतिगमनायाशरणाः सन्तो देवाः क्रमेण—वागादि देवताओंकी उपासना करनेपर भी मृत्युका अतिक्रमण करनेमें किसीको अपना सहायक न पाकर देवताओंने क्रमशः—

अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यत्सन् । स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवँ हैव विध्वंसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन्परासुराः । भवत्यात्मना परास्य द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७॥

फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिये उद्गान किया। असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध करना चाहा। किंतु जिस प्रकार पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है उसी प्रकार वे विध्वस्त होकर अनेक प्रकारसे नष्ट हो गये। तब देवगण प्रकृतिस्थ हो गये और असुरोंका पराभव हुआ। जो इस प्रकार जानता है वह प्रजापतिरूपसे स्थित होता है और उससे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य (सौतेले भाई) का पराभव होता है ॥७॥

अथानन्तरं ह इममित्यभिनय-तदनन्तर, 'ह इमम्' यह अभिनय (अङ्गुलि आदिद्वारा प्रत्यक्ष संकेत)
प्रदर्शनार्थम् । आसन्यमास्ये भव-प्रदर्शित करनेके लिये है, उन्होंने
मासन्यं मुखान्तर्बिलस्थं प्राणम्-आसन्य—आस्यमें रहनेवाले अर्थात् मुखान्तर्गत छिद्रमें स्थित प्राणसे

११६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

११६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| चुस्त्वं न उद्गायेति। तथेत्येवं शरणमुपगतेभ्यः स एष प्राणो मुख्य उदगायदित्यादि पूर्ववत्। पाप्मनाऽविध्यत्सन्वेधनं कर्तुमिष्टवन्तस्ते च दोषासंसर्गिणं सन्तं मुख्यं प्राणम्। स्वेन आसङ्गदोषेण वागादिषु लब्धप्रसरास्तदभ्यासानुवृत्त्या संस्रक्ष्यमाणा विनेशुर्विनष्टा विध्वस्ताः। | कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब 'तथास्तु' कहकर अपनी शरणमें आये हुए देवताओंके लिये उस मुख्य प्राणने उद्गान किया—इत्यादि सब प्रसङ्ग पूर्ववत् समझना चाहिये। असुरोंने जो दोषके संसर्गसे रहित था उस मुख्य प्राणको पापसे विद्ध करना चाहा। अपने अभिनिवेशरूप दोषके कारण वागादिमें उनकी गति हो गयी थी। किंतु उसी अभ्यासकी अनुवृत्तिसे मुख्य प्राणके साथ संसर्ग करनेको उद्यत होनेपर वे नाशको प्राप्त हो गये अर्थात् विध्वस्त हो गये। | | कथमिव? इति दृष्टान्त उच्यते— | किस प्रकार विध्वस्त हो गये? इस विषयमें दृष्टान्त दिया जाता है। | | स यथा स दृष्टान्तो यथा लोकेऽश्मानं पाषाणमृत्वा गत्वा प्राप्य, लोष्टः पांसुपिण्डः पाषाणचूर्णनायाश्मनि निक्षिप्तः स्वयं विध्वंसेत विस्रंसेत विचूर्णीभवेत्, एवं हैव यथायं दृष्टान्त एवमेव, विध्वंसमाना विशेषेण ध्वंसमाना विष्वञ्चो नानागतयो विनेशुर्विनष्टा | 'स यथा'—जैसा कि वह दृष्टान्त है—लोकमें पाषाणको चूर्ण करनेके लिये फेंका हुआ लोष्ट—मिट्टीका ढेला उस अश्मा यानी पत्थरपर जाकर—पहुँचकर अर्थात् पत्थरको प्राप्त होकर स्वयं विध्वस्त-छिन्न भिन्न यानी चूर्ण हो जाता है उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है वैसे ही वे असुरगण विध्वस्त होकर—विशेषरूपसे ध्वस्त होकर विष्वक् यानी नाना गतियोंको प्राप्त |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यत:, ततस्तस्मादासुरविनाशादेवत्वप्रतिबन्धभूतेभ्यः स्वाभाविकासङ्गजनितपाप्मभ्यो वियोगाद् असंसर्गधर्मिमुख्यप्राणाश्रयबलाद् देवा वागादयः प्रकृता अभवन् ।<br><br>किमभवन् ? स्वं देवतारूपमग्न्याद्यात्मकं वक्ष्यमाणम् । पूर्वमप्यग्न्याद्यात्मान एव सन्तः स्वाभाविकेन पाप्मना तिरस्कृतविज्ञानाः पिण्डमात्राभिमाना आसन् । ते तत्पाप्मवियोगादुज्झित्वा पिण्डमात्राभिमानं शास्त्रसमर्पितवागाद्यग्न्याद्यात्माभिमाना बभूवुरित्यर्थः । किञ्च ते प्रतिपक्षभूता असुराः पराभवन्नित्यनुवर्तते । पराभूता विनष्टा इत्यर्थः ।होते हुए विनष्ट हो गये । क्योंकि ऐसा हुआ इसलिये असुरभावका विनाश हो जानेसे देवत्वके प्रतिबन्धभूत स्वाभाविक अभिनिवेशजनित पापसे वियोग हो जानेके कारण असंसर्गधर्मी मुख्य प्राणके आश्रयके प्रभावसे वागादि देवगण प्रकृतिस्थ हो गये ।<br><br>वे क्या हो गये ? [सो बतलाया जाता है—] वे आगे बतलाये जानेवाले अपने अग्न्यादिरूप देवभावको प्राप्त हो गये । पहले भी वे अग्न्यादिस्वरूप ही थे । अपने स्वभावजनित पापसे विज्ञानशक्तिके तिरस्कृत हो जानेसे वे पिण्डमात्रके अभिमानसे युक्त हो गये थे । उस पापका वियोग हो जानेसे वे पिण्डमात्रके अभिमानको त्यागकर शास्त्रसमर्पित वागादि अग्न्यादिरूपताके अभिमानसे युक्त हो गये । तथा उनके प्रतिपक्षी वे असुरगण पराभूत हो गये—इस प्रकार 'पराभवन्'१ यहाँ 'अभवन्' क्रियाकी अनुवृत्ति होती है । वे पराभूत यानी विनष्ट हो गये ।

