बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 59, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
| घटादिव्यतिरेकेण मृदादिकारणस्यानुपलम्भादिति चेत् ? | उचित नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिसे पृथक् मृत्तिकादि कारणकी उपलब्धि नहीं होती। |
|---|---|
| न, मृदादिकारणानां घटाद्युत्पत्तौ पिण्डादिनिवृत्तावनुवृत्तिदर्शनात् । सादृश्यादन्वयदर्शनं न कारणानुवृत्तेरिति चेन्न, पिण्डादिगतानां मृदाद्यवयवानामेव घटादौ प्रत्यक्षत्वेऽनुमानाभासात्सा दृश्यादिकल्पनानुपपत्तेः । | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि घटादिकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मृत्तिकादि कारणद्रव्योंकी अनुवृत्ति देखी जाती है। यदि कहो कि समानताके कारण उनमें मृत्तिकाका अन्वय देखा जाता है, कारणकी अनुवृत्ति होनेसे नहीं—तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि पिण्डादिगत मृत्तिकादि अवयवोंको ही घटादिमें प्रत्यक्ष देखा जाता है, इसलिये केवल अनुमानाभाससे सादृश्यादिकी कल्पना करना उचित नहीं है। |
| न च प्रत्यक्षानुमानयोर्विरुद्धाव्यभिचारिता, प्रत्यक्षपूर्वकत्वाद्वनुमानस्य सर्वत्रैवानाश्वासप्रसङ्गात् । यदि च क्षणिकं सर्वं तदेवेदमिति गम्यमानं तद्बुद्धेरप्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वे तस्या | इसके सिवा प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंको अव्यभिचारिता (समञ्जसता) में विरोध भी नहीं होता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक होता है, इसलिये [उनमें विरोध होनेपर] सभी जगह अविश्वासका प्रसंग हो जायगा। यदि 'तदेवेदम्' (यह वही है) इस प्रकार ज्ञात होनेवाला सब कुछ क्षणिक है तो उस क्षणिकत्वबुद्धिको प्रमाणित करनेके लिये भी तद्विषयक अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होगी और उसके लिये दूसरी |