बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| वाभावस्य घटेन व्यपदेशो न घटस्वरूपस्यैव। अर्थान्तरं घटाद् घटस्याभाव इति, उक्तोत्तरमेतत्। <br><br> किञ्चान्यत्-प्रागुत्पत्तेः शशविषाणवदभावभूतस्य घटस्य स्वकारणसत्तासम्बन्धानुपपत्तिः, द्विनिष्ठत्वात्सम्बन्धस्य। अयुतसिद्धानामदोष इति चेन्न, भावाभावयोरयुतसिद्धत्वानुपपत्तेः। भावभूतयोर्हि युतसिद्धतायुतसिद्धता वा स्यान्न तु भावाभावयोर्भावयोर्वा। | घटका ही अभाव कहा जायगा, घटके स्वरूपका नहीं।^१ और यदि घटसे घटाभावको भिन्न पदार्थ माना जाय तो इसका उत्तर ऊपर दिया ही जा चुका है।^२ <br><br> एक बात और भी है, उत्पत्तिसे पूर्व शशशृङ्गके समान अभावरूप घटका अपने कारणकी सत्तासे सम्बन्ध होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध तो दोमें ही रहा करता है। यदि कहो कि अयुतसिद्ध पदार्थोंमें ऐसा दोष नहीं आता^३ तो यह ठीक नहीं, क्योंकि भाव और अभावका अयुतसिद्ध होना सम्भव नहीं है। जो पदार्थ भावरूप होते हैं उन्हींकी युतसिद्धता या अयुतसिद्धता हो सकती है, भाव और अभाव अथवा |
१. अर्थात् यदि कहो कि जैसे शिलाका पुतला और उसका शरीर ये एक ही हैं तो भी 'राहुके शिर' के समान उनमें षष्ठीसम्बन्ध कहा जाता है, उसी प्रकार घट और प्रागभावका भी कल्पित अभेद हो सकता है—तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि भावपदार्थोंमें तो ऐसे कल्पित सम्बन्धका व्यपदेश हो सकता है; किंतु अभाव सापेक्ष होता है, उसे अपने प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है, इसलिये उसका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता। अतः घटप्रागभाव घटका स्वरूप नहीं हो सकता।
२. 'इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अत्यन्ताभाव भी घटसे भिन्न ही हैं' इस वाक्यसे इसका उत्तर दिया गया है।
३. परस्पर सम्बन्ध रखनेवाले जिन दो पदार्थोंकी अलग-अलग प्रतीति होती है वे युतसिद्ध कहलाते हैं, जैसे घड़ा और रस्सी; तथा जिनकी अलग-अलग प्रतीति नहीं होती अर्थात् जिनमेंसे किसी भी एकको छोड़कर दूसरेकी प्रतीति नहीं होती वे अयुतसिद्ध कहलाते हैं। कार्य और कारण अयुतसिद्ध होते हैं; जैसे घट और मृत्तिका