बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५९
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५९
इच्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजी- विष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥
मनने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार मुग्ध पुरुष मनसे न समझते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और रेतस्से प्रजा उत्पन्न करते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर मनने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥
रेतस्का उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
रेतो होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबा अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाꣳसो मनसैवम- जीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥
रेतस्ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार नपुंसक लोग रेतस्से प्रजा उत्पन्न न करते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते और मनसे जानते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर वीर्यने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥
| तथा चक्षुर्होच्चक्रामेत्यादि पूर्ववत् । श्रोत्रं मनः प्रजातिरिति ॥ ९—१२ ॥ | इसी प्रकार चक्षुर्होच्चक्राम' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। अबतक श्रोत्र, मन, प्रजाति [रेतस्] इत्यादिने उत्क्रमण किया ॥ ९—१२ ॥ |
१२६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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प्राणके उत्क्रमण करते ही अन्य इन्द्रियोंका विचलित हो जाना और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करना
अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशङ्कून् संवृहेदेवँ हैवेमान् प्राणान् संववर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रमीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥ १३ ॥
फिर प्राण उत्क्रमण करने लगा, तो जिस प्रकार सिन्धुदेशीय महान् अश्व पैर बांधनेके खूँटोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार वह इन सब प्राणोंको स्थानच्युत करने लगा। उन्होंने कहा, 'भगवन् ! आप उत्क्रमण न करें, आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' प्राणने कहा, 'अच्छा तो मुझे बलि (भेंट) दिया करो।' [अन्य इन्द्रियोंने कहा—] 'बहुत अच्छा' ॥ १३ ॥
| अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन्नु- | फिर प्राण 'उत्क्रमिष्यन्'— |
|---|---|
| त्क्रमणं करिष्यंस्तदानीमेव स्वस्था- | उत्क्रमण करने लगा। उसी समय |
| नात् प्रचलिता वागादयः। | वागादि प्राण अपने स्थानसे |
| किमिव ? इत्याह—यथा लोके | चलायमान हो गये। किसके |
| महांश्चासौ सुहयश्च महासुहयः | समान ? यह बतलाते हैं—जिस |
| शोभनो हयो लक्षणोपेतो महान् | प्रकार लोकमें महासुहयः—जो |
| परिमाणतः सिन्धुदेशे भवः | महान् हो और सुहय—शोभन हय |
| सैन्धवोऽभिजनतः पड्वीशशङ्- | अर्थात् सुलक्षण-सम्पन्न अश्व |
| कून् पादबन्धनशङ्कून् पड्वी- | (घोड़ा) हो तथा परिमाणतः महान् |
| शाश्च ते शङ्कवश्च तान् संवृहे- | हो एवं सैन्धव'—सिन्धुदेशमें उत्पन्न |
| हुआ अर्थात् उत्तम जातिका हो, वह | |
| जिस प्रकार परीक्षाके लिये सवारके | |
| चढ़ते ही पड्वीश शङ्कुओंको—पैर | |
| बाँधनेके खूँटोंको—जो पड्वीश हों | |
| और शङ्कु हों, उनको संवृहेत्— |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १२६१ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १२६१ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-भाषार्थ |
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| दुष्टच्छेद्युगपदुत्खनेदश्वारोह आरूढे परीक्षणाय; एवं हैवेमान् वागादीन् प्राणान् संववर्होत्खतवान् स्वस्थानाद् अंशितवान् । | उखाड़ डालता है; इसी प्रकार उसने इन वागादि प्राणोंको 'संवर्ह'—उखाड़ दिया—अपने स्थानसे विचलित कर दिया। |
| ते वागादयो होचुर्ह भगवो भगवन् मोत्क्रमीर्यस्मान्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते त्वां विना जीवितुमिति । यद्येवं मम श्रेष्ठता विज्ञाता भवद्भिरहमत्र श्रेष्ठस्तस्य उ मे मम बलिं करं कुरुत करं प्रयच्छतेति । | उन वागादिने कहा, 'हे भगवन्! आप उत्क्रमण न करें; क्योंकि आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' [ प्राण बोला—] 'यदि ऐसी बात है तो तुमलोगोंको मेरी श्रेष्ठताका पता लग गया; यहाँ मैं ही श्रेष्ठ हूँ। अतः उस मुझको तुमलोग बलि दिया करो अर्थात् कर (भेंट) दिया करो। |
