बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
| गात्राणि कम्पयति तत्स्तनयति गर्जनशब्दसामान्यात् । यन्मेहति मूत्रं करोत्यश्वस्तद्वर्षति वर्षणं तत् सेचनसामान्यात् । वागेव शब्द एवास्याश्वस्य वागिति, नात्र कल्पनेत्यर्थः ॥ १ ॥ | समानता है। तथा वह जो हिलाता अर्थात् शरीरको कम्पित करता है वह मेघका गर्जन है; क्योंकि इन दोनोंहीमें गर्जन-शब्द रहनेमें समानता है। और वह अश्व जो मूत्रत्याग करता है वही वर्षा होना है, क्योंकि भिगोनेमें इन दोनोंकी समानता है। वाक् अर्थात् शब्द ही इस अश्वकी वाणी है; तात्पर्य यह है कि यहाँ कोई कल्पना नहीं है ॥ १ ॥ |
अश्वमेधसम्बन्धी महिमासंज्ञक ग्रहादिमें अहरादिदृष्टि
| अहर्वा इति । सौवर्णराजतौ महिमाख्यौ ग्रहावश्वस्याग्रतः पृष्ठतश्च स्थाप्येते तद्विषयमिदं दर्शनम्— | ‘अहर्वा’ इत्यादि। अश्वके आगे और पीछे महिमा नामके सोने और चाँदीके दो ग्रह (यज्ञीय पात्रविशेष) रखे जाते हैं; उन्हींसे सम्बन्ध रखनेवाली यह दृष्टि है— |
अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुः। हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वासुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥
अश्वके सामने महिमारूपसे दिन प्रकट हुआ; उसकी पूर्व समुद्र योनि है। रात्रि इसके पीछे महिमारूपसे प्रकट हुई; उसकी अपर (पश्चिम) समुद्र योनि है। ये ही दोनों इस अश्वके आगे-पीछेके महिमासंज्ञक ग्रह