बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
| असक्त सञ्जितवान्वागादीन् । अत एवाङ्गिरस आत्मा कार्यकारणानाम् ।<br><br>कथमाङ्गिरसः ? प्रसिद्धं ह्येतदङ्गानां कार्यकारणलक्षणानां रसः सार आत्मेत्यर्थः । कथं पुनरङ्गरसत्वम् ? तदपाये शोषप्राप्तेरिति वक्ष्यामः । यस्माच्चायमङ्गरसत्वाद्विशेषेणानाश्रितत्वाच्च कार्यकारणानां साधारण आत्मा विशुद्धश्च, तस्माद्वागादीनपास्य प्राण एवात्मत्वेनाश्रयितव्य इति वाक्यार्थः। आत्मा ह्यात्मत्वेनोपगन्तव्योऽविपरीतबोधाच्छ्रेयःप्राप्तेः, विपर्यये चानिष्टप्राप्तिदर्शनात् ॥ ८ ॥ | वागादि इन्द्रियोंको असक्त—अग्न्यादि देवभावसे संयुक्त किया । इसीसे वह भूत और इन्द्रियोंका आङ्गिरस आत्मा है ।<br><br>वह आङ्गिरस क्यों है ?—क्योंकि यह कार्य-करणरूप अङ्गोंका रस—सार अर्थात् आत्मा है—ऐसा प्रसिद्ध है। किंतु इसका अङ्गरसत्व क्यों है ? क्योंकि इसके चले जानेपर शरीर सूख जाता है—ऐसा हम आगे कहेंगे। इस प्रकार क्योंकि यह अङ्गरस होनेसे और किसी विशेषके आश्रित न होनेके कारण भूत और इन्द्रियोंका साधारण आत्मा है और विशुद्ध भी है, इसलिये वागादिको छोड़कर प्राणहीका आत्मभावसे आश्रय लेना चाहिये—यह इस वाक्यका तात्पर्य है। आत्माको ही आत्मस्वरूपसे जानना चाहिये, क्योंकि अविपरीत बोधसे ही श्रेय-की प्राप्ति होती है, विपरीत ज्ञानसे तो अनिष्टकी ही प्राप्ति देखी गयी है ॥ ८ ॥ |
प्राणकी शुद्धताका प्रतिपादन
| स्यान्मतं प्राणस्य विशुद्धिरसिद्धेति । | पूर्व०—हमारा विचार है कि प्राणकी विशुद्धि सिद्ध नहीं होती। |