बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| अप्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वमित्यनव- | तद्बुद्धिकी; इस प्रकार अनवस्था प्राप्त |
| होनेपर [क्षणिकत्वबुद्धिको स्वतः- | |
| स्थायां तत्सदृशमिदमित्यस्या | प्रमाण मानना होगा। ऐसी दशामें] |
| 'यह उसके समान है' यह बुद्धि | |
| भी [ 'तदिदम्' बुद्धिके ही अन्तर्गत | |
| अपि बुद्धेर्मृषात्वात्सर्वत्रानाश्वा- | होनेसे ] मिथ्या होनेके कारण |
| सर्वत्र अविश्वास ही रहेगा।^१ तथा | |
| सतैव । तदिदम्बुद्धयोरपि कर्त्र- | 'तदिदम्' 'यह' और 'वही'--इन |
| बुद्धियोंका भी, कोई कर्ता न होनेके | |
| भावे सम्बन्धानुपपत्तिः । | कारण परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव |
| नहीं होगा।^२ | |
| सादृश्यात्तत्सम्बन्ध इति चेन्न, | यदि कहो कि सादृशताके कारण |
| इनका सम्बन्ध हो सकता है--तो | |
| तदिदम्बुद्धयोरितरेतरविषयत्वा- | यह भी ठीक नहीं, क्योंकि 'तत्' |
| 'इदम्'-इन बुद्धियोंका इतरेतर-विष- | |
| यत्व (भिन्न-भिन्न विषयोंको ग्रहण | |
| नुपपत्तेः । असति चेतरेतरविष- | करना) सिद्ध नहीं होता। जबतक |
१. 'तत्' (वह) और 'इदम्' (यह) शब्दसे होनेवाले यावन्मात्र वस्तुज्ञानको प्रत्यभिज्ञा कहते हैं, कोई भी बुद्धि अपने विषयमें स्वतःप्रमाण नहीं होती, उसकी प्रमाणताके लिये अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होती है—ऐसा बौद्ध मानते हैं। बौद्धोंके मतमें प्रत्यभिज्ञामात्र क्षणिक है। अतः उनकी मान्यताके अनुसार क्षणिकत्व बुद्धिको भी प्रमाणित करनेके लिये बुद्ध्यन्तरकी अपेक्षा होगी और फिर उस बुद्धिके लिये दूसरी बुद्धिकी, इस प्रकार अनवस्था दोष होगा; अतः उन्हें क्षणिकत्वादि बुद्धिको स्वतःप्रमाण मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें सादृश्य बुद्धि भी प्रत्यभिज्ञा होनेसे क्षणिक ही हुई, इस प्रकार कहीं भी विश्वास न होगा।
२. 'तत्' और 'इदम्' ये दोनों बुद्धियाँ दो क्षणोंमें होती हैं, एक बुद्धि दूसरे क्षणमें रह नहीं सकती, अतः उसके स्वरूपका तिरोधान न हो जाय इसके लिये उन दोनोंका एक कर्ता (द्रष्टा) में सामानाधिकरण्येन सम्बन्ध मानना चाहिये। परंतु क्षणिक विज्ञानवादीके मतमें दो क्षणोंमें रहनेवाला कोई एक द्रष्टा है नहीं; अतः उन बुद्धियोंका सम्बन्ध असम्भव ही है।