भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ५५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यत्त्वे सादृश्यग्रहणानुपपत्तिः। <br><br> असत्येव सादृश्ये तद्बुद्धिरिति चेन्न, तदिदम्बुद्धयोरपि सादृश्य-बुद्धिवदसद्विषयत्वप्रसङ्गात्। <br><br> असद्विषयत्वमेव सर्वबुद्धीनामस्त्विति चेन्न, बुद्धिवुद्धेरप्यसद्विषयत्व-प्रसङ्गात्। <br><br> तदप्यस्त्विति चेन्न, सर्वबुद्धीनां मृषात्वेऽसत्यबुद्ध्य-नुपपत्तेः। <br><br> तस्मादसदेतत्सादृश्या-त्तद्बुद्धिरिति। <br><br> अतः सिद्धः प्राक्कार्योत्पत्तेः कारणसद्भावः। <br><br> कार्यस्य चाभिव्यक्तिलिङ्ग- <br> (कार्यसद्भाव-साधनम्) <br> त्वात्। कार्यस्य च सद्भावः प्रागुत्पत्तेःइन बुद्धियोंके विषय भिन्न-भिन्न न हों तबतक इनकी सदृशताका भी ग्रहण नहीं हो सकता। यदि ऐसा मानें कि विषयकी सदृशता न होनेपर भी 'यह वही है' ऐसी बुद्धि होती है तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी अवस्थामें सादृश्य-बुद्धिके समान तद् और इदं-बुद्धियाँ भी असद्विषयक [अर्थात् क्षणिक या भ्रान्त] सिद्ध होंगी। यदि कहो कि सभी बुद्धियोंकी असद्वि-षयता (मिथ्यात्व) ही होने दो, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो बुद्धि-बुद्धिके भी मिथ्या होनेका प्रसंग उपस्थित होगा। यदि कहो, अच्छा ऐसा ही हो, तो यह भी उचित नहीं; क्योंकि इस प्रकार जब सभी बुद्धियाँ मिथ्या होंगी तो असत्यबुद्धिका होना सम्भव नहीं होगा।^१ अतः सादृश्यसे 'यह वही है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है—यह कहना ठीक नहीं है। इसलिये कार्यकी उत्पत्तिसे पूर्व कारणकी सत्ता सिद्ध ही है। <br><br> कार्यकी भी सत्ता है, क्योंकि वह अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला है। उत्पत्तिसे पूर्व कार्यकी भी सत्ता

१. क्योंकि यह सब असत् यानी शून्यरूप है—ऐसा ज्ञान तो सत्य बुद्धिसे ही हो सकता है। सत्ताशून्य बुद्धि असत्‌का भी ग्रहण कैसे करेगी?