बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तथैव घ्राणादिदेवता उद्गीथनिर्वर्तकत्वाज्जपमन्त्रप्रकाश्या उपास्याश्चेति क्रमेण परीक्षितवन्तः। देवानां चैतन्निश्चितमासीत्—वागादिदेवताः क्रमेण परीक्ष्यमाणाः कल्याणविषयविशेषात्मसम्बन्धासङ्गहेतोरासुरपाप्मसंसर्गाद् उद्गीथनिर्वर्तनासमर्थाः। अतोऽनभिधेयाः “असतो मा सद्मय” इत्यनुपास्याश्च, अशुद्धत्वादितराण्यापकत्वाच्चेति ।<br><br>एवमु खल्वनुक्ता अप्येतास्त्वगादिदेवताः कल्याणाकल्याणकार्यदर्शनादेवं वागादिवदेव, एनाः पाप्मनाऽविध्यन्पाप्मना विद्धवन्त इति यदुक्तं तत्पाप्मभिरुपासृजन्पाप्मभिः संसर्गं कृतवन्त इत्येतत् ॥ ३-६ ॥ | इसी प्रकार घ्राणादि देवता उद्गीथ कर्मके कर्ता होनेसे जप-मन्त्रद्वारा प्रकाश्य और उपास्य हैं—ऐसा जानकर देवताओंने क्रमशः उनकी परीक्षा की। देवताओंको उनके विषयमें यही निश्चय था कि क्रमशः परीक्षा किये जानेपर वागादि देवता कल्याणविषयविशेषका अपने-से सम्बन्ध रखनेकी आसक्तिके कारण आसुर पापका संसर्ग हो जानेसे उद्गीथकर्मका निर्वाह करनेमें समर्थ नहीं हैं। अतः अशुद्ध और दूसरोंमें अव्यापक होनेके कारण “मुझको असत्से सत्की ओर ले जाओ” इस जपमन्त्रसे अप्रकाश्य और अनुपास्य हैं।<br><br>इसी प्रकार, न कहे जानेपर भी, शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके कार्य देखे जानेसे त्वगादि अन्य देवगण भी वागादिके समान ही हैं। इन्हें भी असुरोंने पापसे वेध दिया है। ऊपर जो कहा गया है कि ‘पापसे वेध दिया’ उसका यही तात्पर्य है कि पापके द्वारा उन्हें संश्लिष्ट कर दिया यानी पापसे उनका संसर्ग कर दिया ॥३-६॥ |