| अयं च प्राणसंवादः कल्पितो विदुषः श्रेष्ठपरीक्षणप्रकारोपदेशः । अनेन हि प्रकारेण विद्वान् को नु खल्वत्र श्रेष्ठ इति परीक्षणं करोति । स एष परीक्षणप्रकारः संवादभूतः कथ्यते; न ह्यन्यथा संहत्यकारिणां सतामेषामञ्जसैव संवत्सरमात्रमेवैकैकस्य निर्गमनाद्युपपद्यते । तस्माद् विद्वानेवानेन प्रकारेण विचारयति वागादीनां प्रधानबुभुत्सुरुपासनाय । बलिं प्रार्थिताः सन्तः प्राणास्तथेति प्रतिज्ञातवन्तः ॥ १३ ॥ | यह प्राणसंवाद कल्पित है, इससे विद्वान्के लिये श्रेष्ठ पुरुषकी परीक्षा करनेके प्रकारका उपदेश दिया गया है। इसी प्रकार विद्वान् 'यहाँ श्रेष्ठ कौन है?' इसकी परीक्षा करता है। वह यह परीक्षाका प्रकार संवादरूपसे कहा गया है; नहीं तो इन मिलकर कार्य करनेवाले वागादिका एक-एक करके एक-एक वर्षतक साक्षात्रूपसे बाहर निकलना आदि सम्भव नहीं है। अतः वागादिमेंसे प्रधानको जाननेकी इच्छावाला उपासक ही उपासनाके लिये इस प्रकार विचार करता है। प्राणद्वारा बलि माँगे जानेपर वागादि प्राणोंने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर प्रतिज्ञा की ॥ १३ ॥ |
१२६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
१२६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६
वागादिकृत प्राणकी स्तुति और उसे अन्न तथा वस्त्र-प्रदान
सा ह वागुवाच यद् वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद् वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति चक्षुर्यद् वा अहँ संपदस्मि त्वं तत् संपदसीति श्रोत्रं यद् वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद् वा अहं प्रजातिरस्मि त्वं तत्प्रजातिरसीति रेतस्तस्यो मे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्चाश्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं प्रतिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वाँ सः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ॥ १४ ॥
उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस वसिष्ठ गुणसे युक्त हो।' 'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठासे युक्त हो' ऐसा नेत्रने कहा। 'मैं जो सम्पद् हूँ, सो तुम ही उस सम्पद्से युक्त हो' ऐसा श्रोत्रने कहा। 'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं वह आयतन हो' ऐसा मनने कहा। 'मैं जो प्रजाति हूँ, सो तुम ही उस प्रजातिसे युक्त हो' ऐसा रेतस्ने कहा। [ प्राणने कहा—] 'किंतु ऐसे गुणोंसे युक्त होनेपर मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है?' [ वागादि बोले—] 'कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तेरा अन्न है और जल ही वस्त्र है।' [ उपासनाका फल —] 'जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानता है, उसके द्वारा अभक्ष्यभक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह (संग्रह) भी नहीं होता। ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजन करके आचमन करते हैं। इसीको वे उस प्राणको अनग्न करना मानते हैं ॥ १४ ॥
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६३
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| सा ह वाक् प्रथमं बलिदानाय प्रवृत्ता ह किलोवाचोक्तवती यद् वा अहं वसिष्ठास्मि यन्मम वसिष्ठत्वं तत्तवैव तेन वसिष्ठगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति । यद् वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसि या मम प्रतिष्ठा सा त्वमसीति चक्षुः । समानमन्यत्; संपदायतनप्रजातित्वगुणान् क्रमेण समर्पितवन्तः । | प्रथम बलि देनेके लिये प्रवृत्त हुई उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ-मेरा जो वसिष्ठत्व है, वह तुम्हारा ही है अर्थात् उस वसिष्ठत्वरूप गुणसे तुम्हीं वह वसिष्ठ हो।' 'और मैं जो प्रतिष्ठा हूँ; वह प्रतिष्ठा तुम्हीं हो, अर्थात् मेरी जो प्रतिष्ठा है वह तुम हो' ऐसा चक्षुने कहा। शेष अर्थ इसीके समान है। उन्होंने अपने सम्पद, आयतन और प्रजातित्व गुणोंको क्रमशः प्राणको समर्पित किया। |
