भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 1402 में से

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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ११५

मुख्य प्राणका उद्गान, उसका पापविद्ध न होना तथा उसकी उपासनाका फल

वागादिदेवता उपासीना अपि मृत्यवतिगमनायाशरणाः सन्तो देवाः क्रमेण—वागादि देवताओंकी उपासना करनेपर भी मृत्युका अतिक्रमण करनेमें किसीको अपना सहायक न पाकर देवताओंने क्रमशः—

अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यत्सन् । स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवँ हैव विध्वंसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन्परासुराः । भवत्यात्मना परास्य द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७॥

फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिये उद्गान किया। असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध करना चाहा। किंतु जिस प्रकार पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है उसी प्रकार वे विध्वस्त होकर अनेक प्रकारसे नष्ट हो गये। तब देवगण प्रकृतिस्थ हो गये और असुरोंका पराभव हुआ। जो इस प्रकार जानता है वह प्रजापतिरूपसे स्थित होता है और उससे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य (सौतेले भाई) का पराभव होता है ॥७॥

अथानन्तरं ह इममित्यभिनय-तदनन्तर, 'ह इमम्' यह अभिनय (अङ्गुलि आदिद्वारा प्रत्यक्ष संकेत)
प्रदर्शनार्थम् । आसन्यमास्ये भव-प्रदर्शित करनेके लिये है, उन्होंने
मासन्यं मुखान्तर्बिलस्थं प्राणम्-आसन्य—आस्यमें रहनेवाले अर्थात् मुखान्तर्गत छिद्रमें स्थित प्राणसे
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