बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५ |
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| तस्मात्सदेव कार्यं प्रागुत्पत्तेरिति सिद्धम् । | दो अभावोंकी नहीं । अतः यह सिद्ध हुआ कि उत्पत्तिसे पूर्व कार्य सत् ही है । | | किंलक्षणेन मृत्युनावृतमित्यत आह—अशनायया अशितुमिच्छा अशनाया सैव मृत्योर्लक्षणं तया लक्षितेन मृत्युनाशनायया । कथमशनाया मृत्युः ? इत्युच्यते— | यह सब किस लक्षणवाले मृत्युसे आवृत्त था ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—अशनायासे । अशन (भोजन) की इच्छाका नाम 'अशनाया' है, वही उस मृत्युका लक्षण है; उससे लक्षित जो मृत्यु है उस अशनायासे [यह सब आवृत था] । अशनाया मृत्यु किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है— | | अशनाया हि मृत्युः । हिशब्देन प्रसिद्धं हेतुमवद्योतयति । यो ह्यशितुमिच्छति सोऽशनायानन्तरमेव हन्ति जन्तून्, तेनासावशनायया लक्ष्यते मृत्युरित्यशनाया हीत्याह । | अशनाया ही मृत्यु है। यहाँ 'हि' शब्दसे श्रुति प्रसिद्ध हेतु प्रकट करती है, क्योंकि जो कोई भोजन करना चाहता है वह भोजनकी इच्छा होनेके पीछे ही जीवोंको मारता है। अतः 'अशनाया' शब्दसे यह मृत्यु लक्षित होती है, इसीसे 'अशनाया हि' ऐसा कहा गया है । | | बुद्ध्यात्मनोऽशनाया धर्म इति स एष बुद्ध्यवस्थो हिरण्यगर्भो मृत्युरित्युच्यते । तेन मृत्युनेदं कार्यमावृतमासीत् । यथा पिण्डावस्थया मृदा घटादय आवृताः स्युरिति तद्वत् । तन्मनोऽकुरुत । | अशनाया विज्ञानात्माका धर्म है, अतः बुद्धिमें स्थित हिरण्यगर्भ ही मृत्यु कहा गया है । उस मृत्युसे यह कार्यवर्ग आवृत था । जिस प्रकार पिण्डावस्थामें वर्तमान मृत्तिकासे घटादि आवृत रहते हैं उसी प्रकार [हिरण्यगर्भरूप मृत्युसे यह व्याकृत जगत् व्याप्त था] । 'तन्मनोऽकुरुत' |
बृ० उ० ५—