| यद्येवं साधु बलिं दत्तवन्तो भवन्तो ब्रूत तस्य उ म एवं-गुणविशिष्टस्य किमन्नं किं वास इति ? आहुरितरे—यदिदं लोके किञ्च किञ्चिदन्नं नामापि—आ श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यः, यच्च श्वान्नं कृम्यन्नं कीटपतङ्गान्नं च तेन सह सर्वमेव यत् किञ्चित् प्राणिभिरद्यमानमन्नं तत् सर्वं तवान्नम्, सर्वं प्राणस्यान्नमिति दृष्टिरत्र विधीयते । | [ प्राण बोला—] 'यदि ऐसी बात है तो तुमलोगोंने अच्छी भेंट दी। अब यह बताओ कि उस ऐसे गुणवाले मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है?' अन्य प्राणोंने कहा, 'लोकमें कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गादिसे लेकर जितना भी अन्न है, जो भी कुत्तेका अन्न, कृमिका अन्न और कीट-पतङ्गोंका अन्न है, उसके सहित प्राणियोंद्वारा भक्षण किया जानेवाला जितना अन्न है, वह सभी तुम्हारा अन्न है।' यहाँ 'यह सब प्राणका अन्न है' ऐसी दृष्टिका विधान किया जाता है। |
१२६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| केचित्तु सर्वभक्षणे दोषाभावं वदन्ति प्राणान्नविदः; तदसत्; शास्त्रान्तरेण प्रतिषिद्धत्वात्। तेनास्य विकल्प इति चेत्? न; अविधायकत्वात्; न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवतीति सर्वं प्राणस्यान्नमित्येतस्य विज्ञानस्य विहितस्य स्तुत्यर्थमेतत्; तेनैकवाक्यतापत्तेः। न तु शास्त्रान्तरविहितस्य बाधने सामर्थ्यमन्यपरत्वादस्य; प्राणमात्रस्य सर्वमन्नमित्येतद्दर्शनमिह विधित्सितं न तु सर्वं भक्षयेदिति। | कोई-कोई तो कहते हैं कि प्राणोपासकको सर्वभक्षणमें दोष नहीं है, किंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अन्य शास्त्र इसका निषेध करते हैं। यदि उन शास्त्रोंसे इसका विकल्प माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यह वाक्य विधान करनेवाला नहीं है; 'इसके द्वारा अभक्ष्य भक्षण नही किया जाता' यह आगेका वाक्य 'सब प्राणका ही अन्न है' इस प्रकार विधान किये गये विज्ञानकी स्तुतिके लिये है; क्योंकि उसके साथ इसकी एकवाक्यता सम्भव है। शास्त्रान्तरद्वारा विहित अर्थका बाध करनेमें इसकी सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि यह वाक्य अन्यपरक है। यहाँ तो इसी दृष्टिका विधान करना अभीष्ट है कि सब अन्न अकेले प्राणका ही है, यह बतलाना अपेक्षित नहीं कि सब कुछ खा ले। | | यत्तु सर्वभक्षणे दोषाभावज्ञानं तन्मिथ्यैव प्रमाणाभावात्। | जो ऐसा कहते हैं, कि इससे सर्वभक्षणमें दोषाभावका ज्ञान होता है; उनका वह कथन कोई प्रमाण न होनेके कारण मिथ्या ही है। | | विदुषः प्राणत्वात् सर्वान्नोपपत्तेः सामर्थ्याददोष एवेति चेत्? न; | यदि कोई कहे कि प्राणरूप होनेके कारण प्राणोपासकका सभी अन्न हो सकता है, सामर्थ्य होनेके कारण इसमें कोई दोष है ही नहीं, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६५
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६५
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| अशेषान्नत्वानुपपत्तेः । सत्यं यद्यपि विद्वान् प्राणो येन कार्यकारणसंघातेन विशिष्टस्य विद्वत्ता तेन कार्यकारणसंघातेन कृमिकीटदेवाद्यशेषान्नभक्षणं नोपपद्यते ।<br><br>तेन तत्राशेषान्नभक्षणे दोषाभावज्ञापनमनर्थकम्; अप्राप्तत्वादशेषान्नभक्षणदोषस्य । | सब कुछ उसका अन्न होना सम्भव नहीं है । यद्यपि यह सत्य है कि विद्वान् प्राण ही है, तो भी जिस देहेन्द्रियसंघातसे विशिष्ट पुरुषकी विद्वत्ता स्वीकार की जाती है, उस देहेन्द्रियसंघातद्वारा कृमि, कीट एवं देवादि—इन सभीके अन्नोंको भक्षण करना उसके लिये सम्भव नहीं है । इसलिये उसके लिये सर्वान्नभक्षणमें दोषाभाव दिखलाना व्यर्थ है; क्योंकि उसके प्रति सर्वान्नभक्षणरूप दोष तो प्राप्त ही नहीं होता । |
| ननु प्राणः सन् भक्षयत्येव कृमिकीटाद्यन्नमपि । बाढम्; किंतु न तद्विषयः प्रतिषेधोऽस्ति; तस्माद् दैवरक्तं किंशुकम्, तत्र दोषाभावः । अतस्तद्रूपेण दोषाभावज्ञापनमनर्थकम्; अप्राप्तत्वादशेषान्नभक्षणदोषस्य; येन तु कार्यकारणसंघातसंबन्धेन प्रतिषेधः क्रियते तत्संबन्धेन त्विह नैव प्रतिप्रसवोऽस्ति; तस्मात्तत्प्रति- | किंतु प्राणरूपसे तो वह कृमिकीटादिके अन्नको भी भक्षण करता ही है । ठीक है, किंतु उस प्राणके विषयमें तो कहीं प्रतिषेध नहीं किया गया । इसलिये यदि पलाशके फूलको देवने ही लाल बना दिया है तो उसमें कोई दोष नहीं है । अतः प्राणरूपसे उसके दोषाभावको बतलाना व्यर्थ है, क्योंकि उसमें तो सर्वान्नभक्षणरूप दोष प्राप्त ही नहीं होता; जिस कार्यकारणसंघातके सम्बन्धसे प्रतिषेध किया जाता है; उसका सम्बन्ध रहनेके कारण तो यहाँ (प्राणवेत्ताके विषयमें) उस प्रतिषेधका प्रतिप्रसव¹ हो ही नहीं सकता । |
