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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३]

६२६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३]
संस्कृतहिन्दी
यद्यिदं साधनजातम् अस्य कर्मण ऋत्विगग्नयादि मृत्युना कर्मलक्षणेन स्वाभाविकासङ्गसहितेन आप्तं व्याप्तम्, न केवलं व्याप्तमभिपन्नं च मृत्युना वशीकृतं च। केन दर्शनलक्षणेन साधनेन यजमानो मृत्योराप्तिमति मृत्युगोचरत्वम् अतिक्रम्य मुच्यते स्वतन्त्रो मृत्योरवशो भवतीत्यर्थः।इस कर्मका जो यह ऋत्विक् और अग्नि आदि साधनसमूह है, वह स्वाभाविक आसक्तिसहित कर्मरूप मृत्युसे व्याप्त है। केवल व्याप्त ही नहीं है, अपितु अभिपन्न अर्थात् मृत्युद्वारा वशमें किया हुआ है। सो किस दर्शनरूप साधनसे यजमान मृत्युकी प्राप्तिको पार कर अर्थात् मृत्युकी विषयताका अतिक्रमण कर मुक्त यानी स्वतन्त्र हो जाता है अर्थात् मृत्युके वशीभूत नहीं रहता।
ननूद्गीथ एवाभिहितं येनातिमुच्यते मुख्यप्राणात्मदर्शनेनेति।आक्षेप—किंतु जिस मुख्य प्राणात्मदर्शनसे वह मुक्त होता है, उसका वर्णन तो उद्गीथप्रकरणमें ही कर दिया है।
बाढमुक्तम्, योऽनुक्तो विशेषस्तत्र, तदर्थोऽयमारम्भ इत्यदोषः।समाधान—ठीक है, वहाँ वर्णन तो किया है; किंतु वहाँ जिस विशेषका उल्लेख नहीं किया, उसके लिये यह ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है; इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है।
होत्रर्त्विजाग्निना वाचेत्याह याज्ञवल्क्यः। एतस्यार्थं व्याचष्टे।याज्ञवल्क्यने कहा, 'होता ऋत्विक्-रूप अग्निसे और वाक्‌से उसका अतिक्रमण किया जा सकता है।' श्रुति इस वाक्यका अर्थ करती है।
कः पुनर्होता येन मृत्युमतिक्रामति? इत्युच्यते—वाग्वै यज्ञस्य यजमानस्य "यज्ञो वै यजमानः"भला, जिसके द्वारा यजमान मृत्युको पार करता है वह 'होता' कौन है? यह बताया जाता है—वाक् ही यज्ञका अर्थात् "यज्ञ ही यजमान है" इस श्रुतिके

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इति श्रुतेः। यज्ञस्य यजमानस्य या वाक् सैव होताधियज्ञे। कथम् ? तत्तत्र येयं वाग् यज्ञस्य यजमानस्य सोऽयं प्रसिद्धोऽग्निरधिदैवतम्। तदेतत् त्र्यन्नप्रकरणे व्याख्यातम्। स चाग्निर्होता "अग्निर्वै होता" इति श्रुतेः।अनुसार यजमानका होता है। [ तात्पर्य यह है कि ] जो वाणी है, वही अधियज्ञमें यज्ञ यानी यजमानका होता है। किस प्रकार ? इस प्रकार कि यहाँ जो यह यज्ञ यानी यजमानकी वाणी है, वही प्रसिद्ध अधिदैव अग्नि है। उस इस अग्निकी त्र्यन्न प्रकरणमें व्याख्या की गयी है। तथा "अग्नि ही होता है" इस श्रुतिके अनुसार वह अग्नि ही होता है।
यदेतद् यज्ञस्य साधनद्वयम्—होता चर्त्विग् अधियज्ञम्, अध्यात्मं च वाक्, एतदुभयं साधनद्वयं परिच्छिन्नं मृत्युना आप्तं स्वाभाविकाज्ञानासङ्गप्रयुक्तेन कर्मणा मृत्युना प्रतिक्षणमन्यथात्वमापद्यमानं वशीकृतम्। तद् अनेनाधिदैवतरूपेणाग्निना दृश्यमानं यजमानस्य यज्ञस्य मृत्योरतिमुक्तये भवति। तदेतदाह—स मुक्तिः स होता अग्निर्मुक्तिः, अग्निस্বরূপदर्शनमेव मुक्तिः।इस प्रकार यज्ञके जो ये दो साधन अधियज्ञ होता ऋत्विक् और अध्यात्म वाक् हैं; ये दोनों साधन परिच्छिन्न और मृत्युसे व्याप्त हैं तथा स्वाभाविक अज्ञान और आसक्तिप्रयुक्त कर्मरूप मृत्युसे प्रतिक्षण अन्यथात्वको प्राप्त हो रहे हैं और उसके द्वारा वशमें किये गये हैं। वे इस अधिदैवतरूप अग्निके द्वारा देखे जानेपर यजमानके यज्ञके मृत्युके अतिक्रमणके लिये होते हैं। इसीसे यह कहा है—वह मुक्ति है, वह होतारूप अग्नि मुक्ति है अर्थात् होताको अग्निरूप देखना ही उसकी मुक्ति है।
यदैव साधनद्वयमग्निरूपेण पश्यति, तदानीमेव हि स्वाभावि-जिस समय भी यजमान इन दोनों साधनोंको अग्निरूपसे देखता है, उसी समय वह स्वाभाविक

