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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ४९

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ४९


कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कं ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥

पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्युसे ही आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था। अशनाया ही मृत्यु है। उसने 'मैं आत्मा (मन) से युक्त होऊँ' ऐसा मन किया। उसने अर्चन (पूजन) करते हुए आचरण किया। उसके अर्चन करनेसे आप हुआ। अर्चन करते हुए मेरे लिये क (जल) प्राप्त हुआ है, अतः यही अर्कका¹ अर्कत्व है। जो इस प्रकार अर्कके इस अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क (सुख) होता है ॥ १ ॥

संस्कृतहिन्दी
नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् । इह संसारमण्डले किञ्चन किञ्चिदपि नामरूपप्रविभक्तविशेषं नैवासीद् न बभूव अग्रे प्रागुत्पत्तेर्मनआदेः ।पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। अर्थात् मन आदिकी उत्पत्तिसे पूर्व यहाँ-इस संसारमण्डलमें किञ्चनमात्र—कुछ भी—नाम-रूपमें विभक्त हुआ कोई भी पदार्थविशेष नहीं था।
किं शून्यमेव स्यात् “नैवेह किञ्चन” इति श्रुतेः । <br><br> (सत्कारणवाद-साधनम्) <br><br> न कार्यं कारणं वासीत् । उत्पत्तेश्च, उत्पद्यते हि घटः, अतः प्रागुत्पत्तेर्घटस्य नास्तित्वम् ।शून्यवादी—तो क्या उस समय शून्य ही था, क्योंकि "यहाँ कुछ भी नहीं था" ऐसी श्रुति है। अतः कार्य या कारण कुछ भी नहीं था। इसके सिवा उत्पत्ति होनेसे भी यही सिद्ध होता है। घट उत्पन्न होता है, इसलिये उत्पत्तिसे पूर्व घटकी सत्ता नहीं होती।
ननु कारणस्य न नास्तित्वं मृत्पिण्डादिदर्शनात् । यन्नोप-सिद्धान्ती—किंतु कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि [घटोत्पत्तिसे पूर्व भी] मृत्पिण्डादि देखे

१. 'अर्चते कम् अर्कम्' अर्थात् जिसके अर्चन करनेवालेको क (जल या सुख) हो उसका नाम अर्क है। इस व्युत्पत्तिसे 'अर्क' अग्निको कहते हैं।

बृ० उ० ४—

५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
लभ्यते तस्यैव नास्तिता। अस्तु कार्यस्य न तु कारणस्य, उपलभ्यमानत्वात्।जाते हैं। जो वस्तु उपलब्ध नहीं होती उसीका अभाव होता है। अतः कार्यका अभाव भले ही रहे कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि वह तो उपलब्ध होता ही है।
न; प्रागुत्पत्तेः सर्वानुपलम्भात्। अनुपलब्धिश्चेदभावहेतुः सर्वस्य जगतः प्रागुत्पत्तेर्न कारणं कार्यं वोपलभ्यते। तस्मात्सर्वस्यैवाभावोऽस्तु।शून्यवादी-नहीं, क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व तो सभीकी उपलब्धि नहीं होती। यदि अनुपलब्धि ही अभावका कारण है तो उत्पत्तिसे पूर्व तो सारे जगत्का कारण या कार्य उपलब्ध नहीं होता। अतः सभीका अभाव होना चाहिये।
न; “मृत्युनैवेदमावृतमासीत्” इति श्रुतेः। यदि हि किञ्चिदपि नासीद् येनाव्रियते यच्चाव्रियते तदा नावक्ष्यत् ‘मृत्युनैवेदमावृतम्’ इति। न हि भवति गगनकुसुमच्छन्नो बन्ध्यापुत्र इति। ब्रवीति च ‘मृत्युनैवेदमावृतमासीत्’ इति, तस्माद्येनावृतं कारणेन, यच्चावृतं कार्यं प्रागुत्पत्तेस्तदुभयमासीत्, श्रुतेः प्रामाण्यादनुमेयत्वाच्च।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ "यह मृत्युसे ही आवृत था" ऐसी श्रुति है। यदि उस समय कुछ भी न होता तो जिससे आवृत होता है और जो आवृत होता है उसके विषयमें श्रुति यह न कहती कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था।' वन्ध्यापुत्र आकाश-कुसुमसे आच्छादित होता हो—ऐसा कभी नहीं होता। किंतु श्रुति ऐसा कह रही है कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था', अतः जिस कारणसे आवृत था और जो कार्य आवृत था, उत्पत्तिसे पूर्व वे दोनों ही थे, क्योंकि इसमें श्रुति प्रमाण है और ऐसा अनुमान भी किया जा सकता है।

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१


अनुमीयते च प्रागुत्पत्तेः कार्यकारणयोरस्तित्वम्; कार्यस्य हि सतो जायमानस्य कारणे सत्युत्पत्तिदर्शनात्, असति चादर्शनात्। जगतोऽपि प्रागुत्पत्तेः कारणास्तित्वमनुमीयते घटादिकारणास्तित्ववत् ।उत्पत्तिसे पूर्व कार्य और कारणके अस्तित्वका अनुमान भी किया जा सकता है; क्योंकि उत्पन्न होनेवाले सत्य कार्यकी ही सत्य कारणमें उत्पत्ति देखी जाती है; असत्यमें नहीं देखी जाती। घटादिके कारणकी सत्ताके समान उत्पत्तिसे पूर्व जगत्‌के कारणकी सत्ताका भी अनुमान किया जा सकता है।^१
घटादिकारणस्याप्यसत्त्वमेव, अनुपमृद्य मृत्पिण्डादिकं घटायनुत्पत्तेरिति चेत् ?शून्यवादी—किंतु घटादिके कारणकी भी तो सत्ता नहीं है, क्योंकि मृत्पिण्डादिको नष्ट किये बिना घटादिकी उत्पत्ति ही नहीं होती—यदि ऐसा कहें तो ?^२
न; मृदादेः कारणत्वात् । मृत्सुवर्णादि हि तत्र कारणं घटरुचकादेः, न पिण्डाकारविशेषः, तदभावे भावात् । असत्यपि पिण्डाकारविशेषे मृत्सुवर्णादिकारणद्रव्यमात्रादेव घट-सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि कारण तो मृत्तिकादि हैं। घट और रुचक (कण्ठभूषण) आदिके कारण तो मृत्तिका और सुवर्णादि हैं, उनका पिण्डाकारविशेष कारण नहीं है, क्योंकि उसका अभाव होनेपर भी उन (मृत्तिकादि) की सत्ता तो रहती ही है। पिण्डाकारविशेषके न रहनेपर भी मृत्तिका और सुवर्णादि कारण-द्रव्यमात्रसे ही

