भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 54
४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| गन्धर्वानवहदित्यनुषङ्गः । तथार्वा भूत्वासुरान् । अश्वो भूत्वा मनुष्यान्। समुद्र एवेति परमात्मा बन्धुर्बन्धनं बध्यतेऽस्मिन्निति । समुद्रो योनिः कारणमुत्पत्तिं प्रति। एवमसौ शुद्धयोनिः शुद्धस्थितिरिति स्तूयते । “अप्सु योनिर्व्वा अश्वः” इति श्रुतेः प्रसिद्ध एव वा समुद्रो योनिः ॥ २ ॥ | अतः इसका सम्बन्ध इस प्रकार है—वाजी होकर उसने गन्धर्वोंका वहन किया तथा अर्वा होकर असुरोंका और अश्व होकर मनुष्योंका वहन किया । समुद्र अर्थात् परमात्मा ही इसका बन्धु–बन्धन है, क्योंकि इसीमें यह बाँधा जाता है तथा समुद्र ही योनि यानी इसकी उत्पत्तिमें कारण है। इस प्रकार यह शुद्ध योनि और शुद्ध स्थितिवाला है—ऐसा कहकर इसकी स्तुति की जाती है। अथवा “अश्व जलमें योनिवाला है” इस श्रुतिके अनुसार प्रसिद्ध समुद्र ही इसकी योनि है ॥ २ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये प्रथममश्वमेधब्राह्मणम् ॥ १ ॥

द्वितीय ब्राह्मण

अश्वमेधसम्बन्धी अग्निकी उत्पत्ति

| अथाग्नेरश्वमेधोपयोगिकस्योत्पत्तिरुच्यते । तद्विषयदर्शनविवक्षयैवोत्पत्तिः स्तुत्यर्था । | अब आगे अश्वमेधमें उपयोगी अग्निकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है। तद्विषयक दृष्टि कहनेकी इच्छासे ही जो उसकी उत्पत्ति कही जाती है वह स्तुतिके लिये है। |

नैवेह किञ्चनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत् ।
अशनाययाशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मे