भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 56
५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
लभ्यते तस्यैव नास्तिता। अस्तु कार्यस्य न तु कारणस्य, उपलभ्यमानत्वात्।जाते हैं। जो वस्तु उपलब्ध नहीं होती उसीका अभाव होता है। अतः कार्यका अभाव भले ही रहे कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि वह तो उपलब्ध होता ही है।
न; प्रागुत्पत्तेः सर्वानुपलम्भात्। अनुपलब्धिश्चेदभावहेतुः सर्वस्य जगतः प्रागुत्पत्तेर्न कारणं कार्यं वोपलभ्यते। तस्मात्सर्वस्यैवाभावोऽस्तु।शून्यवादी-नहीं, क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व तो सभीकी उपलब्धि नहीं होती। यदि अनुपलब्धि ही अभावका कारण है तो उत्पत्तिसे पूर्व तो सारे जगत्का कारण या कार्य उपलब्ध नहीं होता। अतः सभीका अभाव होना चाहिये।
न; “मृत्युनैवेदमावृतमासीत्” इति श्रुतेः। यदि हि किञ्चिदपि नासीद् येनाव्रियते यच्चाव्रियते तदा नावक्ष्यत् ‘मृत्युनैवेदमावृतम्’ इति। न हि भवति गगनकुसुमच्छन्नो बन्ध्यापुत्र इति। ब्रवीति च ‘मृत्युनैवेदमावृतमासीत्’ इति, तस्माद्येनावृतं कारणेन, यच्चावृतं कार्यं प्रागुत्पत्तेस्तदुभयमासीत्, श्रुतेः प्रामाण्यादनुमेयत्वाच्च।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ "यह मृत्युसे ही आवृत था" ऐसी श्रुति है। यदि उस समय कुछ भी न होता तो जिससे आवृत होता है और जो आवृत होता है उसके विषयमें श्रुति यह न कहती कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था।' वन्ध्यापुत्र आकाश-कुसुमसे आच्छादित होता हो—ऐसा कभी नहीं होता। किंतु श्रुति ऐसा कह रही है कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था', अतः जिस कारणसे आवृत था और जो कार्य आवृत था, उत्पत्तिसे पूर्व वे दोनों ही थे, क्योंकि इसमें श्रुति प्रमाण है और ऐसा अनुमान भी किया जा सकता है।