१. इससे कारणकी सत्ताका अनुमान किया जाता है। अनुमानका प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये—'विमतं सत्पूर्वं कार्यत्वाद् घटवत्' विवादका विषयभूत जगत् सत् (कारण) पूर्वक है, क्योंकि वह कार्य है, जैसे घट।
२. अतः यह (घटरूप) दृष्टान्त साध्यविकल होनेके कारण उक्त अनुमान प्रामाणिक नहीं है।

| ५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| रुचकादिकार्योत्पत्तिर्दृश्यते । तस्मान्न पिण्डाकारविशेषो घट-रुचकादिकारणम्। असति तु मृत्सुवर्णादिद्रव्ये घटरुचकादिर्न जायत इति मृत्सुवर्णादिद्रव्यमेव कारणम्, न तु पिण्डाकारविशेषः। | घट और रुचकादि कार्यकी उत्पत्ति होती देखी जाती है । अतः घट और रुचकादिका कारण पिण्डाकार-विशेष नहीं है। मृत्तिका और सुवर्णादि द्रव्यके अभावमें घट और रुचकादिकी उत्पत्ति नहीं होती। अतः मृत्तिका और सुवर्णादि द्रव्य ही उनका कारण है, उनका पिण्डाकारविशेष कारण नहीं है। १ | | सर्वं हि कारणं कार्यमुत्पादयत्पूर्वोत्पन्नस्यात्मकर्यस्य तिरोधानं कुर्वत्कार्यान्तरमुत्पादयति, एकस्मिन्कारणे युगपदनेककार्यविरोधात् । न च पूर्वकार्योपमर्दे कारणस्य स्वात्मोपमर्दो भवति । तस्मात्पिण्डाद्युपमर्दे कार्योत्पत्तिदर्शनमहेतुः प्रागुत्पत्तेः कारणासत्त्वे । | सारे ही कारण कार्यकी उत्पत्ति करते समय अपने पूर्वोत्पन्न कार्यका लय करके ही दूसरे कार्यको उत्पन्न करते हैं, क्योंकि एक कारणमें एक साथ अनेक कार्योंकी उत्पत्ति होना विरुद्ध है। किंतु उस पूर्व कार्यका लय होनेसे ही कारणके स्वरूपका लय नहीं होता। अतः पिण्डादिका लय होनेपर कार्यकी उत्पत्ति दिखायी देना उत्पत्तिसे पूर्व कारणकी असत्ताका हेतु नहीं है। | | पिण्डादिव्यतिरेकेण मृदादेरसत्त्वादयुक्तमिति चेत्—पिण्डादिपूर्वकार्योपमर्दे मृदादिकारणं नोपमृद्यते, घटादिकार्यान्तरेऽप्यनुवर्तते इत्येतदयुक्तम्; पिण्ड- | शून्यवादी--किंतु पिण्डादिसे भिन्न मृत्तिकादिकी कोई सत्ता नहीं है, इसलिये ऐसा कहना अनुचित है। पिण्डादि पूर्व कार्यका लय होनेपर मृदादि कारणका लय नहीं होता, वह घटादि कार्यान्तरमें भी अनुवृत्त रहता है—ऐसा कहना |


१ इसलिये ऊपर दिये हुए दृष्टान्तमें साध्यवैकल्य दोष नहीं माना जा सकता।

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५३

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५३


घटादिव्यतिरेकेण मृदादिकारणस्यानुपलम्भादिति चेत् ?उचित नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिसे पृथक् मृत्तिकादि कारणकी उपलब्धि नहीं होती।
न, मृदादिकारणानां घटाद्युत्पत्तौ पिण्डादिनिवृत्तावनुवृत्तिदर्शनात् । सादृश्यादन्वयदर्शनं न कारणानुवृत्तेरिति चेन्न, पिण्डादिगतानां मृदाद्यवयवानामेव घटादौ प्रत्यक्षत्वेऽनुमानाभासात्सा दृश्यादिकल्पनानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि घटादिकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मृत्तिकादि कारणद्रव्योंकी अनुवृत्ति देखी जाती है। यदि कहो कि समानताके कारण उनमें मृत्तिकाका अन्वय देखा जाता है, कारणकी अनुवृत्ति होनेसे नहीं—तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि पिण्डादिगत मृत्तिकादि अवयवोंको ही घटादिमें प्रत्यक्ष देखा जाता है, इसलिये केवल अनुमानाभाससे सादृश्यादिकी कल्पना करना उचित नहीं है।
न च प्रत्यक्षानुमानयोर्विरुद्धाव्यभिचारिता, प्रत्यक्षपूर्वकत्वाद्वनुमानस्य सर्वत्रैवानाश्वासप्रसङ्गात् । यदि च क्षणिकं सर्वं तदेवेदमिति गम्यमानं तद्बुद्धेरप्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वे तस्याइसके सिवा प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंको अव्यभिचारिता (समञ्जसता) में विरोध भी नहीं होता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक होता है, इसलिये [उनमें विरोध होनेपर] सभी जगह अविश्वासका प्रसंग हो जायगा। यदि 'तदेवेदम्' (यह वही है) इस प्रकार ज्ञात होनेवाला सब कुछ क्षणिक है तो उस क्षणिकत्वबुद्धिको प्रमाणित करनेके लिये भी तद्विषयक अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होगी और उसके लिये दूसरी

५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

५४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
अप्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वमित्यनव-तद्बुद्धिकी; इस प्रकार अनवस्था प्राप्त
होनेपर [क्षणिकत्वबुद्धिको स्वतः-
स्थायां तत्सदृशमिदमित्यस्याप्रमाण मानना होगा। ऐसी दशामें]
'यह उसके समान है' यह बुद्धि
भी [ 'तदिदम्' बुद्धिके ही अन्तर्गत
अपि बुद्धेर्मृषात्वात्सर्वत्रानाश्वा-होनेसे ] मिथ्या होनेके कारण
सर्वत्र अविश्वास ही रहेगा।^१ तथा
सतैव । तदिदम्बुद्धयोरपि कर्त्र-'तदिदम्' 'यह' और 'वही'--इन
बुद्धियोंका भी, कोई कर्ता न होनेके
भावे सम्बन्धानुपपत्तिः ।कारण परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव
नहीं होगा।^२
सादृश्यात्तत्सम्बन्ध इति चेन्न,यदि कहो कि सादृशताके कारण
इनका सम्बन्ध हो सकता है--तो
तदिदम्बुद्धयोरितरेतरविषयत्वा-यह भी ठीक नहीं, क्योंकि 'तत्'
'इदम्'-इन बुद्धियोंका इतरेतर-विष-
यत्व (भिन्न-भिन्न विषयोंको ग्रहण
नुपपत्तेः । असति चेतरेतरविष-करना) सिद्ध नहीं होता। जबतक