१. मूलमें 'ततो देवा अभवन् परा असुराः' ऐसा पाठ है । इसमें एक वाक्य 'ततो देवा अभवन्' है और दूसरा 'असुरा परा अभवन् ( पराभवन् )' है । इसमें 'अभवन्' क्रियाकी अनुवृत्ति हुई है ।

११८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

११८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| यथा पुराकल्पेन वर्णितः पूर्वयजमानोऽतिक्रान्तकालिकः एतामेवाख्यायिकारूपां श्रुतिं दृष्ट्वा तेनैव क्रमेण वागादिदेवताः परीक्ष्य, ताश्चापोहासङ्गपाप्मास्पददोषवत्त्वेनादोषास्पदं मुख्यं प्राणमात्मत्वेनोपगम्य वागाद्याध्यात्मिकपिण्डमात्रपरिच्छिन्नात्माभिमानं हित्वा वैराजपिण्डाभिमानं वागाद्यग्न्याद्यात्मविषयं वर्तमानप्रजापतित्वं शास्त्रप्रकाशितं प्रतिपन्नः, तथैवायं यजमानस्तेनैव विधिना भवति प्रजापतिस्वरूपेणात्मना । परश्चास्य प्रजापतित्वप्रतिपक्षभूतः पाप्मा द्विषन्भ्रातृव्यो भवति । यतोऽद्वेष्टापि भवति कश्चिद् भ्रातृव्यो भरतादितुल्यः, यस्त्विन्द्रियविषयासङ्गजनितः पाप्मा भ्रातृव्यो द्वेष्टा च, पारमार्थिकात्मस्वरूपतिरस्करणहेतुत्वात् स च पराभवति विशीर्यते लोष्ट- | जिस प्रकार पूर्वोक्त कल्पनाके अनुसार वर्णित पूर्व यानी भूतकालिक यजमान इस आख्यायिकारूपा श्रुतिको देखकर उसी क्रमसे वागादि देवताओंकी परीक्षा कर उन्हें अभिनिवेशजनित पापके संसर्गरूप दोषके कारण त्यागकर जो दोषका आश्रय नहीं है उस मुख्य प्राणको ही आत्मभावसे प्राप्त हो आध्यात्मिक पिण्डमात्रसे परिच्छिन्न वागादिमें आत्मत्वका अभिमान छोड़कर वागादिकी अग्न्यादिरूपताविषयक शास्त्रप्रकाशित विराट्पिण्डाभिमान यानी वर्तमान-प्रजापतित्वको प्राप्त हुआ था, उसी प्रकार यह वर्तमान यजमान भी उसी क्रमसे प्रजापतिरूपसे स्थित होता है। तथा इसके प्रजापतित्वका प्रतिपक्षभूत पापरूपी द्वेष करनेवाला भ्रातृव्य (सौतेला भाई) पराभवको प्राप्त होता है। भरतादिके समान कोई-कोई भ्रातृव्य द्वेष न करनेवाला भी होता है किंतु जो इन्द्रियोंके विषयोंकी आसक्तिसे होनेवाला पापरूपी भ्रातृव्य है वह द्वेष्टा ही होता है; कारण, वह आत्माके पारमार्थिक स्वरूपके तिरस्कारका हेतु होता है। प्राणका सङ्ग होनेपर मृत्पिण्डके समान |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [११९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [११९


| वत्प्राणपरिश्वङ्गात् । कस्यैतत्फ- <br> लम् ? इत्याह—य एवं वेद । <br> यथोक्तं प्राणमात्मत्वेन प्रतिपद्यते <br> पूर्वयजमानवदित्यर्थः ॥ ७ ॥ | पराभूत—नष्ट हो जाता है। यह <br> फल किसको मिलता है ? इसपर <br> श्रुति कहती है—'जो ऐसा जानता <br> है; अर्थात् पूर्वयजमानके समान जो <br> उपर्युक्त प्राणको आत्मस्वरूपसे <br> जानता है' ॥ ७ ॥ |