६२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| कादासङ्गान्मृत्योर्विमुच्यते आध्यात्मिकात् परिच्छिन्नरूपादाधिभौतिकाच्च। तस्मात् स होता अग्निरूपेण दृष्टो मुक्तिर्मुक्तिसाधनं यजमानस्य। सा अतिमुक्तिः—यैव च मुक्तिः साऽतिमुक्तिः, अतिमुक्तिसाधनमित्यर्थः। साधनद्वयस्य परिच्छिन्नस्य या अधिदेवतारूपेणापरिच्छिन्नेनाग्निरूपेण दृष्टिः, सा मुक्तिः। यासौ मुक्तिरधिदेवतादृष्टिः सैव, अध्यात्माधिभूतपरिच्छेदविषयासङ्गास्पदं मृत्युमतिक्रम्य अधिदेवतात्वस्याग्निभावस्य प्राप्तिर्या फलभूता, सा अतिमुक्तिरित्युच्यते। तस्या अतिमुक्तेर्मुक्तिरेव साधनमिति कृत्वा सा अतिमुक्तिरित्याह। <br><br> यजमानस्य ह्यतिमुक्तिर्वागादीनामग्न्यादिभाव इत्युद्गीथप्रकरणे व्याख्यातम्। तत्र सामान्येन मुख्यप्राणदर्शनमात्रं मुक्तिसाधनमुक्तम्, न तद्विशेषः। वागादीनाम् अग्न्यादिदर्शनमिह | आसक्तिरूप मृत्युसे अर्थात् आध्यात्मिक और आधिभौतिक परिच्छिन्नरूपसे मुक्त हो जाता है। अतः अग्निरूपसे देखा गया वह होता मुक्ति यानी यजमानकी मुक्तिका साधन है। वह अतिमुक्ति है—जो ही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति अर्थात् अतिमुक्तिका साधन है। इन दोनों परिच्छिन्न साधनोंकी जो अधिदैवरूप अपरिच्छिन्न अग्निरूपसे दृष्टि है, वही मुक्ति है। यह जो अधिदेवता-दृष्टिरूप मुक्ति है, वही अर्थात् अध्यात्म और अधिभूत परिच्छेदविषयक आसक्तिके स्थानभूत मृत्युको पार करके जो फलभूता अधिदैवत्व यानी अग्निभावकी प्राप्ति है, वही अतिमुक्ति कही जाती है। उस अतिमुक्तिका साधन मुक्ति ही है, इसलिये वह अतिमुक्ति है—ऐसा कहा गया है। <br><br> वागादिका अग्न्यादिभाव यजमानकी अतिमुक्ति है—इसकी व्याख्या उद्गीथप्रकरणमें की जा चुकी है। वहाँ मुख्य प्राणदर्शनमात्रको ही सामान्यरूपसे मुक्तिका साधन बतलाया है, उसका विशेष वर्णन नहीं किया। यहाँ वागादिमें अग्न्यादिदृष्टि करना यह विशेष बतलाया |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२९