१. 'तत्' (वह) और 'इदम्' (यह) शब्दसे होनेवाले यावन्मात्र वस्तुज्ञानको प्रत्यभिज्ञा कहते हैं, कोई भी बुद्धि अपने विषयमें स्वतःप्रमाण नहीं होती, उसकी प्रमाणताके लिये अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होती है—ऐसा बौद्ध मानते हैं। बौद्धोंके मतमें प्रत्यभिज्ञामात्र क्षणिक है। अतः उनकी मान्यताके अनुसार क्षणिकत्व बुद्धिको भी प्रमाणित करनेके लिये बुद्ध्यन्तरकी अपेक्षा होगी और फिर उस बुद्धिके लिये दूसरी बुद्धिकी, इस प्रकार अनवस्था दोष होगा; अतः उन्हें क्षणिकत्वादि बुद्धिको स्वतःप्रमाण मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें सादृश्य बुद्धि भी प्रत्यभिज्ञा होनेसे क्षणिक ही हुई, इस प्रकार कहीं भी विश्वास न होगा।

२. 'तत्' और 'इदम्' ये दोनों बुद्धियाँ दो क्षणोंमें होती हैं, एक बुद्धि दूसरे क्षणमें रह नहीं सकती, अतः उसके स्वरूपका तिरोधान न हो जाय इसके लिये उन दोनोंका एक कर्ता (द्रष्टा) में सामानाधिकरण्येन सम्बन्ध मानना चाहिये। परंतु क्षणिक विज्ञानवादीके मतमें दो क्षणोंमें रहनेवाला कोई एक द्रष्टा है नहीं; अतः उन बुद्धियोंका सम्बन्ध असम्भव ही है।

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ५५

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ५५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यत्त्वे सादृश्यग्रहणानुपपत्तिः। <br><br> असत्येव सादृश्ये तद्बुद्धिरिति चेन्न, तदिदम्बुद्धयोरपि सादृश्य-बुद्धिवदसद्विषयत्वप्रसङ्गात्। <br><br> असद्विषयत्वमेव सर्वबुद्धीनामस्त्विति चेन्न, बुद्धिवुद्धेरप्यसद्विषयत्व-प्रसङ्गात्। <br><br> तदप्यस्त्विति चेन्न, सर्वबुद्धीनां मृषात्वेऽसत्यबुद्ध्य-नुपपत्तेः। <br><br> तस्मादसदेतत्सादृश्या-त्तद्बुद्धिरिति। <br><br> अतः सिद्धः प्राक्कार्योत्पत्तेः कारणसद्भावः। <br><br> कार्यस्य चाभिव्यक्तिलिङ्ग- <br> (कार्यसद्भाव-साधनम्) <br> त्वात्। कार्यस्य च सद्भावः प्रागुत्पत्तेःइन बुद्धियोंके विषय भिन्न-भिन्न न हों तबतक इनकी सदृशताका भी ग्रहण नहीं हो सकता। यदि ऐसा मानें कि विषयकी सदृशता न होनेपर भी 'यह वही है' ऐसी बुद्धि होती है तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी अवस्थामें सादृश्य-बुद्धिके समान तद् और इदं-बुद्धियाँ भी असद्विषयक [अर्थात् क्षणिक या भ्रान्त] सिद्ध होंगी। यदि कहो कि सभी बुद्धियोंकी असद्वि-षयता (मिथ्यात्व) ही होने दो, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो बुद्धि-बुद्धिके भी मिथ्या होनेका प्रसंग उपस्थित होगा। यदि कहो, अच्छा ऐसा ही हो, तो यह भी उचित नहीं; क्योंकि इस प्रकार जब सभी बुद्धियाँ मिथ्या होंगी तो असत्यबुद्धिका होना सम्भव नहीं होगा।^१ अतः सादृश्यसे 'यह वही है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है—यह कहना ठीक नहीं है। इसलिये कार्यकी उत्पत्तिसे पूर्व कारणकी सत्ता सिद्ध ही है। <br><br> कार्यकी भी सत्ता है, क्योंकि वह अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला है। उत्पत्तिसे पूर्व कार्यकी भी सत्ता

१. क्योंकि यह सब असत् यानी शून्यरूप है—ऐसा ज्ञान तो सत्य बुद्धिसे ही हो सकता है। सत्ताशून्य बुद्धि असत्‌का भी ग्रहण कैसे करेगी?

५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| सिद्धः। कथमभिव्यक्तिलिङ्गत्वादभिव्यक्तिलिङ्गमस्येति। अभिव्यक्तिः साक्षाद्विज्ञानालम्बनत्वप्राप्तिः। यद्धि लोके प्रावृतं तम आदिना घटादिवस्तु तदालोकादिना प्रावरणतिरस्कारेण विज्ञानविषयत्वं प्राप्नुवत्प्राक्सद्भावं न व्यभिचरति। तथेदमपि जगत्प्रागुत्पत्तेरित्यवगच्छामः। न ह्यविद्यमानो घट उदितेऽप्यादित्ये उपलभ्यते। | सिद्ध होती है। किस प्रकार?--अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला होनेसे, क्योंकि अभिव्यक्ति ही कार्यका लिङ्ग है। साक्षात् विज्ञानालम्बनत्वको प्राप्त होनेका नाम 'अभिव्यक्ति' है। लोकमें जो घट आदि पदार्थ अन्धकारादिसे आच्छादित होता है वही उस आवरणका प्रकाशादिसे तिरस्कार होनेपर विज्ञानकी विषयताको प्राप्त होकर अपनी पूर्वकालिक सत्ताका त्याग नहीं करता। इससे हमें मालूम होता है कि इसी प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् भी था; क्योंकि जो घट विद्यमान नहीं होता, उसकी उपलब्धि सूर्यके उदित होनेपर भी नहीं होती। | | न, तेऽविद्यमानत्वाभावादुपलभ्येतैवेति चेत्। न हि तव घटादिकार्यं कदाचिदप्यविद्यमानमित्युदिते आदित्ये उपलभ्येतैव मृत्पिण्डेऽसन्निहिते तमआद्यावरणे चासति विद्यमानत्वादिति चेत् ? | पूर्व०—ऐसी बात नहीं है। यदि तुम्हारे मतमें कार्य अविद्यमान नहीं है तो उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये। तुम्हारे मतानुसार घटादि कार्य कभी अविद्यमान तो है नहीं, इसलिये जब मृत्पिण्डकी सन्निधि न हो, और अन्धकारादिका आवरण भी न हो, उस समय सूर्योदय होनेपर उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये, क्योंकि वह विद्यमान ही है। |

