भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52
४६बृहदारण्यकोपनिषद्अध्याय १]

हुए। इसने हय होकर देवताओंको, वाजी होकर गन्धर्वोंको, अर्वा होकर असुरोंको और अश्व होकर मनुष्योंको वहन किया है। समुद्र ही इसका बन्धु है और समुद्र ही उद्गमस्थान है ॥ २ ॥

| अहः सौवर्णो ग्रहो दीप्ति-सामान्याद्वै। अहरश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायतेति कथम् ? अश्वस्य प्रजापतित्वात्। प्रजापतिर्ह्यादित्यादिलक्षणोऽह्ना लक्ष्यते। अश्वं लक्षयित्वाजायत सौवर्णो महिमा ग्रहो वृक्षमन्ु विद्योतते विद्युदिति यद्वत्। तस्य ग्रहस्य पूर्वे पूर्वः समुद्रे समुद्रो योनिर्विभक्तिव्यत्ययेन। योनिरित्यासादनस्थानम्। | दीप्तिमें समानता होनेके कारण दिन ही सुवर्णमय ग्रह है। दिन ही इस अश्वके सामने महिमारूपसे प्रकट हुआ, सो किस प्रकार ? क्योंकि यह अश्व प्रजापतिरूप है; आदित्यादिरूप प्रजापति ही दिनसे लक्षित होता है। जिस प्रकार वृक्षको लक्ष्य बनाकर बिजली चमकती है उसी प्रकार इस अश्वको लक्षित कराकर दिनरूप सुवर्णमय महिमासंज्ञक ग्रह प्रकट हुआ है। उस ग्रहका 'पूर्वे समुद्रे' अर्थात् पूर्वसमुद्र योनि है। योनि अर्थात् प्राप्तिस्थान है। यहाँ [ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार ] प्रथमा विभक्तिका सप्तमीके रूपमें व्यत्यय हुआ है, अतः 'पूर्वे समुद्रे' का 'पूर्वः समुद्रः' अर्थ किया गया है। | | तथा रात्री राजतो ग्रहो वर्णसामान्याज्जघन्यत्वसामान्याद्वा। एनमश्वं पश्चात्पृष्ठतो महिमान्वजायत, तस्यापरे समुद्रे योनिः। महिमा महत्त्वात्। अश्वस्य हि | इसी प्रकार वर्णमें और निकृष्टतामें समानता होनेके कारण रात्रि—राजत (चाँदीका) ग्रह है। यह इस अश्वके पीछेकी ओर यानी पृष्ठभागमें महिमारूपसे प्रकट हुई। उसका पश्चिमसमुद्र उद्गमस्थान है। महत्ताके कारण ये 'महिमा' कहलाते हैं। यह अश्वकी विभूति ही है कि |