भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 50

४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १


| विश्लिष्टावयवत्वसामान्यात् । सिन्धवः स्यन्दनसामान्यान्नद्यो गुदा नाड्यो बहुवचनाच्च । यकृच्च क्लोमानश्च हृदयस्याधस्ताद्दक्षिणोत्तरौ मांसखण्डौ । क्लोमान इति नित्यं बहुवचनमेकस्मिन्नेव । पर्वताः काठिन्यादुच्छ्रितत्वाच्च । ओषधयश्च क्षुद्राः स्थावरा वनस्पतयो महान्तो लोमानि केशाश्च यथासम्भवम् ।<br><br>उद्यन्नुद्गच्छन्भवति सविता आमध्याह्नादश्वस्य पूर्वार्धो नाभेरूर्ध्वमित्यर्थः । निम्लोचन्नस्तं यन्नामध्याह्नाज्जघनार्धोऽपरार्धः पूर्वापरत्वसाधर्म्यात् । यद्विजृम्भते गात्राणि विनामयति विक्षिपति तद्विद्योतते विद्योतनं मुखघनविदारणसामान्यात्। यद्विधूनुते गा- | उदरस्थित अर्धजीर्ण अन्न है। सिन्धु अर्थात् स्यन्दन (बहने) में समानता होनेके कारण नदियाँ गुदा-नाडियाँ हैं, क्योंकि यहाँ 'सिन्धवः' और 'गुदाः' दोनों ही पद बहुवचनान्त हैं¹। कठिन और ऊँचे उठे हुए होनेके कारण पर्वत यकृत् और क्लोमा हैं। 'यकृत्' और 'क्लोमा'—हृदयके अधोभागमें सीधे और बायें दो मांसखण्ड हैं। 'क्लोमानः' यह एकके ही अर्थमें नित्य बहुवचनान्त होता है। ओषधि—क्षुद्र स्थावर और वनस्पति—महान् स्थावर ये यथासम्भव लोम और केश हैं।<br><br>सूर्य जो मध्याह्नकालपर्यन्त उदित होता—ऊपरकी ओर जाता है वह अश्वका पूर्वार्ध यानी नाभिसे ऊपरका भाग है और निम्लोचन् अर्थात् मध्याह्नकालसे अस्तकी ओर जाता हुआ वह सूर्य जघनार्ध—अपरार्ध ( नीचेका भाग ) है, क्योंकि पूर्वत्व और अपरत्वमें उन ( उदित और अस्त होते हुए सूर्य ) की समानता है। तथा वह जो जमुहाई लेता अर्थात् अङ्गोंको फैलाता यानी उन्हें विशेषरूपसे झाड़ता है। वह बिजलीका चमकना है, क्योंकि विद्योतन और मुख एवं मेघके विदारणमें |


१. अतएव यहाँ 'गुदा' शब्द लोकप्रसिद्ध नितम्ब-अर्थका बोधक नहीं हो सकता।