१. निषेधको बाध करके विधिका अनुमोदन करना प्रतिप्रसव कहलाता है ।
बृ० उ० ८०—
१२६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| षेधातिक्रमे दोष एव स्यादन्यविषयत्वान्न ह वा इत्यादेः। | इसलिये उस प्रतिषेधका अतिक्रमण करनेसे तो दोष ही होगा, क्योंकि 'न ह वा' इत्यादि आगेके वाक्यका विषय दूसरा [यानी प्राण] ही है। |
| न च ब्राह्मणादिशरीरस्य सर्वान्नत्वदर्शनमिह विधीयते, किंतु प्राणमात्रस्यैव। यथा च सामान्येन सर्वान्नस्य प्राणस्य किञ्चिदन्नजातं कस्यचिज्जीवनहेतुः, यथा विषं विषजस्य कृमेः, तदेवान्यस्य प्राणान्नमपि सद् दृष्टमेव दोषमुत्पादयति मरणादिलक्षणम्। तथा सर्वान्नस्यापि प्राणस्य प्रतिषिद्धान्नभक्षणे ब्राह्मणत्वादिदेहसंबन्धाद्दोष एव स्यात्; तस्मान्मिथ्याज्ञानमेवाभक्ष्यभक्षणे दोषाभावज्ञानम्। | इसके सिवा यहाँ ब्राह्मणादि शरीरकी सर्वान्नत्व-दृष्टिका विधान भी नहीं किया जाता, किंतु केवल प्राणमात्रकी सर्वान्नत्वदृष्टि बतलायी गयी है। जिस प्रकार सामान्यरूपसे सर्वान्नप्राणका कोई अन्नसमूह किसीके जीवनका हेतु होता है, जैसे कि विषसे उत्पन्न हुए कीड़ेके लिये विष, किंतु वही दूसरेका प्राणान्न होनेपर भी उसके लिये मरणादिरूप प्रत्यक्ष दोष उत्पन्न कर देता है। इसी प्रकार सर्वान्नभक्षी प्राणको भी ब्राह्मणादिदेहका सम्बन्ध होनेके कारण प्रतिषिद्ध अन्न भक्षण करनेमें दोष ही होगा। अतः अभक्ष्यभक्षणमें दोषाभावका ज्ञान होना मिथ्या ज्ञान ही है। |
| आपो वास इति; आपोभक्ष्यमाणा वासःस्थानीयास्तव; अत्र च प्राणस्यापो वास इत्येतद् दर्शनं विधीयते; न तु वासःकार्य आपो विनियोक्तुं शक्याः। तस्माद् यथाप्राप्तेऽब्भक्षणे दर्शनमात्रं कर्तव्यम्। | 'आपो वासः' इत्यादि, भक्षण किया जाता हुआ जल तुम्हारा वस्त्रस्थानीय है। यहाँ जल प्राणका वस्त्र है—इस दृष्टिका विधानमात्र किया गया है। वस्त्रके काममें जलका उपयोग नहीं किया जा सकता। अतः यथाप्राप्त जलपानमें केवल ऐसी दृष्टिमात्र ही करनी चाहिये। |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६७
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| न ह वा अस्य सर्वं प्राणस्यान्नमित्येवंविदोऽनन्नमनदनीयं जग्धं भुक्तं न भवति ह; यद्यप्यनेनानदनीयं भुक्तमदनीयमेव भुक्तं स्यान्न तु तत्कृतदोषेण लिप्यते, इत्येतद् विद्यास्तुतिरित्यवोचाम; तथा नानन्नं प्रतिगृहीतं यद्यप्यप्रतिग्राह्यं हस्त्यादि प्रतिगृहीतं स्यात्, तदप्यन्नमेव प्रतिग्राह्यं प्रतिगृहीतं स्यात् । तत्राप्यप्रतिग्राह्यप्रतिग्रहदोषेण न लिप्यत इति स्तुत्यर्थमेव । | इस प्रकार जाननेवाले अर्थात् सब प्राणका अन्न है—ऐसा जाननेवाले इस विद्वान्से अनन्न—अभक्ष्य नहीं भक्षण किया जाता । यदि यह कोई अभक्ष्य खा ले तो भी इससे भक्ष्य ही खाया गया है, यह उससे होनेवाले दोषसे लिप्त नहीं होता--इस प्रकार यह इस विद्याकी स्तुति है--ऐसा हम पहले कह चुके हैं। इस प्रकार इसके द्वारा अनन्नका प्रतिग्रह भी नहीं होता, यद्यपि यह दानमें नहीं लेनेयोग्य हाथी आदिको भी ग्रहण करे तो वह भी अन्न यानी लेनेयोग्य वस्तुका ही प्रतिग्रह ( ग्रहण ) होगा । वहाँ भी 'यह अप्रतिग्राह्यके प्रतिग्रहरूप दोषसे लिप्त नहीं होता' इस प्रकार यह वाक्य स्तुतिके लिये ही है। |
| य एवमेतदनस्य प्राणस्यान्नं वेद, फलं तु प्राणात्मभाव एव । न त्वेतत्फलाभिप्रायेण, किं तर्हि ? स्तुत्यभिप्रायेणेति । नन्वेतदेव फलं कस्मान्न भवति ? न, प्राणात्मदर्शिनः प्राणात्मभाव एव फलम् । | जो इस प्रकार इस अन अर्थात् प्राणके अन्नको जानता है, उसे प्राणात्मभावरूप फल ही मिलता है। यह कथन इस फलके अभिप्रायसे नहीं है, तो किसलिये है । स्तुतिके अभिप्रायसे । [ प्रश्न-] किंतु यही इसका फल क्यों नहीं होता । [ उत्तर--]नहीं, प्राणात्मदर्शीका फल तो प्राणात्मभाव ही है। उस |
१. अर्थात् नहीं लेने योग्य वस्तुके लेने रूप दोषसे ।
| १२६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