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५७ |

ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५७
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
न, द्विविधत्वादावरणस्य । घटादिकार्यस्य द्विविधं ह्यावरणं मृदादेरभिव्यक्तस्य तमःकुड्यादि प्राङ्‌मृदोऽभिव्यक्तेर्मृदाद्यवयवानां पिण्डादिकार्यान्तररूपेण संस्थानम् । तस्मात्प्रागुत्पत्तेर्विद्यमानस्यैव घटादिकार्यस्य आवृतत्वाद-नुपलब्धिः । नष्टोत्पन्नभावाभाव-शब्दप्रत्ययभेदस्तु अभिव्यक्ति-तिरोभावयोर्द्विविधत्वापेक्षः ।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आवरण दो प्रकारका है । मृत्तिकादिसे अभिव्यक्त होनेवाले घटादि कार्यका आवरण दो प्रकारका है—( १ ) अन्धकार और भित्ति आदि तथा ( २ ) मृत्तिकासे घटकी अभिव्यक्ति होनेसे पूर्व उस मृत्तिकादिके अवयवोंका पिण्डादि कार्यान्तरके रूपमें स्थित रहना । अतः उत्पत्तिसे पूर्व घटादि विद्यमान कार्यकी ही, आवृत होनेके कारण, उपलब्धि नहीं होती । नष्ट होना, उत्पन्न होना, रहना, न रहना इत्यादि शब्द और प्रत्ययोंका भेद तो अभिव्यक्ति और तिरोभाव इनकी द्विविधताकी अपेक्षासे है ।
पिण्डकपालादेरावरणवैलक्ष-ण्यादयुक्तमिति चेत् ? तमःकुड्यादि हि घटाद्यावरणं घटादिभिन्न-देशं दृष्टं न तथा घटादिभिन्न-देशे दृष्टे पिण्डकपाले । तस्मात् पिण्डकपालसंस्थानयोर्विद्यमान-स्यैव घटस्यावृतत्वाद् अनुपलब्धि-पूर्व०—किंतु पिण्ड और कपालादि तो आवरणसे भिन्न प्रकारके होते हैं, इसलिये उन्हें आवरण कहना उचित नहीं है । अन्धकार और भित्ति आदि जो घटादिके आवरण हैं, वे तो घटादिसे भिन्न देशमें देखे जाते हैं, किंतु इस प्रकार, पिण्ड और कपाल घटादिसे भिन्न देशमें नहीं देखे जाते । अतः यह कहना ठीक नहीं है कि पिण्ड और कपालके संस्थान (स्वरूप) में विद्यमान ही घटादिकी आवृत

५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

५८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| रित्ययुक्तम् आवरणधर्मवैलक्षण्यादिति चेत् ? | होनेके कारण उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि आवरणके धर्मोंसे उनमें विलक्षणता है—यदि ऐसा कहें तो ? | | न, क्षीरोदकादेः क्षीराद्यावरणेनैकदेशत्वदर्शनात् । घटादिकार्ये कपालचूर्णाद्यवयवानामन्तर्भावादनावरणत्वमिति चेन्न, विभक्तानां कार्यान्तरत्वादावरणत्वोपपत्तेः । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दूधमें मिले हुए जलादिकी अपने आवरण दुग्धादिके साथ एकदेशता देखी जाती है। यदि कहो कि घटादि कार्यमें उसके कपाल एवं चूर्णादि अवयवोंका अन्तर्भाव हो जाता है, इसलिये उनका आवरण है ही नहीं—तो यह ठीक नहीं, क्योंकि विभक्त होनेपर कार्यान्तर होनेके कारण उन्हें आवरण मानना ठीक ही है। | | आवरणाभाव एव यत्नः कर्तव्य इति चेत् ? पिण्डकपालावस्थयोर्विद्यमानमेव घटादिकार्यमावृतत्वान्नोपलभ्यत इति चेद् घटादिकार्यार्थिना तदावरणविनाश एव यत्नः कर्तव्यो न घटाद्युत्पत्तौ; न चैतदस्ति, तस्माद्युक्तं विद्यमानस्यैवावृतत्वादनुपलब्धिरिति चेत् ? | **पूर्व०—**तब तो आवरणकी निवृत्ति करनेका ही प्रयत्न करना चाहिये। यदि तुम्हारे कथनानुसार पिण्ड और कपालकी अवस्थाओंमें वर्तमान घटादि कार्य ही आवृत होनेके कारण उपलब्ध नहीं होता तब तो जिसे घटादि कार्यकी आवश्यकता हो उसे उसके आवरणका नाश करनेका ही यत्न करना चाहिये, घटादिकी उत्पत्तिका नहीं; किंतु ऐसा किया नहीं जाता, इसलिये यह कहना उचित नहीं है कि आवृत होनेके कारण विद्यमान घटादिकी ही उपलब्धि नहीं होती—ऐसा कहें तो ? |