मुख्य प्राणका आङ्गिरसत्व

| फलमुपसंहृत्याधुनाख्यायिका- <br> रूपमेवाश्रित्याह—कस्माच्च हेतो- <br> र्वागादीन्मुक्त्वा मुख्य एव प्राण <br> आत्मत्वेनाश्रयितव्यः ? इति <br> तदुपपत्तिनिरूपणाय यस्मादयं <br> वागादीनां पिण्डादीनां च साधा- <br> रण आत्मा, इत्येतमर्थमाख्या- <br> यिकया दर्शयन्त्याह श्रुतिः— | फलका उपसंहार कर^१ अब <br> श्रुति आख्यायिकाके ही रूपका <br> आश्रय करके कहती है—वागादि <br> अन्य सब प्राणोंको छोड़कर मुख्य <br> प्राणका ही आत्मभावसे क्यों आश्रय <br> लेना चाहिये ? उसकी उपपत्ति <br> बतलानेके लिये, अर्थात् क्योंकि यह <br> मुख्यप्राण वागादि और पिण्डादिका <br> साधारण आत्मा है [ इसलिये यही <br> आत्मभावसे आश्रयितव्य है ]—इस <br> अर्थको आख्यायिकासे दिखलाते <br> हुए श्रुति कहती है— |

ते होचुः क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्ये- ऽन्तरिति सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥

वे बोले, "जिसने हमें इस प्रकार असक्त—देवभावको प्राप्त किया है, वह कहाँ है ?" [ उन्होंने विचार करके निश्चय किया कि ] "यह आस्य ( मुख ) के भीतर है, अतः यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अङ्गोंका रस है" ॥ ८ ॥


१. अर्थात् फलयुक्त प्रधान विधिका वर्णन कर ।

१२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१२०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
ते प्रजापतिप्राणा मुख्येन प्राणेन परिप्रापितदेवस्वरूपा होचुरक्तवन्तः फलावस्थाः। किम्? इत्याह-क्व न्विति वितर्के। क्व नु कस्मिन्नु सोऽभूत्। कः? यो नोऽस्मानित्थमनेवमसक्त सञ्जितवान्देवभावमात्मत्वेनोपगमितवान्। स्मरन्ति हि लोके केनचिदुपकृता उपकारिणम्।मुख्य प्राणके द्वारा देवस्वरूपको प्राप्त कराये हुए वे प्रजापतिके फलावस्थित प्राण कहने लगे। क्या कहने लगे? सो बतलाते हैं—"क्व नु' यह वितर्क अर्थमें है। अर्थात्, भला वह कहाँ—किसमें रहता है? कौन? जिसने हमें इस प्रकार असक्त—सज्जित किया अर्थात् आत्मभावसे देवत्वको प्राप्त कराया है।" लोकमें किसीके द्वारा उपकृत होनेवाले लोग उस उपकारीका स्मरण किया ही करते हैं।
लोकवदेव स्मरन्तो विचारयमाणाः कार्यकारणसंघाते आत्मन्येवोपलब्धवन्तः। कथम्? अयमास्येऽन्तरिति, आस्ये मुखे य आकाशस्तस्मिन्नन्तरयं प्रत्यक्षो वर्तत इति। सर्वो हि लोको विचार्याध्यवस्यति, तथा देवाः।इस प्रकार लोकवत् स्मरण—विचार करते हुए उन्होंने उसे भूत और इन्द्रियोंके संघात रूप अपने शरीरमें ही उपलब्ध किया। किस प्रकार उपलब्ध किया?—यह आस्यके भीतर है—आस्य अर्थात् मुखमें जो आकाश है उसीमें यह प्रत्यक्ष विद्यमान है। सभी लोग विचारकर निश्चय करते हैं। उसी प्रकार देवोंने भी किया।
यस्मादयमन्तराकाशे वागाद्यात्मत्वेन विशेषमनाश्रित्य वर्तमान उपलब्धो देवैः, तस्मात्स प्राणोऽयास्यो विशेषानाश्रयाच्चक्योंकि देवताओंने इसे वागादि रूपसे किसी विशेषका आश्रय न करके अन्तराकाशमें ही उपलब्ध किया था इसलिये वह प्राण अयास्य है, तथा किसी विशेष इन्द्रियका आश्रय न करनेके कारण उसने