| १२६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तत्र च प्राणात्मभूतस्य सर्वात्मनोऽनदनीयमप्याद्यमेव; तथाप्रतिग्राह्यमपि प्रतिग्राह्यमेवेति यथाप्राप्तमेवोपादाय विद्या स्तूयते अतो नैव फलविधिसरूपता वाक्यस्य । | अवस्था में प्राणात्मभावको प्राप्त हुए इस सर्वात्माका अभक्ष्य भी भक्ष्य ही है तथा अप्रतिग्राह्य भी प्रतिग्राह्य ही है—इस प्रकार यथाप्राप्त स्थितिको ही लेकर इस उपासनाकी स्तुति की जाती है। अतः इस वाक्यकी फलविधिसरूपता नहीं है। |
| यस्मादापो वासः प्राणस्य, तस्माद् विद्वांसो ब्राह्मणाःश्रोत्रिया अधीतवेदा अशिष्यन्तो भोक्ष्यमाणो आचामन्त्योऽशित्वाचामन्ति भुक्त्वा चोत्तरकालमपो भक्षयन्ति । तत्र तेषामाचमतां कोऽभिप्रायः ? इत्याह—एतमेवानं प्राणमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते । अस्ति चैतद् यो यस्मै वासो ददाति स तमनग्नं करोमीति हि मन्यते; प्राणस्य चापो वास इति ह्युक्तम्; यदपः पिबामि तत् प्राणस्य वासो ददामीति विज्ञानं कर्तव्यमित्येवमर्थमेतत् । | क्योंकि जल प्राणका वस्त्र है, इसलिये श्रोत्रिय--जिन्होंने वेदाध्ययन किया है वे विद्वान् ब्राह्मण जब अशन अर्थात् भोजन करनेको होते हैं तो पहले जलका आचमन करते हैं तथा अशन करके भी आचमन करते हैं अर्थात् भोजन करके उसके पीछे भी जल पीते हैं। वहाँ उनके जलपान करनेका क्या अभिप्राय होता है। सो श्रुति बतलाती है--वे इस प्राणको ही हम अनग्न कर रहे हैं--ऐसा मानते हैं। यह बात प्रसिद्ध है कि जो जिसको वस्त्र देता है, वह 'उसे मैं अनग्न कर रहा हूँ' ऐसा मानता है। प्राणका वस्त्र जल है--यह तो कहा ही जा चुका है। अतः यह उपदेश इसलिये है कि 'मैं जो जल पीता हूँ वह प्राणको वस्त्र देता हूँ'--ऐसी दृष्टि करनी चाहिये। |
| ननु भोक्ष्यमाणो भुक्तवांश्च प्रयतो भविष्यामीत्याचामति; तत्र- | शङ्का-किंतु भोजन करनेवाला तथा भोजन कर चुकनेवाला मनुष्य तो इसलिये आचमन करता है कि मैं आचमन करनेसे पवित्र हो जाऊँगा, |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६९
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६९
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| च प्राणस्यानग्नताकरणार्थत्वे च द्विकार्यताचमनस्य स्यात्; न च कार्यद्वयमाचमनस्यैकस्य युक्तम्, यदि प्रायत्यार्थं नानग्नतार्थम्, अथानग्नतार्थं न प्रायत्यार्थम् । यस्मादेवम्, तस्माद् द्वितीयमाचमनान्तरं प्राणस्यानग्नताकरणाय भवतु । | वहाँ यदि प्राण को अनग्न करना (वस्त्र देना) उद्देश्य रहे तो उस आचमनके दो कार्य हो जायंगे; किंतु एक ही आचमनके दो कार्य होने उचित नहीं हैं! यदि वह शुद्धिके लिये होगा तो प्राणकी अनग्नताके लिये नहीं हो सकता और यदि प्राणकी अनग्नताके लिये होगा तो शुद्धिके लिये नहीं हो सकता। चूँकि ऐसा है, इसलिये दूसरा आचमन प्राणकी अनग्नताके लिये हो सकता है। |
| न, क्रियाद्वित्वोपपत्तेः । द्वे ह्येते क्रिये भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं स्मृतिविहितं तत् प्रायत्यार्थं भवति क्रियामात्रमेव न तु तत्र प्रायत्यं दर्शनाद्यपेक्षते । तत्र चाचमनाङ्गभूतास्वप्सु वासोविज्ञानं प्राणस्येतिकर्तव्यतया चोद्यते, न तु तस्मिन् क्रियमाणे आचमनस्य प्रायत्यार्थता बाध्यते, क्रियान्तरत्वादाचमनस्य । तस्माद् | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दो क्रियाओंका होना युक्तिसंगत है। ये दोनों ही क्रियाएँ होती हैं, भोजन करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो स्मृतिविहित आचमन होता है वह केवल क्रियामात्र और शुद्धिके लिये ही होता है, उसमें शुद्धिको किसी दृष्टि आदिकी अपेक्षा नहीं है। वहाँ आचमनके अङ्गभूत जलमें प्राणके वस्त्रविज्ञानका तो इतिकर्त्तव्यतारूपसे विधान किया जाता है, उसके करनेपर आचमनकी शुद्ध्यर्थताका बाध होता हो—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आचमन तो दूसरी |
१२७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १२७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं तत्रापो वासः प्राणस्येति दर्शनमात्रं विधीयते, अप्राप्तत्वादिन्यतः ॥ १४ ॥ | ही क्रिया है। अतः भोजन करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो आचमन है, उसमें 'जल प्राणका वस्त्र है' ऐसी दृष्टिमात्रका विधान किया जाता है, क्योंकि किसी अन्य प्रमाणसे इसकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये प्रथमं प्राणसंवादब्राह्मणम् ॥१॥
द्वितीय ब्राह्मण