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५९

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५९

संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
न, अनियमात्। न हि विनाशमात्रप्रयत्नादेव घटाद्यभिव्यक्तिर्नियता। तमआद्यावृते घटादौ प्रदीपाद्युत्पत्तौ प्रयत्नदर्शनात्।सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह नियम नहीं है। आवरणके विनाशमात्रका प्रयत्न करनेसे ही घटादिकी उत्पत्ति हो जायगी—ऐसा कोई नियम नहीं है; क्योंकि अन्धकारादिसे आवृत घटादिके प्रकाशके लिये प्रदीप आदिकी उत्पत्तिमें प्रयत्न देखा जाता है।
सोऽपि तमोनाशायैवेति चेत् ? दीपाद्युत्पत्तावपि यः प्रयत्नः सोऽपि तमस्तिरस्करणाय तस्मिन्नष्टे घटः स्वयमेवोपलभ्यते। न हि घटे किञ्चिदाधीयते इति चेत् ?पूर्व०--किंतु वह प्रयत्न भी तो अन्धकारनाशके लिये ही होता है। दीपकादिकी उत्पत्तिके लिये जो प्रयत्न किया जाता है, वह भी अन्धकारकी निवृत्तिके ही लिये होता है; उसकी निवृत्ति होनेपर घट स्वयं ही दिखायी देने लगता है। इससे घटमें कोई बात बढ़ायी नहीं जाती-ऐसा मानें तो ?
न, प्रकाशवतो घटस्योपलभ्यमानत्वात्। यथा प्रकाशविशिष्टो घट उपलभ्यते प्रदीपकरणे न तथा प्राक्प्रदीपकरणात्। तस्मान्न तमस्तिरस्कारायैव प्रदीपकरणं किं तर्हि ? प्रकाशवत्त्वाय। प्रकाशवत्त्वेनैवोपलभ्यमानत्वात्। क्वचि-सिद्धान्ती--ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रकाशयुक्त घटकी ही उपलब्धि होती है। जिस प्रकार दीपक तैयार करनेपर प्रकाशयुक्त घटकी उपलब्धि होती है, उस प्रकार दीपक तैयार होनेसे पूर्व उसकी उपलब्धि नहीं होती। अतः अन्धकारकी निवृत्तिके लिये ही दीपक नहीं जलाया जाता, तो और किसलिये जलाया जाता है ? प्रकाशके लिये, क्योंकि प्रकाशयुक्त होनेपर ही वस्तुकी उपलब्धि होती है। कहीं-

६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

६०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| दावरणविनाशेऽपि यत्नः स्यात्, यथा कुड्यादिविनाशे। तस्मान्न नियमोऽस्त्यभिव्यक्त्यर्थिनावरणविनाश एव यत्नः कार्य इति।<br><br>नियमार्थवत्त्वाच्च। कारणे वर्तमानं कार्यं कार्यान्तराणामावरणमित्यवोचाम। तत्र यदि पूर्वाभिव्यक्तस्य कार्यस्य पिण्डस्य व्यवहितस्य वा कपालस्य विनाश एव यत्नः क्रियेत, तदा विदलचूर्णाद्यपि कार्यं जायेत। तेनाप्यावृतो घटो नोपलभ्यत इति पुनः प्रयत्नान्तरापेक्षैव। तस्माद् घटाद्यभिव्यक्त्यर्थिनो नियत एव कारकव्यापारोऽर्थवान्। तस्मात्प्रागुत्पत्तेरपि सदेव कार्यम्।<br><br>अतीतानागतप्रत्ययभेदाच्च। अतीतो घटोऽनागतो घट इत्येत- | कहीं आवरणका नाश करनेके लिये भी यत्न किया जाता है; जैसे भीत आदिका नाश करनेके लिये। अतः पदार्थकी अभिव्यक्तिके इच्छुकको आवरणके नाशका ही प्रयत्न करना चाहिये—ऐसा कोई नियम नहीं है।<br><br>इसके सिवा नियत व्यापारकी सफलताके लिये भी प्रयत्न करना आवश्यक है। पहले बता चुके हैं कि कारणमें विद्यमान कार्य अन्य कार्यका आवरण होता है। ऐसी अवस्थामें यदि पहले अभिव्यक्त हुए कार्य पिण्डके अथवा व्यवधानयुक्त कपालके नाशका ही प्रयत्न किया जायगा तो उनसे कपालिका (ठीकरी) या चूर्णादि कार्यकी ही उत्पत्ति होगी। उससे आवृत होनेपर भी घटकी उपलब्धि नहीं होगी, इसलिये पुनः प्रयत्नान्तरकी अपेक्षा रहेगी ही। अतः घटादिकी अभिव्यक्तिके इच्छुकका नियतकारकव्यापार (कर्ता-कारण इत्यादि रूपसे किया हुआ प्रयत्न) ही सफल होता है। इसलिये उत्पत्तिसे पूर्व भी कार्य विद्यमान ही है।<br><br>भूत और भविष्यत् प्रतीतियोंके भेदसे भी कार्यकी सत्ता सिद्ध होती है। भूत घट, भविष्यद् घट इन |

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६१


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
योश्च प्रत्ययोर्वर्तमानघटप्रत्यय-<br>वन्न निर्विषयत्वं युक्तम्; अनाग-<br>तार्थिप्रवृत्तेश्च । न ह्यसत्यर्थितया<br>प्रवृत्तिर्लोके दृष्टा । योगिनां चाती-<br>तानागतज्ञानस्य सत्यत्वात् ।<br>असंश्चेद्भविष्यद्घट ईश्वरस्य भविष्य-<br>द्घटविषयं प्रत्यक्षज्ञानं मिथ्या<br>स्यात् न च प्रत्यक्षमुपचर्यते ।<br>घटसद्भावे ह्यनुमानमवोचाम ।<br>विप्रतिषेधाच्च । यदि घटो भवि-<br>ष्यतीति कुलालादिषु व्याप्रिय-<br>माणेषु घटार्थं प्रमाणेन निश्चितं<br>येन च कालेन घटस्य सम्बन्धो<br>भविष्यतीत्युच्यते,तस्मिन्नेव काले<br>घटोऽसन्निति विप्रतिषिद्धमभि-<br>धीयते । भविष्यन्घटोऽसन्निति,<br>न भविष्यतीत्यर्थः । अयं घटो न<br>वर्तत इति यद्वत् ।प्रत्ययोंका भी वर्तमान घटप्रत्ययके समान विषयशून्य होना उचित नहीं है, क्योंकि भविष्यद् घटकी इच्छावाले पुरुषकी प्रवृत्ति देखी जाती है । असत्पदार्थकी इच्छासे लोकमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । इसके सिवा योगियोंका भूत और भविष्यत्सम्बन्धी ज्ञान तो सत्य ही होता है । यदि भावी घट असत् माना जाय तो ईश्वरका भावी घटसम्बन्धी प्रत्यक्ष ज्ञान भी मिथ्या होगा; किंतु प्रत्यक्ष ज्ञान मिथ्या नहीं हो सकता ।<br><br>इसके सिवा घटकी सत्तामें हमने अनुमानप्रमाण भी दिया है । तथा उसकी सत्ता न माननेसे विरोध भी आता है । यदि घटके लिये प्रवृत्त हुए कुम्हार आदिको प्रमाणसे यह निश्चय हो गया है कि घट होगा तो जिस कालसे 'घटका सम्बन्ध होगा' ऐसा कहा जाता है उसी कालमें 'घट नहीं है' ऐसा कथन तो विपरीत ही है । 'भविष्यद् घट असत् है' इसका अर्थ तो यही है कि 'घट उत्पन्न नहीं होगा' जैसे कहा जाय कि 'यह घट विद्यमान नहीं है।'
अथ प्रागुत्पत्तेर्घटोऽसन्नित्यु-<br>च्येत, घटार्थं प्रवृत्तेषु कुलालादिषुऔर यदि यह कहा जाय कि उत्पत्तिसे पूर्व घट असत् है, और इस 'असत्' शब्दका यह अर्थ हो

