बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [११९
| वत्प्राणपरिश्वङ्गात् । कस्यैतत्फ- <br> लम् ? इत्याह—य एवं वेद । <br> यथोक्तं प्राणमात्मत्वेन प्रतिपद्यते <br> पूर्वयजमानवदित्यर्थः ॥ ७ ॥ | पराभूत—नष्ट हो जाता है। यह <br> फल किसको मिलता है ? इसपर <br> श्रुति कहती है—'जो ऐसा जानता <br> है; अर्थात् पूर्वयजमानके समान जो <br> उपर्युक्त प्राणको आत्मस्वरूपसे <br> जानता है' ॥ ७ ॥ |
मुख्य प्राणका आङ्गिरसत्व
| फलमुपसंहृत्याधुनाख्यायिका- <br> रूपमेवाश्रित्याह—कस्माच्च हेतो- <br> र्वागादीन्मुक्त्वा मुख्य एव प्राण <br> आत्मत्वेनाश्रयितव्यः ? इति <br> तदुपपत्तिनिरूपणाय यस्मादयं <br> वागादीनां पिण्डादीनां च साधा- <br> रण आत्मा, इत्येतमर्थमाख्या- <br> यिकया दर्शयन्त्याह श्रुतिः— | फलका उपसंहार कर^१ अब <br> श्रुति आख्यायिकाके ही रूपका <br> आश्रय करके कहती है—वागादि <br> अन्य सब प्राणोंको छोड़कर मुख्य <br> प्राणका ही आत्मभावसे क्यों आश्रय <br> लेना चाहिये ? उसकी उपपत्ति <br> बतलानेके लिये, अर्थात् क्योंकि यह <br> मुख्यप्राण वागादि और पिण्डादिका <br> साधारण आत्मा है [ इसलिये यही <br> आत्मभावसे आश्रयितव्य है ]—इस <br> अर्थको आख्यायिकासे दिखलाते <br> हुए श्रुति कहती है— |
ते होचुः क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्ये- ऽन्तरिति सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥
वे बोले, "जिसने हमें इस प्रकार असक्त—देवभावको प्राप्त किया है, वह कहाँ है ?" [ उन्होंने विचार करके निश्चय किया कि ] "यह आस्य ( मुख ) के भीतर है, अतः यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अङ्गोंका रस है" ॥ ८ ॥
१. अर्थात् फलयुक्त प्रधान विधिका वर्णन कर ।