| विशेषो वर्ण्यते । मृत्युप्राप्त्यतिमुक्तिस्तु सैव फलभूता, योद्गीथब्राह्मणेन व्याख्याता — 'मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते' ( १ । ३ । १२ ) इत्याद्या ॥ ३ ॥ | गया है। किंतु उसकी फलभूता जो मृत्युप्राप्तिसे अतिमुक्ति है, वह तो वही है, जिसकी उद्गीथब्राह्मणद्वारा 'मृत्युको पार करके दीप्त होता है' इस प्रकारसे व्याख्या की गयी है ॥ ३ ॥ |


अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदꣳ सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तꣳ सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणर्त्विजा चक्षुषादित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ४ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, सब दिन और रात्रिके अधीन है। तब किस साधनके द्वारा यजमान दिन और रात्रिकी व्याप्तिका अतिक्रमण कर सकता है? [ इसपर याज्ञवल्क्य बोला— ] 'अध्वर्यु-ऋत्विक और चक्षुरूप आदित्यके द्वारा। अध्वर्यु यज्ञका चक्षु ही है। अतः यह जो चक्षु है, वह यह आदित्य है और वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ४ ॥


| याज्ञवल्क्येति होवाच । स्वाभाविकादज्ञानासङ्गप्रयुक्तात् कर्मलक्षणान्मृत्योरतिमुक्तिर्व्याख्याता। तस्य कर्मणः सासङ्गस्य मृत्योराश्रयभूतानां दर्शपूर्णमासादिकर्मसाधनानां यो विपरिणामहेतुः | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा। स्वाभाविक अज्ञानजनित आसक्तिसे होनेवाले कर्मरूप मृत्युसे अतिमुक्तिकी व्याख्या कर दी गयी जो उस आसक्तियुक्त कर्मरूप मृत्युके आश्रयभूत दर्श और पूर्णमासादि कर्मके साधनोंके विपरिणामका हेतुभूतकाल |

६३० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३]

६३० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३]


| कालः, तस्मात् कालात् पृथगतिमुक्तिर्वक्तव्येतीदमारभ्यते, क्रियानुष्ठानव्यतिरेकेणापि प्रागूर्ध्वं च क्रियायाः साधनविपरिणामहेतुत्वेन व्यापारदर्शनात् कालस्य । तस्मात् पृथक्कालादतिमुक्तिर्वक्तव्येत्यत आह—<br><br>यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तम्, स च कालो द्विरूपः—अहोरात्रादिलक्षणः, तिथ्यादिलक्षणश्च । तत्राऽहोरात्रादिलक्षणात्तावदतिमुक्तिमाह—अहोरात्राभ्यां हि सर्वं जायते वर्धते विनश्यति च, तथा यज्ञसाधनं च ।<br><br>यज्ञस्य यजमानस्य चक्षुरध्वर्युश्च । शिष्टान्यक्षराणि पूर्ववन्नेयानि । यजमानस्य चक्षुरध्वर्युश्च साधनद्वयमध्यात्मधिभूतपरिच्छेदं हित्वाऽधिदैवतात्मना दृष्टं यत् स | है, उस कालसे पृथक् जो अतिमुक्ति है [ अर्थात् जो उस कालसे मुक्त होनेका साधन है ] उसका वर्णन करना है, इसलिये यह आरम्भ किया जाता है, क्योंकि क्रियाके अनुष्ठानके बिना भी क्रियाके पूर्व और पश्चात् उसके साधनोंके विपरिणामके हेतुरूपसे कालका व्यापार देखा जाता है। अतः कालसे पृथक् अतिमुक्तिका वर्णन करना आवश्यक है, इसलिये श्रुति कहती है—<br><br>यह जो कुछ है सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, वह काल दो प्रकारका है—दिन-रात्रिरूप और तिथ्यादिरूप । उनमेंसे पहले अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्ति बतलायी जाती है—दिन-रातसे ही सब उत्पन्न होता, बढ़ता और नाशको प्राप्त होता है। इसी प्रकार यज्ञके साधन भी उन्हींसे उत्पन्न होते, बढ़ते और नष्ट होते हैं ।<br><br>यज्ञ यानी यजमानके नेत्र और अध्वर्यु—शेष अक्षरोंको पूर्ववत् लगाना चाहिये। अर्थात् यजमानके नेत्र और अध्वर्यु ये दोनों साधन अपने अध्यात्म और अधिभूत परिच्छेदको त्यागकर जब अधिदैवरूपसे देखे जाते हैं तो वही इनकी मुक्ति |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१


