भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 53

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७


विभूतिरेषा यत्सौवर्णो राजतश्च ग्रहावुभयतः स्थाप्येते। तावेतौ वै महिमानौ महिमाख्यौ ग्रहावश्वमभितः सम्बभूवतुरुक्तलक्षणावेव सम्भूतौ। इत्थमसावश्वो महत्त्वयुक्त इति पुनर्वचनं स्तुत्यर्थम्।इसके आगे-पीछे सुवर्ण और चाँदीके ग्रह (पात्रविशेष) रखे जाते हैं। वे ये महिमा अर्थात् ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाले महिमासंज्ञक ग्रह ही अश्वके आगे-पीछे प्रकट हुए हैं। इस प्रकार यह अश्व महत्त्वयुक्त है—यह पुनरुक्ति अश्वकी स्तुतिके लिये है।
तथा च हयो भूत्वेत्यादि स्तुत्यर्थमेव। हयो हिनोतेर्गतिकर्मणो विशिष्टगतिरित्यर्थः। जातिविशेषो वा। देवानवहद् देवत्वमगमयत्प्रजापतित्वात्। देवानां वा वोढाभवत्।तथा 'हयो भूत्वा' इत्यादि वाक्य भी अश्वकी स्तुतिके ही लिये है। गतिकर्मक 'हि' धातुका रूप 'हय' है, अतः 'हय' का अर्थ विशिष्टगतिमान् है। अथवा 'हय' अश्वकी जातिविशेष है। हय होकर उसने देवताओंको वहन किया अर्थात् प्रजापति होनेके कारण उन्हें देवत्वको प्राप्त कराया; अथवा वह देवताओंका वाहन हुआ।
ननु निन्दैव वाहनत्वम्।शङ्का—किंतु वाहन होना तो निन्दा ही है [ स्तुतिके लिये कैसे कहा ? ]।
नैष दोषः, वाहनत्वं स्वाभाविकमश्वस्य। स्वाभाविकत्वादुच्छ्रायप्राप्तिर्देवादिसम्बन्धोऽश्वस्येति स्तुतिरेवैषा। तथा वाज्यादयो जातिविशेषाः। वाजी भूत्वासमाधान—यह कोई दोषकी बात नहीं है, अश्वका वाहन होना तो स्वाभाविक ही है। स्वाभाविक होनेके कारण देवादिसे सम्बन्ध होना तो उच्च पदकी प्राप्ति ही है, अतः यह उसकी स्तुति ही है। इसी प्रकार वाजी आदि भी जाति विशेष हैं।