| [प्रकरण-सम्बन्धः] श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेय इत्यस्य सम्बन्धः—खिलाधिकारोऽयम्, तत्र यदनुक्तं तदुच्यते। सप्तमाध्यायान्ते ज्ञानकर्मसमुच्चयकारिणाऽग्नेर्मार्गयाचनं कृतम्—अग्ने नय सुपथेति। तत्रानेकेषां पथां सद्भावो मन्त्रेण सामर्थ्यात् प्रदर्शितः; सुपथेति विशेषणात्। पन्थानश्च कृतविपाकप्रतिपत्तिमार्गाः। वक्ष्यति च—यत् कृत्वेत्यादि। | 'श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः' इत्यादि इस ब्राह्मणका सम्बन्ध इस प्रकार है। यह खिलप्रकरण है। इसमें पहले जो नहीं कहा गया, वह बतलाया जाता है। सप्तम (उपनिषद्के पञ्चम) अध्यायके अन्तमें ज्ञानकर्मसमुच्चयकारी पुरुषके द्वारा 'अग्ने नय सुपथा'—इत्यादि मन्त्रद्वारा अग्निसे देवयान मार्गकी याचना की गयी है। वहाँ उस मन्त्रद्वारा सामर्थ्यसे अनेक मार्गोंकी सत्ता प्रदर्शित होती है; क्योंकि उसमें 'सुपथा' ऐसा विशेषण दिया गया है। और 'पथ' किये हुए कर्मोंके फलभोगके मार्गोंका नाम है। यह बात श्रुति 'यत् कृत्वा'<sup>१</sup> इत्यादि मन्त्रसे कहेगी भी। |
१. इसी ब्राह्मणका दूसरा मन्त्र।
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७१
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७१
| संस्कृत-मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
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| तत्र च कति कर्मविपाकप्रतिपत्तिमार्गा इति सर्वसंसारगत्युपसंहारार्थोऽयमारम्भः। एतावती हि संसारगतिः, एतावान् कर्मणो विपाकः स्वाभाविकस्य शास्त्रीयस्य च सविज्ञानस्येति। | तहां कर्मफलभोगके कितने मार्ग हैं? यह बताकर सम्पूर्ण संसारकी गतिका उपसंहार करनेके लिये इस ग्रन्थका आरम्भ हुआ है। बस, इतनी ही संसारकी गति है तथा इतना ही स्वाभाविक और विज्ञानयुक्त शास्त्रीय कर्मका परिणाम है। |
| यद्यपि द्वया ह प्राजापत्या इत्यत्र स्वाभाविकः पाप्मा सूचितः, न च तस्येदं कार्यमिति विपाकः प्रदर्शितः। शास्त्रीयस्यैव तु विपाकः प्रदर्शितस्त्र्यन्नात्मप्रतिपत्त्यन्तेन, ब्रह्मविद्यारम्भे तद्वैराग्यस्य विवक्षितत्वात्। तत्रापि केवलेन कर्मणा पितृलोको विद्यया विद्यासंयुक्तेन च कर्मणा देवलोक इत्युक्तम्। तत्र केन मार्गेण पितृलोकं प्रतिपद्यते केन वा देवलोकमिति नोक्तम्; तच्चेह खिलप्रकरणेऽशेषतो वक्तव्यमित्यत आरभ्यते। अन्ते च सर्वोपसंहारः शास्त्रस्येष्टः। | यद्यपि 'द्वया ह प्राजापत्याः' इत्यादि प्रसंगमें स्वाभाविक पाप बतला दिया गया है; किंतु वहाँ 'उसका यह कार्य है' इस प्रकार फल नहीं दिखाया गया। त्र्यन्नरूपत्वकी प्राप्तितकके मन्त्रद्वारा केवल शास्त्रीय कर्मका ही फल दिखाया गया है; क्योंकि ब्रह्मविद्याके आरम्भमें उससे वैराग्य बतलाना अभीष्ट है। वहाँ भी केवल कर्मसे पितृलोक और विद्या (उपासना) से तथा विद्यासहित कर्मसे देवलोक मिलता है-ऐसा कहा गया है। वहां यह नहीं बताया गया कि किस मार्गसे पितृलोकमें जाया जाता है और किससे देवलोकको? यह बात यहां इस खिल प्रकरणमें पूर्णतया बतानी है, इसीसे इसको आरम्भ किया जाता है। शास्त्रके अन्तमें तो सबका उपसंहार ही इष्ट है। |
१२७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| अपि चैतावदमृतत्वमित्युक्तं न कर्मणोऽमृतत्वाशास्तीति च; तत्र हेतुर्नोक्तस्तदर्थश्चायमारम्भः। यस्मादियं कर्मणो गतिर्न नित्येऽमृतत्वे व्यापारोऽस्ति तस्मादेतावदेवामृतत्वसाधनम्—इति सामर्थ्याद्धेतुत्वं संपद्यते । <br><br> अपि चोक्तमग्निहोत्रे नत्वेवैतद्योत्स्वमुत्क्रान्तिं न गतिं न प्रतिष्ठां न तृप्तिं न पुनरावृत्तिं न लोकं प्रत्युत्थायिनं वेत्थेति । तत्र प्रतिवचने ‘ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतः' इत्यादिनाहुतेः कार्यमुक्तम्। तच्चैतत् कर्तुराहुति- | इसके सिवा 'अमृतत्व इतना ही है' यह भी कहा गया है तथा यह भी बताया है कि 'कर्मसे अमृतत्वकी आशा नहीं है।' किंतु इसमें हेतु नहीं बताया गया, उसे बतानेके लिये भी यह आरम्भ किया गया है !¹ क्योंकि यह कर्मकी गति है और नित्य अमृतत्वमें कोई भी व्यापार है नहीं, इसलिये इतना ही अमृतत्वका साधन है—इस वचनके सामर्थ्यसे यह उसका हेतु हो जाता है !² <br><br> इसके सिवा अग्निहोत्रके प्रकरणमें ऐसा कहा गया है—तू इन सायंकालिक, प्रातःकालिक अग्निहोत्रकी दोनों आहुतियोंकी न उत्क्रान्तिको जानता है, न गतिको, न प्रतिष्ठाको, न तृप्तिको, न पुनरावृत्तिको और न लोकके प्रति उत्थान करनेवाले यजमानको ही जानता है। वहा उत्तरमें 'वे ये दोनों आहुतियाँ हवन की जानेपर उत्क्रमण करती हैं' इत्यादि वाक्यसे आहुतिका कार्य बताया गया है। यह भी कर्ताके |