| मुक्तिः सोऽध्वर्युरादित्यभावेन दृष्टो मुक्तिः। सैव मुक्तिरेवातिमुक्तिरिति। पूर्ववत् आदित्यात्मभावमापन्नस्य हि नाहोरात्रे सम्भवतः ॥ ४ ॥ | है। आदित्यभावसे देखा हुआ वह अध्वर्यु मुक्ति ही है। पूर्ववत् वह मुक्ति ही अतिमुक्ति है, क्योंकि आदित्यभावको प्राप्त हुए पुरुषके लिये दिन-रात होने सम्भव नहीं हैं ॥ ४ ॥ |


तिथ्यादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन

| इदानीं तिथ्यादिलक्षणादतिमुक्तिरुच्यते— | अब तिथ्यादिरूप कालसे अतिमुक्ति बतलायी जाती है— |

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदꣳ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्तꣳ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥५॥

'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षसे व्याप्त है; सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षद्वारा वशमें किया हुआ है। किस उपायसे यजमान पूर्वपक्ष और अपरपक्षकी व्याप्तिसे पार होकर मुक्त होता है?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा— ] 'उद्गाता ऋत्विक्से और वायुरूप प्राणसे; क्योंकि उद्गाता यज्ञका प्राण ही है। तथा यह जो प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ५ ॥

| यदिदं सर्वम्—अहोरात्रयोरविशिष्टयोरादित्यः कर्ता, न प्रतिपदादीनां तिथीनाम्; तासां तु वृद्धिक्षयोपगमनेन प्रतिपत्प्रभृतीनां | यदिदं सर्वम्—ये जो अविशिष्ट (वृद्धिक्षयशून्य) दिन-रात हैं, इन सबका कर्ता आदित्य है किंतु वह प्रतिपदादि तिथियोंका कर्ता नहीं है; उन प्रतिपदादिके तो वृद्धि और क्षय देखे जाते हैं, अतः उनका कर्ता तो |

६३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| चन्द्रमाः कर्ता। अतस्तदापत्त्या पूर्वपक्षापरपक्षात्ययः, आदित्यापत्त्या अहोरात्रात्ययवत्। | चन्द्रमा है। अतः आदित्यभावकी प्राप्तिसे जैसे अहोरात्रका अतिक्रमण होता है, उसी प्रकार चन्द्रभावकी प्राप्तिसे पूर्वपक्ष और अपरपक्षका अतिक्रमण किया जा सकता है। | | तत्र यजमानस्य प्राणो वायुः, स एवोद्गाता—इत्युद्गीथब्राह्मणेऽवगतम् 'वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायत्' इति च निर्धारितम्। 'अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः' इति च। | वहाँ (काण्वशाखाकी श्रुतिमें) यजमानका प्राण वायु है। वही उद्गाता है—यह बात उद्गीथब्राह्मणमें जानी गयी थी और यह निश्चय किया गया था कि उसने वाक्से और प्राणसे उद्गान किया इस प्राणका जल शरीर है और यह चन्द्र ज्योतीरूप है। | | प्राणवायुचन्द्रमसामेकत्वाच्चन्द्रमसा वायुना चोपसंहारे न कश्चिद्विशेषः। एवं मन्यमाना श्रुतिर्वायुनाऽधिदैवतरूपेणोपसंहरति। | वायु, प्राण और चन्द्रमाकी एकता होनेके कारण यदि [ उद्गीथब्राह्मणोक्त और उपर्युक्त श्रुतियोंका ] चन्द्रमा और वायुरूपसे [ अलग-अलग ] उपसंहार किया गया है तो उसमें कोई अन्तर नहीं है। ऐसा मानकर ही श्रुति इस मन्त्रका अधिदैव वायुरूपसे उपसंहार करती है। | | अपि च वायुनिमित्तौ हि वृद्धिक्षयौ चन्द्रमसः। तेन तिथ्यादिलक्षणस्य कालस्य कर्तुरपि कारयिता वायुः। अतो वायुरूपापन्नस्तिथ्यादिकालादतीतो भवतीत्युपपन्नतरं भवति। तेन | इसके सिवा चन्द्रमाके वृद्धि और क्षय भी वायुके ही कारण हैं। अतः वायु तिथ्यादिरूप कालके कर्ता ( चन्द्रमा ) का भी करानेवाला है। इसलिये वायुरूपको प्राप्त हुआ पुरुष तिथ्यादिरूप कालसे पार हो जाता है—यह कथन और भी युक्तियुक्त है। अतः अन्य श्रुति (माध्यन्दिनीय |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३