| ६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |

६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तत्र यथा व्यापाररूपेण वर्तमानास्तावत्कुलालादयः, तथा घटो न वर्तत इत्यसच्छब्दस्यार्थश्चेन्न विरुद्धयते। कस्मात् ? स्वेन हि भविष्यद्रूपेण घटो वर्तते। न हि पिण्डस्य वर्तमानता कपालस्य वा घटस्य भवति। न च तयोर्भविष्यत्ता घटस्य। तस्मात्कुलालादिव्यापारवर्तमानतायां प्रागुत्पत्तेर्घटोऽसन्निति न विरुध्यते। यदि घटस्य यत्स्वं भविष्यत्ताकार्यरूपं तत्प्रतिषिध्येत, तत्प्रतिषेधे विरोधः स्यात्। न तु तद्भावान्प्रतिषेधति। न च सर्वेषां क्रियावतां कारकाणामेकैव वर्तमानता भविष्यत्त्वं वा। | कि कुम्हार आदिके घटके लिये प्रवृत्त होनेपर जिस प्रकार उस अवस्थामें व्यापाररूपसे कुम्हार आदि विद्यमान हैं उस प्रकार घट नहीं है--तो इसमें कोई विरोध नहीं आता। क्यों नहीं आता ? क्योंकि अपने भावीरूपसे तो घट विद्यमान है ही। पिण्ड या कपालकी वर्तमानता घटकी नहीं हो सकती और घटकी भविष्यत्ता उन (पिण्ड और कपाल) की नहीं हो सकती। अतः कुम्हार आदिके व्यापारकी वर्तमानतामें 'उत्पत्तिसे पूर्व घट असत् है' ऐसा कहना भी विरुद्ध नहीं है। किंतु घटका जो भविष्यत्ता^१ कार्यरूप स्वरूप है उसका यदि प्रतिषेध किया जाय तो उसके निषेध करनेपर ही विरोध होगा। सो उसका तो आप निषेध करते नहीं हैं। तथा सम्पूर्ण क्रियावान् कारकोंकी एक ही वर्तमानता या भविष्यत्ता होती हो--ऐसी बात है नहीं। | | अपि च चतुर्विधानामभावानां घटस्येतरेतराभावो घटादन्यो दृष्टो यथा घटाभावः पटादिरेव न घटस्वरूपमेव। न च घटाभावः | इसके सिवा चार प्रकारके ^२अभावोंमें घटका जो अन्योन्याभाव है वह घटसे भिन्न ही देखा जाता है, जैसे घटाभाव पटादि ही है घटका स्वरूप नहीं है। तथा घटाभाव |


१. भविष्यमें प्रकट होनेका भाव ही भविष्यत्ता है।
२. प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव ये अभावके चार

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६३

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६३


| सन्पटोऽभावात्मकः, किं तर्हि ? भावरूप एव । एवं घटस्य प्राक्प्रध्वंसात्यन्ताभावानामपि घटादन्यत्वं स्यात् । घटेन व्यपदिश्यमानत्वाद् घटस्येतरेतराभाववत् । तथैव भावात्मकताभावानाम् । एवं च सति घटस्य प्राग्भाव इति न घटस्वरूपमेव प्रागुत्पत्तेर्नास्ति । | होनेसे ही पट अभावरूप नहीं हो जाता; तो फिर क्या होता है ? वह भावरूप ही रहता है । इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घटसे भिन्न ही हैं, क्योंकि घटके अन्योन्याभावके समान घटके द्वारा इनका उल्लेख किया जाता है । और उस [घटके अन्योन्याभाव पटकी भावरूपता] के ही समान इन अभावोंकी भी भावरूपता है । ऐसा होनेसे 'घटका प्रागभाव है' इस कथनसे यह सिद्ध नहीं होता कि उत्पत्तिसे पूर्व घटका स्वरूप ही नहीं है । | | अथ घटस्य प्रागभाव इति घटस्य यत्स्वरूपं तदेवोच्येत घटस्येतिव्यपदेशानुपपत्तिः। अथ कल्पयित्वा व्यपदिश्येत शिलापुत्रकस्य शरीरमिति यद्वत्, तथापि घटस्य प्रागभाव इति कल्पितस्यै- | और यदि 'घटका प्रागभाव' इस कथनमें घटका जो स्वरूप है वही कहा जाय तो 'घटका' यह कथन ही नहीं बन सकता । १ यदि 'शिलाके पुतलेका शरीर' इस कथनके अनुसार कल्पना करके ऐसा कहा जाय तो भी 'घटका प्रागभाव' इस कथनसे 'घट' शब्दद्वारा कल्पित |


भेद हैं । उत्पत्तिसे पूर्व जो वस्तुका अभाव होता है उसे प्रागभाव कहते हैं; जैसे घटकी उत्पत्तिसे पूर्व उसका अभाव । वस्तुके नाशके पश्चात् उसका प्रध्वंसाभाव होता है; जैसे घट फूट जानेपर उसका अभाव । दो वस्तुओंमेंसे प्रत्येकमें एक दूसरीका अभाव अन्योन्याभाव है; जैसे घटमें पटका और पटमें घटका । त्रिकालाबाधित अभाव अत्यन्ताभाव है; जैसे शशशृङ्गादिका ।

१. क्योंकि षष्ठीविभक्तिबोध्य सम्बन्ध भिन्न पदार्थोंमें ही होता है और तुम प्रागभावको घटका स्वरूप ही बतलाते हो ।

