भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 122
११६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| चुस्त्वं न उद्गायेति। तथेत्येवं शरणमुपगतेभ्यः स एष प्राणो मुख्य उदगायदित्यादि पूर्ववत्। पाप्मनाऽविध्यत्सन्वेधनं कर्तुमिष्टवन्तस्ते च दोषासंसर्गिणं सन्तं मुख्यं प्राणम्। स्वेन आसङ्गदोषेण वागादिषु लब्धप्रसरास्तदभ्यासानुवृत्त्या संस्रक्ष्यमाणा विनेशुर्विनष्टा विध्वस्ताः। | कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब 'तथास्तु' कहकर अपनी शरणमें आये हुए देवताओंके लिये उस मुख्य प्राणने उद्गान किया—इत्यादि सब प्रसङ्ग पूर्ववत् समझना चाहिये। असुरोंने जो दोषके संसर्गसे रहित था उस मुख्य प्राणको पापसे विद्ध करना चाहा। अपने अभिनिवेशरूप दोषके कारण वागादिमें उनकी गति हो गयी थी। किंतु उसी अभ्यासकी अनुवृत्तिसे मुख्य प्राणके साथ संसर्ग करनेको उद्यत होनेपर वे नाशको प्राप्त हो गये अर्थात् विध्वस्त हो गये। | | कथमिव? इति दृष्टान्त उच्यते— | किस प्रकार विध्वस्त हो गये? इस विषयमें दृष्टान्त दिया जाता है। | | स यथा स दृष्टान्तो यथा लोकेऽश्मानं पाषाणमृत्वा गत्वा प्राप्य, लोष्टः पांसुपिण्डः पाषाणचूर्णनायाश्मनि निक्षिप्तः स्वयं विध्वंसेत विस्रंसेत विचूर्णीभवेत्, एवं हैव यथायं दृष्टान्त एवमेव, विध्वंसमाना विशेषेण ध्वंसमाना विष्वञ्चो नानागतयो विनेशुर्विनष्टा | 'स यथा'—जैसा कि वह दृष्टान्त है—लोकमें पाषाणको चूर्ण करनेके लिये फेंका हुआ लोष्ट—मिट्टीका ढेला उस अश्मा यानी पत्थरपर जाकर—पहुँचकर अर्थात् पत्थरको प्राप्त होकर स्वयं विध्वस्त-छिन्न भिन्न यानी चूर्ण हो जाता है उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है वैसे ही वे असुरगण विध्वस्त होकर—विशेषरूपसे ध्वस्त होकर विष्वक् यानी नाना गतियोंको प्राप्त |