बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तत्र यथा व्यापाररूपेण वर्तमानास्तावत्कुलालादयः, तथा घटो न वर्तत इत्यसच्छब्दस्यार्थश्चेन्न विरुद्धयते। कस्मात् ? स्वेन हि भविष्यद्रूपेण घटो वर्तते। न हि पिण्डस्य वर्तमानता कपालस्य वा घटस्य भवति। न च तयोर्भविष्यत्ता घटस्य। तस्मात्कुलालादिव्यापारवर्तमानतायां प्रागुत्पत्तेर्घटोऽसन्निति न विरुध्यते। यदि घटस्य यत्स्वं भविष्यत्ताकार्यरूपं तत्प्रतिषिध्येत, तत्प्रतिषेधे विरोधः स्यात्। न तु तद्भावान्प्रतिषेधति। न च सर्वेषां क्रियावतां कारकाणामेकैव वर्तमानता भविष्यत्त्वं वा। | कि कुम्हार आदिके घटके लिये प्रवृत्त होनेपर जिस प्रकार उस अवस्थामें व्यापाररूपसे कुम्हार आदि विद्यमान हैं उस प्रकार घट नहीं है--तो इसमें कोई विरोध नहीं आता। क्यों नहीं आता ? क्योंकि अपने भावीरूपसे तो घट विद्यमान है ही। पिण्ड या कपालकी वर्तमानता घटकी नहीं हो सकती और घटकी भविष्यत्ता उन (पिण्ड और कपाल) की नहीं हो सकती। अतः कुम्हार आदिके व्यापारकी वर्तमानतामें 'उत्पत्तिसे पूर्व घट असत् है' ऐसा कहना भी विरुद्ध नहीं है। किंतु घटका जो भविष्यत्ता^१ कार्यरूप स्वरूप है उसका यदि प्रतिषेध किया जाय तो उसके निषेध करनेपर ही विरोध होगा। सो उसका तो आप निषेध करते नहीं हैं। तथा सम्पूर्ण क्रियावान् कारकोंकी एक ही वर्तमानता या भविष्यत्ता होती हो--ऐसी बात है नहीं। | | अपि च चतुर्विधानामभावानां घटस्येतरेतराभावो घटादन्यो दृष्टो यथा घटाभावः पटादिरेव न घटस्वरूपमेव। न च घटाभावः | इसके सिवा चार प्रकारके ^२अभावोंमें घटका जो अन्योन्याभाव है वह घटसे भिन्न ही देखा जाता है, जैसे घटाभाव पटादि ही है घटका स्वरूप नहीं है। तथा घटाभाव |
१. भविष्यमें प्रकट होनेका भाव ही भविष्यत्ता है।
२. प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव ये अभावके चार