६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १


| वाभावस्य घटेन व्यपदेशो न घटस्वरूपस्यैव। अर्थान्तरं घटाद् घटस्याभाव इति, उक्तोत्तरमेतत्। <br><br> किञ्चान्यत्-प्रागुत्पत्तेः शशविषाणवदभावभूतस्य घटस्य स्वकारणसत्तासम्बन्धानुपपत्तिः, द्विनिष्ठत्वात्सम्बन्धस्य। अयुतसिद्धानामदोष इति चेन्न, भावाभावयोरयुतसिद्धत्वानुपपत्तेः। भावभूतयोर्हि युतसिद्धतायुतसिद्धता वा स्यान्न तु भावाभावयोर्भावयोर्वा। | घटका ही अभाव कहा जायगा, घटके स्वरूपका नहीं।^१ और यदि घटसे घटाभावको भिन्न पदार्थ माना जाय तो इसका उत्तर ऊपर दिया ही जा चुका है।^२ <br><br> एक बात और भी है, उत्पत्तिसे पूर्व शशशृङ्गके समान अभावरूप घटका अपने कारणकी सत्तासे सम्बन्ध होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध तो दोमें ही रहा करता है। यदि कहो कि अयुतसिद्ध पदार्थोंमें ऐसा दोष नहीं आता^३ तो यह ठीक नहीं, क्योंकि भाव और अभावका अयुतसिद्ध होना सम्भव नहीं है। जो पदार्थ भावरूप होते हैं उन्हींकी युतसिद्धता या अयुतसिद्धता हो सकती है, भाव और अभाव अथवा |


१. अर्थात् यदि कहो कि जैसे शिलाका पुतला और उसका शरीर ये एक ही हैं तो भी 'राहुके शिर' के समान उनमें षष्ठीसम्बन्ध कहा जाता है, उसी प्रकार घट और प्रागभावका भी कल्पित अभेद हो सकता है—तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि भावपदार्थोंमें तो ऐसे कल्पित सम्बन्धका व्यपदेश हो सकता है; किंतु अभाव सापेक्ष होता है, उसे अपने प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है, इसलिये उसका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता। अतः घटप्रागभाव घटका स्वरूप नहीं हो सकता।

२. 'इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घटसे भिन्न ही हैं' इस वाक्यसे इसका उत्तर दिया गया है।

३. परस्पर सम्बन्ध रखनेवाले जिन दो पदार्थोंकी अलग-अलग प्रतीति होती है वे युतसिद्ध कहलाते हैं, जैसे घड़ा और रस्सी; तथा जिनकी अलग-अलग प्रतीति नहीं होती अर्थात् जिनमेंसे किसी भी एकको छोड़कर दूसरेकी प्रतीति नहीं होती वे अयुतसिद्ध कहलाते हैं। कार्य और कारण अयुतसिद्ध होते हैं; जैसे घट और मृत्तिका

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५ |

ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ६५

| तस्मात्सदेव कार्यं प्रागुत्पत्तेरिति सिद्धम् । | दो अभावोंकी नहीं । अतः यह सिद्ध हुआ कि उत्पत्तिसे पूर्व कार्य सत् ही है । | | किंलक्षणेन मृत्युनावृतमित्यत आह—अशनायया अशितुमिच्छा अशनाया सैव मृत्योर्लक्षणं तया लक्षितेन मृत्युनाशनायया । कथमशनाया मृत्युः ? इत्युच्यते— | यह सब किस लक्षणवाले मृत्युसे आवृत्त था ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—अशनायासे । अशन (भोजन) की इच्छाका नाम 'अशनाया' है, वही उस मृत्युका लक्षण है; उससे लक्षित जो मृत्यु है उस अशनायासे [यह सब आवृत था] । अशनाया मृत्यु किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है— | | अशनाया हि मृत्युः । हिशब्देन प्रसिद्धं हेतुमवद्योतयति । यो ह्यशितुमिच्छति सोऽशनायानन्तरमेव हन्ति जन्तून्, तेनासावशनायया लक्ष्यते मृत्युरित्यशनाया हीत्याह । | अशनाया ही मृत्यु है। यहाँ 'हि' शब्दसे श्रुति प्रसिद्ध हेतु प्रकट करती है, क्योंकि जो कोई भोजन करना चाहता है वह भोजनकी इच्छा होनेके पीछे ही जीवोंको मारता है। अतः 'अशनाया' शब्दसे यह मृत्यु लक्षित होती है, इसीसे 'अशनाया हि' ऐसा कहा गया है । | | बुद्ध्यात्मनोऽशनाया धर्म इति स एष बुद्ध्यवस्थो हिरण्यगर्भो मृत्युरित्युच्यते । तेन मृत्युनेदं कार्यमावृतमासीत् । यथा पिण्डावस्थया मृदा घटादय आवृताः स्युरिति तद्वत् । तन्मनोऽकुरुत । | अशनाया विज्ञानात्माका धर्म है, अतः बुद्धिमें स्थित हिरण्यगर्भ ही मृत्यु कहा गया है । उस मृत्युसे यह कार्यवर्ग आवृत था । जिस प्रकार पिण्डावस्थामें वर्तमान मृत्तिकासे घटादि आवृत रहते हैं उसी प्रकार [हिरण्यगर्भरूप मृत्युसे यह व्याकृत जगत् व्याप्त था] । 'तन्मनोऽकुरुत' |


बृ० उ० ५—

६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १]

६६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १]