| श्रुत्यन्तरे चन्द्ररूपेण दृष्टिर्मुक्ति-<br>रतिमुक्तिश्च। इह तु काण्वानां<br>साधनद्वयस्य तत्कारणरूपेण<br>वाय्वात्मना दृष्टिर्मुक्तिरतिमुक्ति-<br>श्चेति न श्रुत्योर्विरोधः ॥ ५ ॥ | शाखा ) में जो चन्द्ररूपसे दृष्टि है,<br>वह मुक्ति और अतिमुक्ति है। परंतु<br>यहाँ काण्वशाखावालोंके मतमें<br>अहोरात्र और तिथि आदि दोनों<br>ही साधनोंके कारणभूत वायुभावसे<br>जो दृष्टि है, वह मुक्ति और अति-<br>मुक्ति है-इसलिये इन श्रुतियोंमें<br>विरोध नहीं है ॥ ५ ॥ |


परिच्छेदके विषयभूत मृत्युको पार करनेके आश्रयका वर्णन

| मृत्योः कालादातिमुक्तिर्व्या-<br>ख्याता यजमानस्य। सोऽति-<br>मुच्यमानः केनावष्टम्भेन परिच्छेद-<br>विषयं मृत्युमतीत्य फलं प्राप्नोति-<br>अतिमुच्यत इत्युच्यते— | यजमानकी मृत्युरूप कालसे<br>अतिमुक्ति होनेकी व्याख्या की<br>गयी। वह अतिमुक्त होता हुआ<br>किस आश्रयसे परिच्छेदके विषय-<br>भूत मृत्युको पार करके फल प्राप्त<br>करता—अतिमुक्त होता है-सो<br>बतलाया जाता है- |

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्ब-<br>णमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति<br>ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा<br>तद्यदिदं मनः सोऽसौ चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः<br>सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ सम्पदः ॥ ६ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो अन्तरिक्ष है, वह निरालम्ब-सा है। अतः यजमान किस आलम्बनसे स्वर्गलोकमें चढ़ता है।' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'ब्रह्मा ऋत्विजके द्वारा और मनरूप चन्द्रमासे

