बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 126, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 126
| १२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| ते प्रजापतिप्राणा मुख्येन प्राणेन परिप्रापितदेवस्वरूपा होचुरक्तवन्तः फलावस्थाः। किम्? इत्याह-क्व न्विति वितर्के। क्व नु कस्मिन्नु सोऽभूत्। कः? यो नोऽस्मानित्थमनेवमसक्त सञ्जितवान्देवभावमात्मत्वेनोपगमितवान्। स्मरन्ति हि लोके केनचिदुपकृता उपकारिणम्। | मुख्य प्राणके द्वारा देवस्वरूपको प्राप्त कराये हुए वे प्रजापतिके फलावस्थित प्राण कहने लगे। क्या कहने लगे? सो बतलाते हैं—"क्व नु' यह वितर्क अर्थमें है। अर्थात्, भला वह कहाँ—किसमें रहता है? कौन? जिसने हमें इस प्रकार असक्त—सज्जित किया अर्थात् आत्मभावसे देवत्वको प्राप्त कराया है।" लोकमें किसीके द्वारा उपकृत होनेवाले लोग उस उपकारीका स्मरण किया ही करते हैं। |
| लोकवदेव स्मरन्तो विचारयमाणाः कार्यकारणसंघाते आत्मन्येवोपलब्धवन्तः। कथम्? अयमास्येऽन्तरिति, आस्ये मुखे य आकाशस्तस्मिन्नन्तरयं प्रत्यक्षो वर्तत इति। सर्वो हि लोको विचार्याध्यवस्यति, तथा देवाः। | इस प्रकार लोकवत् स्मरण—विचार करते हुए उन्होंने उसे भूत और इन्द्रियोंके संघात रूप अपने शरीरमें ही उपलब्ध किया। किस प्रकार उपलब्ध किया?—यह आस्यके भीतर है—आस्य अर्थात् मुखमें जो आकाश है उसीमें यह प्रत्यक्ष विद्यमान है। सभी लोग विचारकर निश्चय करते हैं। उसी प्रकार देवोंने भी किया। |
| यस्मादयमन्तराकाशे वागाद्यात्मत्वेन विशेषमनाश्रित्य वर्तमान उपलब्धो देवैः, तस्मात्स प्राणोऽयास्यो विशेषानाश्रयाच्च | क्योंकि देवताओंने इसे वागादि रूपसे किसी विशेषका आश्रय न करके अन्तराकाशमें ही उपलब्ध किया था इसलिये वह प्राण अयास्य है, तथा किसी विशेष इन्द्रियका आश्रय न करनेके कारण उसने |