१. आगे बतलायी जानेवाली तो कर्मकी गति है, मोक्षका साधन तो केवल ज्ञान ही है। ऐसी स्थितिमें आगेका ग्रन्थ मोक्षका हेतु बतलानेमें किस प्रकार उपयोगी हो सकता है, सो अगले वाक्यसे बतलाया जाता है।
२. ज्ञानातिरिक्त उपाय संसारका ही कारण है—इस नियमरूप सामर्थ्यसे ज्ञान ही मोक्षका उपाय है' यह सिद्ध होता है।
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२७३
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२७३
| लक्षणस्य कर्मणः फलम् । न हि कर्तारमनाश्रित्याहुतिलक्षणस्य कर्मणः स्वातन्त्र्येणोत्क्रान्त्यादिकार्यारम्भ उपपद्यते । कर्तृर्थत्वात् कर्मणः कार्यारम्भस्य, साधनाश्रयत्वाच्च कर्मणः ।<br><br>तत्राग्निहोत्रस्तुत्यर्थत्वादग्निहोत्रस्यैव कार्यमित्युक्तं षट्प्रकारमपि; इह तु तदेव कर्तुः फलमित्युपदिश्यते षट्प्रकारमपि; कर्मफलविज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । तद्वारेण च पञ्चाग्निदर्शनमिहोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं विधित्सितम्; एवमशेषसंसारगत्युपसंहारः, कर्मकाण्डस्यैषा निष्ठेत्येतद् द्वयं दिदर्शयिषुस्राख्यायिकां प्रणयति— | आहुतिरूप कर्मका फल है, क्योंकि कर्ताका आश्रय लिये बिना आहुतिरूप कर्मका स्वतन्त्रतासे उत्क्रान्ति आदि कार्य आरम्भ करना सम्भव नहीं है; कारण, कर्मका कार्यारम्भ तो कर्ताके लिये ही होता है तथा कर्म साधनाधीन भी होता ही है।<br><br>किंतु वहाँ वह [ जनक-याज्ञवल्क्यसंवाद ] अग्निहोत्रकी स्तुतिके लिये होनेके कारण यह छहों प्रकारका अग्निहोत्रका ही कार्य बतलाया गया है। किंतु यहाँ कर्मफलविज्ञान विवक्षित होनेके कारण यह बतलाया जाता है, कि वह छहों प्रकारका कर्ताका ही फल है। उसके द्वारा ही यहाँ उत्तरमार्गकी प्राप्तिकी साधनभूता पञ्चाग्निविद्याका विधान करना अभीष्ट है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण संसारगतिका उपसंहार है और यही कर्मकाण्डकी निष्ठा है—इन दो बातोंको दिखानेके लिये श्रुति आख्यायिका रचती है— |
प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतुका आना और प्रवाहणका उससे प्रश्न करना
श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम स आजगाम जैवलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं
१२७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १२७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा ३ इति स भो ३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टोऽन्वसि पित्रेत्योमिति होवाच ॥ १॥
प्रसिद्ध है कि आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पाञ्चालोंकी सभामें आया । वह जीवलके पुत्र प्रवाहणके पास पहुँचा, जो [सेवकोंसे] परिचर्या करा रहा था ! उसे देखकर प्रवाहणने कहा, 'ओ कुमार !' वह बोला 'भो !' [ प्रवाहणने पूछा—] 'क्या तेरे पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' तब श्वेतकेतुने 'हाँ' ऐसा उत्तर दिया ॥ १॥
| श्वेतकेतुर्नामतॊऽरुणस्यापत्य-मारुणिस्तस्यापत्यमारुणेयः, ह-शब्द ऐतिह्यार्थः, वै निश्चयार्थः, पित्रानुशिष्टः सन्नात्मनो यशः-प्रथनाय पञ्चालानां परिषदमाज-गाम। पञ्चालाः प्रसिद्धास्तेषां परिषदमागत्य जित्वा राज्ञोऽपि परिषदं जेष्यामीति गर्वेण स आजगाम । जीवस्यापत्यं जैवत्विं पञ्चालराजं प्रवाहणना-मानं स्वभृत्यैः परिचारयमाण-मात्मनः परिचरणं कारयन्त-मित्येतत् । | जो नामसे श्वेतकेतुथा, वह आरुणेय—अरुणका पुत्र आरुणि, उसका पुत्र आरुणेय, 'ह' शब्द इतिहासका द्योतक है और 'वै' निश्चयार्थक है; पितासे शिक्षा पाकर अपना यश फैलानेके लिये पाञ्चालोंकी सभामें आया । पाञ्चाल-देशीय विद्वान् प्रसिद्ध हैं, उनकी सभामें आकर उन्हें जीतकर फिर राजाकी सभाको भी जीत लूँगा—इस प्रकार वह गर्वसे वहाँ गया था । वह जीवलके पुत्र जैवत्वि प्रवाहण नामक पाञ्चालराजके पास पहुँचा, जो अपने सेवकोंसे परिचारण अर्थात् अपनी परिचर्या (सेवा) करा रहा था । |
| स राजा पूर्वमेव तस्य विद्या-भिमानगर्वं श्रुत्वा विनेतव्योऽय-मिति मत्वा तमुद्वीक्ष्योत्प्रेक्ष्या- | उस राजाने पहलेसे ही उसके विद्याभिमान और गर्वके विषयमें सुन कर यह विचारते हुए कि इसे विनीत करना चाहिये, उसे देखकर आते |
ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२७५