६३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

ब्रह्मा यज्ञका मन ही है। और यह जो मन है, वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है।' इस प्रकार अतिमोक्षोंका वर्णन हुआ, अब सम्पदोंका निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यदिदं प्रसिद्धमन्तरिक्षमाकाशः अनारम्बणम् अनालम्बनम् इव-शब्दादस्त्येव तत्रालम्बनम्, तत्तु न ज्ञायत इत्यभिप्रायः। यत्तु तदज्ञायमानमालम्बनम्, तत् सर्वनाम्ना केनेति पृच्छ्यते; अन्यथा फलप्राप्तेरसम्भवात्। येनावष्टम्भेनाक्रमेण यजमानः कर्मफलं प्रतिपद्यमानः अतिमुच्यते, किं तदिति प्रश्नविषयः। केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति, स्वर्गं लोकं फलं प्राप्नोत्यतिमुच्यत इत्यर्थः।यह जो प्रसिद्ध अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश है, वह अनारम्बन-अनालम्बन-सा है। 'इव' शब्दसे यह अभिप्राय है कि इसमें आलम्बन तो है किंतु वह जाना नहीं जाता। यहाँ जो ज्ञात न होनेवाला आलम्बन है, वही 'केन' इस सर्वनामद्वारा पूछा जाता है। नहीं तो [ यदि आलम्बनका अभाव माना जायगा तो ] फलप्राप्ति ही सम्भव न होगी। यहाँ प्रश्नका विषय यह है कि जिस आश्रयके द्वारा यजमान कर्मफलको प्राप्त होता हुआ अतिमुक्त होता है, वह क्या है ? तात्पर्य यह है कि यजमान किस आश्रयसे स्वर्गलोकपर आरूढ़ होता है, यानी स्वर्गलोकरूप फलको प्राप्त करता अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है।
ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेणेत्यक्षरन्यासः पूर्ववत्। तत्राध्यात्मं यज्ञस्य यजमानस्य यदिदं प्रसिद्धं मनः, सोऽसौ चन्द्रोऽधिदैवम्। मनोऽध्यात्मं चन्द्रमा अधिदैवत-ब्रह्मरूप ऋत्विक्से और मन-रूप चन्द्रमासे-इन अक्षरोंकी योजना पूर्ववत् करनी चाहिये। यहाँ यज्ञ यानी यजमानका जो यह प्रसिद्ध अध्यात्म मन है, वही यह अधिदैव चन्द्रमा है। मन अध्यात्म है और

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
मिति हि प्रसिद्धम् । स एव चन्द्रमा ब्रह्मर्त्विक् । तेनाधिभूतं ब्रह्मणः परिच्छिन्नं रूपमध्यात्मं च मनस एतद्द्वयमपरिच्छिन्नेन चन्द्रमसो रूपेण पश्यति । तेन चन्द्रमसा मनसावलम्बनेन कर्मफलं स्वर्गं लोकं प्राप्नोत्यतिमुच्यते इत्यभिप्रायः । इतीत्युपसंहारार्थं वचनम् । इत्येवम्प्रकारा मृत्योरतिमोक्षाः । सर्वाणि हि दर्शनप्रकाराणि यज्ञाङ्गविषयाण्यस्मिन्नवसर उक्तानीति कृत्वोपसंहारः । इत्यतिमोक्षाः, एवम्प्रकारा अतिमोक्षा इत्यर्थः ।चन्द्रमा अधिदैवत है—यह प्रसिद्ध ही है। वही चन्द्रमा ब्रह्मा ऋत्विक् है। इसीसे अधिभूत ब्रह्माके और अध्यात्म मनके जो परिच्छिन्नरूप हैं—इन दोनोंको चन्द्रमाके अपरिच्छिन्नरूपसे देखता है। उस चन्द्रमारूप मनको आश्रय मानकर उससे अपने कर्मफलभूत स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है—ऐसा इसका अभिप्राय है। 'इत्यतिमोक्षाः' इस वाक्यमें 'इति' पद उपसंहारके लिये कहा गया है। अर्थात् इतने प्रकारके मृत्युसे अतिमोक्ष हैं। इस बीचमें यज्ञाङ्गविषयक सभी दर्शन-प्रकारोंका वर्णन कर दिया गया है—इसलिये यह उपसंहार किया है। 'इत्यतिमोक्षाः' अर्थात् इतने प्रकारके अतिमोक्ष हैं।
अथ सम्पदः—अथाधुना सम्पद उच्यन्ते। सम्पन्नाम केनचित्सामान्येनाग्निहोत्रादीनां कर्मणां फलवतां तत्फलाय सम्पादनं सम्पत्फलस्यैव वा। सर्वोत्साहेन फलसाधनानुष्ठाने प्रयतमानानां'अथ सम्पदः'—अब सम्पदोंका वर्णन किया जाता है। 'सम्पद्' का तात्पर्य यह है कि किसी भी समानतासे अग्निहोत्रादि फलयुक्त कर्मोंका उस फलके लिये सम्पादन (आरोप) किया जाय, अथवा सम्पद्के फल (देवलोकादि) का ही [उज्ज्वलत्वादि सामान्यके कारण आज्यादि आहुतियोंमें सम्पादन किया जाय]। जो लोग पूर्ण उत्साहसे किसी फलके साधनका अनुष्ठान करनेके

