बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 55, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 55
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कं ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥
पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्युसे ही आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था। अशनाया ही मृत्यु है। उसने 'मैं आत्मा (मन) से युक्त होऊँ' ऐसा मन किया। उसने अर्चन (पूजन) करते हुए आचरण किया। उसके अर्चन करनेसे आप हुआ। अर्चन करते हुए मेरे लिये क (जल) प्राप्त हुआ है, अतः यही अर्कका¹ अर्कत्व है। जो इस प्रकार अर्कके इस अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क (सुख) होता है ॥ १ ॥
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् । इह संसारमण्डले किञ्चन किञ्चिदपि नामरूपप्रविभक्तविशेषं नैवासीद् न बभूव अग्रे प्रागुत्पत्तेर्मनआदेः । | पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। अर्थात् मन आदिकी उत्पत्तिसे पूर्व यहाँ-इस संसारमण्डलमें किञ्चनमात्र—कुछ भी—नाम-रूपमें विभक्त हुआ कोई भी पदार्थविशेष नहीं था। |
| किं शून्यमेव स्यात् “नैवेह किञ्चन” इति श्रुतेः । <br><br> (सत्कारणवाद-साधनम्) <br><br> न कार्यं कारणं वासीत् । उत्पत्तेश्च, उत्पद्यते हि घटः, अतः प्रागुत्पत्तेर्घटस्य नास्तित्वम् । | शून्यवादी—तो क्या उस समय शून्य ही था, क्योंकि "यहाँ कुछ भी नहीं था" ऐसी श्रुति है। अतः कार्य या कारण कुछ भी नहीं था। इसके सिवा उत्पत्ति होनेसे भी यही सिद्ध होता है। घट उत्पन्न होता है, इसलिये उत्पत्तिसे पूर्व घटकी सत्ता नहीं होती। |
| ननु कारणस्य न नास्तित्वं मृत्पिण्डादिदर्शनात् । यन्नोप- | सिद्धान्ती—किंतु कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि [घटोत्पत्तिसे पूर्व भी] मृत्पिण्डादि देखे |
१. 'अर्चते कम् अर्कम्' अर्थात् जिसके अर्चन करनेवालेको क (जल या सुख) हो उसका नाम अर्क है। इस व्युत्पत्तिसे 'अर्क' अग्निको कहते हैं।
बृ० उ० ४—