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२७५ |
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| गतमात्रमेवाभ्युवादाभ्युक्तवान् कुमारा३ इति संबोध्य । भर्त्सनार्था प्लुतिः । एवमुक्तः स प्रतिशुश्राव भो३ इति । भो३ इत्यप्रतिरूपमपि क्षत्रियं प्रत्युक्तवान् क्रुद्धः सन्; अनुशिष्टोऽनुशासितोऽसि भवसि किं पित्रेत्युवाच राजा, प्रत्याहेतर ओमिति बाढमनुशिष्टोऽस्मि पृच्छ यदि संशयस्ते ॥ १ ॥ | ही 'ओ कुमार !' इस प्रकार सम्बोधन करके पुकारा । यहाँ 'कुमारा ३' प्लुत स्वर निर्भर्त्सना (भिड़कने) के लिये है । इस प्रकार पुकारे जानेपर उसने उत्तर दिया 'भो !' 'भो !' यह उत्तर यद्यपि क्षत्रियके लिये उचित नहीं है, तो भी क्रोधित होकर उसने ऐसा कहा । 'क्या पिताने तुम्हें अनुशिष्ट—शिक्षित किया है ?' ऐसा राजाने कहा । तब श्वेतकेतु बोला 'हाँ ! हाँ ! पिताने मुझे शिक्षा दी है, यदि तुम्हें कुछ संदेह हो, तो पूछो' ॥ १ ॥ |
प्रवाहणके पाँच प्रश्न और श्वेतकेतुका उन सभीके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना
| यद्येवम्— | यदि ऐसी बात है तो— |
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वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयत्यो विप्रतिपद्यन्ता ३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता ३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यथासौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न संपूर्यता ३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यतिथ्यामाहुत्याँ हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती ३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत् कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि न ऋषेर्वचः श्रुतं द्वे सृती अशृणवं
१२७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १२७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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पितृणामहं देवानामुत मर्त्यानां ताभ्यामिदं विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति नाहमत एकञ्चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥
जिस प्रकार मरनेपर यह प्रजा विभिन्न मार्गोंसे जाती है—'सो क्या तू जानता है ?' श्वेतकेतु बोला, 'नहीं' [ राजा-- ] 'जिस प्रकार वह पुनः इस लोकमें आती है, सो क्या तुझे मालूम है ?' 'नहीं' ऐसा श्वेतकेतुने उत्तर दिया । [ राजा-- ] 'इस प्रकार पुनः पुनः बहुतोंके मरकर जानेपर भी जिस प्रकार वह लोक भरता नहीं है, सो क्या तू जानता है ?' 'नहीं' ऐसा उसने कहा । [ राजा-- ] 'क्या तू जानता है कि कितने बारकी आहुतिके हवन करनेपर आप ( जल ) पुरुष-शब्द-वाच्य हो उठकर बोलने लगता है ?' 'नहीं' ऐसा श्वेतकेतुने कहा । 'क्या तू देवयानमार्गका कर्मरूप साधन अथवा पितृयानका कर्मरूप साधन जानता है, जिसे करके लोग देवयानमार्गको प्राप्त होते हैं अथवा पितृयान-मार्गको ? हमने तो मन्त्रका यह वचन सुना है--'मैंने पितरोंका और देवोंका इस प्रकार दो मार्ग सुने हैं, ये दोनों मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग हैं । इन दोनों मार्गोंसे जानेवाला जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है तथा ये मार्ग ( द्युलोक और पृथिवीरूप ) पिता और माताके मध्यमें हैं ?' इसपर श्वेतकेतुने 'मैं इनमेंसे एकको भी नहीं जानता' ऐसा उत्तर दिया ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| वेत्थ विजानासि किं यथा येन प्रकारेणेमाः प्रजाः प्रसिद्धाः प्रयत्यो म्रियमाणा विप्रतिपद्यन्ता ३ इति विप्रतिपद्यन्ते, विचारणार्था प्लुतिः। समानेन मार्गेण गच्छन्तीनां मार्गद्वैविध्यं यत्र भवति तत्र काश्चित् प्रजा अन्येन मार्गेण गच्छन्ति काश्चिदन्येनेति विप्रति- | 'जिस प्रकार यह प्रसिद्ध प्रजा प्रेत होनेपर-मरनेपर विप्रतिपन्न होती है — सो क्या तू जानता है ? यहां 'विप्रतिपद्यन्ता ३' इसमें प्लुत स्वर प्रश्नके लिये है । समान मार्ग-से जाती हुई प्रजाके जहाँसे दो प्रकारके रास्ते हो जाते हैं, वहाँ कुछ प्रजा तो अन्य मार्गसे जाती है और कुछ दूसरेसे — इस प्रकार उन प्रजाओंकी विभिन्न गति होती है । तात्पर्य यह है कि जिस |
बृहदारण्यकोपनिषद्
प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतु
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