६३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

६३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३


केनचिद्वैगुण्येनारसम्भवः । तदिदानीमाहिताग्निः सन् यत् किञ्चित् कर्माग्निहोत्रादीनां यथासम्भवमादाय आलम्बनीकृत्य कर्मफलविद्वत्तायां सत्यां यत्कर्मफलकामो भवति, तदेव सम्पादयति । अन्यथा राजसूयाश्वमेधपुरुषमेधसर्वमेधलक्षणानाम् अधिकृतानां त्रैवर्णिकानामप्यसम्भवः—तेषां तत्पाठः स्वाध्यायर्थ एव केवलः स्यात्, यदि तत्फलप्राप्त्युपायः कश्चन न स्यात् । तस्मात्तेषां सम्पदैव तत्फलप्राप्तिः, तस्मात् सम्पदामपि फलवत्त्वम्, अतः सम्पद आरभ्यन्ते ॥ ६ ॥लिये प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें किसी भी दोषके कारण उसकी प्राप्ति असम्भव हो जाती है। अतः इस समय [सम्पद्के द्वारा] पुरुष आहिताग्नि होकर अग्निहोत्रादिमेंसे जिसका करना सम्भव हो ऐसे किसी कर्मको लेकर उसीके आश्रयसे, कर्म फलका ज्ञान होनेपर, जिस कर्म-फलकी इच्छा होती है उसीका सम्पादन कर लेता है। नहीं तो राजसूय, अश्वमेध, पुरुषमेध एवं सर्वमेधरूप कर्मोंके अधिकारी त्रैवर्णिकोंको भी उनका फल मिलना असम्भव है। यदि [धनाभावादिके कारण] उन राजसूयादिके फलकी प्राप्तिका कोई उपाय न हो तो उनका वह पाठ केवल स्वाध्यायके लिये ही होगा। अतः उन्हें उनकी सम्पत्तिसे ही उनके फलकी प्राप्ति हो जायगी ।¹ इसलिये सम्पदोंकी भी फलवत्ता है; अतः सम्पदोंका आरम्भ किया जाता है॥ ६ ॥

१. भावनाद्वारा किसी अन्य वस्तुका अन्यमें आरोप करना 'सम्पद्' कहलाता है। राजसूयादि कर्म बहुत द्रव्यसाध्य हैं तथा उनमेंसे प्रत्येक कर्मका सभी त्रैवर्णिकोंको अधिकार भी नहीं है। ऐसी अवस्थामें जो धनाभाव या अन्य वर्णमें उत्पन्न होनेके कारण उनमेंसे किसी कर्मको नहीं कर सकते, वे सम्पद्द्वारा उनका फल प्राप्त कर सकते हैं। यदि सम्पत्-कर्म न होता तो उनके लिये उन यज्ञोंका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र केवल स्वाध्यायमें ही उपयोगी हो सकता था; इसलिये सम्पदोंका प्रतिपादन बहुत उपयोगी है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३७


