भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124
११८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| यथा पुराकल्पेन वर्णितः पूर्वयजमानोऽतिक्रान्तकालिकः एतामेवाख्यायिकारूपां श्रुतिं दृष्ट्वा तेनैव क्रमेण वागादिदेवताः परीक्ष्य, ताश्चापोहासङ्गपाप्मास्पददोषवत्त्वेनादोषास्पदं मुख्यं प्राणमात्मत्वेनोपगम्य वागाद्याध्यात्मिकपिण्डमात्रपरिच्छिन्नात्माभिमानं हित्वा वैराजपिण्डाभिमानं वागाद्यग्न्याद्यात्मविषयं वर्तमानप्रजापतित्वं शास्त्रप्रकाशितं प्रतिपन्नः, तथैवायं यजमानस्तेनैव विधिना भवति प्रजापतिस्वरूपेणात्मना । परश्चास्य प्रजापतित्वप्रतिपक्षभूतः पाप्मा द्विषन्भ्रातृव्यो भवति । यतोऽद्वेष्टापि भवति कश्चिद् भ्रातृव्यो भरतादितुल्यः, यस्त्विन्द्रियविषयासङ्गजनितः पाप्मा भ्रातृव्यो द्वेष्टा च, पारमार्थिकात्मस्वरूपतिरस्करणहेतुत्वात् स च पराभवति विशीर्यते लोष्ट- | जिस प्रकार पूर्वोक्त कल्पनाके अनुसार वर्णित पूर्व यानी भूतकालिक यजमान इस आख्यायिकारूपा श्रुतिको देखकर उसी क्रमसे वागादि देवताओंकी परीक्षा कर उन्हें अभिनिवेशजनित पापके संसर्गरूप दोषके कारण त्यागकर जो दोषका आश्रय नहीं है उस मुख्य प्राणको ही आत्मभावसे प्राप्त हो आध्यात्मिक पिण्डमात्रसे परिच्छिन्न वागादिमें आत्मत्वका अभिमान छोड़कर वागादिकी अग्न्यादिरूपताविषयक शास्त्रप्रकाशित विराट्पिण्डाभिमान यानी वर्तमान-प्रजापतित्वको प्राप्त हुआ था, उसी प्रकार यह वर्तमान यजमान भी उसी क्रमसे प्रजापतिरूपसे स्थित होता है। तथा इसके प्रजापतित्वका प्रतिपक्षभूत पापरूपी द्वेष करनेवाला भ्रातृव्य (सौतेला भाई) पराभवको प्राप्त होता है। भरतादिके समान कोई-कोई भ्रातृव्य द्वेष न करनेवाला भी होता है किंतु जो इन्द्रियोंके विषयोंकी आसक्तिसे होनेवाला पापरूपी भ्रातृव्य है वह द्वेष्टा ही होता है; कारण, वह आत्माके पारमार्थिक स्वरूपके तिरस्कारका हेतु होता है। प्राणका सङ्ग होनेपर मृत्पिण्डके समान |