बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| सिद्धः। कथमभिव्यक्तिलिङ्गत्वादभिव्यक्तिलिङ्गमस्येति। अभिव्यक्तिः साक्षाद्विज्ञानालम्बनत्वप्राप्तिः। यद्धि लोके प्रावृतं तम आदिना घटादिवस्तु तदालोकादिना प्रावरणतिरस्कारेण विज्ञानविषयत्वं प्राप्नुवत्प्राक्सद्भावं न व्यभिचरति। तथेदमपि जगत्प्रागुत्पत्तेरित्यवगच्छामः। न ह्यविद्यमानो घट उदितेऽप्यादित्ये उपलभ्यते। | सिद्ध होती है। किस प्रकार?--अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला होनेसे, क्योंकि अभिव्यक्ति ही कार्यका लिङ्ग है। साक्षात् विज्ञानालम्बनत्वको प्राप्त होनेका नाम 'अभिव्यक्ति' है। लोकमें जो घट आदि पदार्थ अन्धकारादिसे आच्छादित होता है वही उस आवरणका प्रकाशादिसे तिरस्कार होनेपर विज्ञानकी विषयताको प्राप्त होकर अपनी पूर्वकालिक सत्ताका त्याग नहीं करता। इससे हमें मालूम होता है कि इसी प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् भी था; क्योंकि जो घट विद्यमान नहीं होता, उसकी उपलब्धि सूर्यके उदित होनेपर भी नहीं होती। | | न, तेऽविद्यमानत्वाभावादुपलभ्येतैवेति चेत्। न हि तव घटादिकार्यं कदाचिदप्यविद्यमानमित्युदिते आदित्ये उपलभ्येतैव मृत्पिण्डेऽसन्निहिते तमआद्यावरणे चासति विद्यमानत्वादिति चेत् ? | पूर्व०—ऐसी बात नहीं है। यदि तुम्हारे मतमें कार्य अविद्यमान नहीं है तो उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये। तुम्हारे मतानुसार घटादि कार्य कभी अविद्यमान तो है नहीं, इसलिये जब मृत्पिण्डकी सन्निधि न हो, और अन्धकारादिका आवरण भी न हो, उस समय सूर्योदय होनेपर उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये, क्योंकि वह विद्यमान ही है। |