| तदिति मनसो निर्देशः । स प्रकृतो मृत्युर्वक्ष्यमाणकार्यसिसृक्षया तत्कार्यालोचनक्षमं मनः-शब्दवाच्यं संकल्पादिलक्षणमन्तःकरणमकुरुत कृतवान् । | इसमें ‘तत्’ यह शब्द मनका निर्देश करनेवाला है । अर्थात् उस प्रकृत मृत्युने आगे कहे जानेवाले कार्यको रचनेकी इच्छासे उस कार्यकी आलोचना करनेमें समर्थ मनःशब्दवाच्य संकल्पादि लक्षणोंवाला अन्तःकरण किया । | | केनाभिप्रायेण मनोऽकरोत् ? इत्युच्यते—आत्मन्वी आत्मवान् स्यां भवेयम् । अहमनेनात्मना मनसा मनस्वी स्यामित्यभिप्रायः । स प्रजापतिरभिव्यक्तेन मनसा समनस्कः सन्नर्चन्नर्चयन्पूजयन् आत्मानमेव कृतार्थोऽस्मीत्यचरच्चरणमकरोत् । तस्य प्रजापतेरर्चतः पूजयत आपो रसात्मिकाः पूजाङ्गभूता अजायन्तोत्पन्नाः । | किस अभिप्रायसे मन किया ? सो बतलाया जाता है—मैं आत्मन्वी अर्थात् आत्मवान् होऊँ । तात्पर्य यह है कि मैं इस आत्मा यानी मनसे मनस्वी होऊँ । उस प्रजापतिने अभिव्यक्त हुए मनसे मनोयुक्त हो अर्चन-पूजन करते हुए अपने प्रति ही ‘मैं कृतार्थ हूँ’ इस प्रकार आचरण किया । उस प्रजापतिके अर्चन-पूजन करते समय पूजाके अङ्गभूत रसात्मक आप (जल) उत्पन्न हुए । | | अत्राकाशप्रभृतीनां त्रयाणामुत्पत्त्यनन्तरमिति वक्तव्यम्, श्रुत्यन्तरसामर्थ्याद्विकल्पासम्भवाच्च सृष्टिक्रमस्य । अर्चते पूजां कुर्वते वै मे मह्यं कमुदकमभूदित्येवममन्यत यस्मान्मृत्युः, तदेव तस्मादेव हेतोरर्कस्य अग्नेरश्व- | यहाँ जलकी उत्पत्ति आकाशादि (आकाश, वायु और अग्नि) तीन भूतोंकी उत्पत्तिके पीछे हुई ऐसा कहना चाहिये था, क्योंकि अन्य श्रुतिके सामर्थ्यसे यही सिद्ध होता है और सृष्टिक्रमका विकल्प होना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि मृत्युने ऐसा माना था कि अर्चन यानी पूजा करते हुए मेरे लिये क—जल हुआ है, इसीसे अर्थात् इसी |

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [६७

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [६७


मेधक्रतवौपयिकस्यार्कत्वम्कारणसे अर्क यानी अश्वमेधयज्ञमें उपयोगी अग्निका अर्कत्व है, अर्थात् यही उसके अर्कत्वमें हेतु है। यह अग्निके अर्क नामकी व्युत्पत्ति है। तात्पर्य यह है कि अर्चनसे यानी सुखकी हेतुभूता पूजा करनेसे तथा जलका सम्बन्ध होनेसे अग्निका (अर्क) यह गौण (गुणकृत) नाम है।
अर्कत्वे हेतुरित्यर्थः। अग्नेरर्क-
नामनिर्वचनमेतत्। अर्चनात्सु-
खहेतुपूजाकरणाद् अप्सम्बन्धाच्च
अग्नेरेतद्गौणं नामार्क इति।
य एवं यथोक्तमर्कस्यार्कत्वं-जो कोई इस प्रकार उपर्युक्त अर्कका अर्कत्व जानता है उसे क—जल या सुख होता है, क्योंकि 'क' यह जल और सुखका समान नाम है। 'ह' और 'वै' ये निश्चयार्थक निपात हैं। अर्थात् उसके लिये जल या सुख होता ही है। इसे—इस प्रकार जाननेवालेको अर्थात् इस प्रकार जाननेवालेके लिये [जल या सुख] होता है ॥१॥
वेद जानाति। कम्पुदकं सुखं वा
नामसामान्यात्। ह वा इत्यव-
धारणार्थौ। भवत्येवेति। अस्मै
एवंविदे एवंविदर्थं भवति ॥१॥

जलसे विराड्रूप अग्निकी उत्पत्ति

कः पुनरसावर्कः ? इत्युच्यते—यह अर्क कौन है ? सो बतलाया जाता है—

आपो वा अर्कस्तद्यदपाᳵ शर आसीत्तत्स-
महन्यत। सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य
तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥

आप (जल) ही अर्क हैं। उस जलका जो शर (स्थूलभाग) था वह एकत्रित हो गया। वह पृथिवी हो गयी। उसके उत्पन्न होनेपर वह

६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

[ मृत्यु ] थक गया। उस थके और तपे हुए प्रजापतिके शरीरसे उसका सारभूत तेज अग्नि प्रकट हुआ ॥ २ ॥

| आपो वै या अर्चनाङ्गभूतास्ता एवाकोऽग्नेरर्कस्य हेतुत्वात् । अप्सु चाग्निः प्रतिष्ठित इति । न पुनः साक्षादेवार्कस्ताः, तासामप्रकरणात्; अग्नेश्च प्रकरणम् । वक्ष्यति च 'अयमनिरर्कः' (बृह०उ० १ । २ । ७) इति । | निश्चय ही जल जो अर्चनका अङ्गभूत है वही अर्क है, क्योंकि वह अर्कसंज्ञक अग्निका हेतु है। कारण, जलमें ही अग्नि प्रतिष्ठित है। किंतु वह साक्षात् अर्क नहीं है, क्योंकि यहाँ उसका प्रकरण नहीं है; यह तो अग्निका ही प्रकरण है। 'यह अग्नि अर्क है' ऐसा श्रुति कहेगी भी। | | तत्तत्र यदपां शर इव शरो दध्न इव मण्डभूतमासीत्तत्समहन्यत सङ्घातमापद्यत तेजसा बाह्यान्तःपच्यमानम्। लिङ्गव्यत्ययेन वा योऽपां शरः स समहन्यतेति। सा पृथिव्यभवत्स संघातो येयं पृथिवी साभवत् । ताभ्योऽद्भ्यो अण्डमभिनिर्वृत्तमित्यर्थः। | वहाँ उस जलका जो शरके समान शर अर्थात् दहीके मण्ड (घृतपिण्ड) के समान स्थूल भाग था वह संहत हो गया। अर्थात् बाहर और भीतरसे तेजके द्वारा परिपक्व होता हुआ वह इकट्ठा हो गया। अथवा 'यत्'का लिङ्गव्यत्यय कर 'यः अपां शरः' जो जलका शर (स्थूलभाग) था वह एकत्रित हो गया—ऐसा अर्थ करना चाहिये। वह पृथिवी हो गयी, अर्थात् वह संघात, यह जो पृथिवी है वही हो गयी। तात्पर्य यह है कि उस जलसे यह ब्रह्माण्ड निष्पन्न हो गया। | | तस्यां पृथिव्यामुत्पादितायां स मृत्युः प्रजापतिरश्राम्यच्छ्रमयुक्तो बभूव । सर्वो हि लोकः | उस पृथिवीके उत्पन्न होनेपर वह मृत्यु यानी प्रजापति श्रान्त—श्रमयुक्त हो गया, क्योंकि कार्य करके |