बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
| सन्पटोऽभावात्मकः, किं तर्हि ? भावरूप एव । एवं घटस्य प्राक्प्रध्वंसात्यन्ताभावानामपि घटादन्यत्वं स्यात् । घटेन व्यपदिश्यमानत्वाद् घटस्येतरेतराभाववत् । तथैव भावात्मकताभावानाम् । एवं च सति घटस्य प्राग्भाव इति न घटस्वरूपमेव प्रागुत्पत्तेर्नास्ति । | होनेसे ही पट अभावरूप नहीं हो जाता; तो फिर क्या होता है ? वह भावरूप ही रहता है । इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घटसे भिन्न ही हैं, क्योंकि घटके अन्योन्याभावके समान घटके द्वारा इनका उल्लेख किया जाता है । और उस [घटके अन्योन्याभाव पटकी भावरूपता] के ही समान इन अभावोंकी भी भावरूपता है । ऐसा होनेसे 'घटका प्रागभाव है' इस कथनसे यह सिद्ध नहीं होता कि उत्पत्तिसे पूर्व घटका स्वरूप ही नहीं है । | | अथ घटस्य प्रागभाव इति घटस्य यत्स्वरूपं तदेवोच्येत घटस्येतिव्यपदेशानुपपत्तिः। अथ कल्पयित्वा व्यपदिश्येत शिलापुत्रकस्य शरीरमिति यद्वत्, तथापि घटस्य प्रागभाव इति कल्पितस्यै- | और यदि 'घटका प्रागभाव' इस कथनमें घटका जो स्वरूप है वही कहा जाय तो 'घटका' यह कथन ही नहीं बन सकता । १ यदि 'शिलाके पुतलेका शरीर' इस कथनके अनुसार कल्पना करके ऐसा कहा जाय तो भी 'घटका प्रागभाव' इस कथनसे 'घट' शब्दद्वारा कल्पित |
भेद हैं । उत्पत्तिसे पूर्व जो वस्तुका अभाव होता है उसे प्रागभाव कहते हैं; जैसे घटकी उत्पत्तिसे पूर्व उसका अभाव । वस्तुके नाशके पश्चात् उसका प्रध्वंसाभाव होता है; जैसे घट फूट जानेपर उसका अभाव । दो वस्तुओंमेंसे प्रत्येकमें एक दूसरीका अभाव अन्योन्याभाव है; जैसे घटमें पटका और पटमें घटका । त्रिकालाबाधित अभाव अत्यन्ताभाव है; जैसे शशशृङ्गादिका ।
१. क्योंकि षष्ठीविभक्तिबोध्य सम्बन्ध भिन्न पदार्थोंमें ही होता है और तुम प्रागभावको घटका स्वरूप ही बतलाते हो ।