शस्त्रसम्बन्धी ऋचाएँ और उनसे प्राप्त होनेवाला फल

याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होता-
स्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्र
इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं
ताभिर्जयतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज कितनी ऋचाओंके द्वारा होता इस यज्ञमें शस्त्र-शंसन करेगा?' [याज्ञवल्क्यने कहा-] 'तीनके द्वारा।' [अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं? [याज्ञवल्क्य-] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [अश्वल-] 'इनसे यजमान किसको जीतता है?' [याज्ञवल्क्य—] 'यह जितना भी प्राणिसमुदाय है। [उस सबको जीत लेता है]' ॥ ७ ॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
याज्ञवल्क्येति होवाच अभिमुखीकरणाय। कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन् यज्ञे कतिभिः कतिसङ्ख्याभिर्ऋग्भिर्ऋग्जातिभिः अयं होतर्त्विगस्मिन् यज्ञे करिष्यति शस्त्रं शंसति। **आहेतरः—तिसृभि-**र्ऋग्जातिभिः। इत्युक्तवन्तं प्रत्याहेतरः—कतमास्तास्तिस्र इति। सङ्ख्येयविषयोऽयं प्रश्नः, पूर्वस्तु सङ्ख्याविषयः।अपने अभिमुख करनेके लिये अश्वलने 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा कहा। 'कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन् यज्ञे—आज यह होता इस यज्ञमें कितनी ऋचाओं अर्थात् कितनी संख्यावाली ऋग्जातियोंद्वारा शस्त्र-शंसन करेगा?' इसपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा, 'तीन ऋग्जातियोंद्वारा।' इस प्रकार कहनेवाले याज्ञवल्क्यसे अश्वलने कहा, 'वे तीन कौन-कौन हैं?' यह प्रश्न जिनकी [तीन—यह] संख्या की गयी है, उन ऋग्जातियोंके विषयमें है तथा इससे पहला प्रश्न उनकी संख्याके विषयमें था।

६३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६३८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| पुरोनुवाक्या च—प्राग् यागकालाद् याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिः पुरोनुवाक्येत्युच्यते। यागार्थं याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिर्याज्या। शस्त्रार्थं याः प्रयुज्यन्ते ऋचः, सा ऋग्जातिः शस्या। सर्वास्तु याः काश्चन ऋचः, ताः स्तोत्रिया वा अन्या वा सर्वा एतास्वेव तिसृषु ऋग्जातिष्वन्तर्भवन्ति। | ‘पुरोनुवाक्या च’—जो ऋचाएँ यागकालसे पहले प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ‘पुरोनुवाक्या’ कही जाती हैं। जो ऋचाएँ यागके लिये प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ‘याज्या’ कहलाती हैं। तथा जो ऋचाएँ शस्त्रकर्मके लिये प्रयुक्त होती हैं, वह ऋग्जाति ‘शस्या’ कही जाती हैं। जितनी भी ऋचाएँ हैं—वे स्तोत्रिया हों अथवा कोई अन्य—इन तीन ऋग्जातियोंके ही अन्तर्गत हैं। | | किं ताभिर्जयतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति—अतश्च सङ्ख्यासामान्याद् यत्किञ्चित्प्राणभृज्जातम्, तत् सर्वं जयति तत् सर्वं फलजातं सम्पादयति सङ्ख्यादिसामान्येन ॥ ७॥ | ‘उनके द्वारा पुरुष किसपर जय प्राप्त करता है’ इसपर कहते हैं—यह जो कुछ प्राणिसमुदाय है, उसे जीत लेता है। अतः [तीन ऋग्जाति और तीन लोकोंकी ] संख्यामें समानता होनेके कारण यह जितना प्राणिसमुदाय है, वह इस सबको जीत लेता है। अर्थात् संख्यादिमें समानता होनेके कारण वह उस समस्त फलसमूहका सम्पादन कर लेता है ॥ ७ ॥ |

होमसम्वन्धिनी आहुतियाँ और उनसे प्राप्त होनेवाले फल

याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३९


हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमें यह अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ होम करेगा !' [ याज्ञवल्क्य-] 'तीन ।' [ अश्वल- ] 'वे तीन कौन-कौन-सी हैं, [ याज्ञवल्क्य- ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं और जो होम की जानेपर पृथ्वीके ऊपर लीन हो जाती हैं।' [ अश्वल- ] 'इनके द्वारा यजमान किसको जीतता है।' [ याज्ञवल्क्य- ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं; उनसे यजमान देवलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि देवलोक मानो देदीप्यमान हो रहा है। जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे वह पितृलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि पितृलोक मानो अत्यन्त शब्द करनेवाला है। जो होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे मनुष्यलोकको ही जीतता है; क्योंकि मनुष्यलोक अधोवर्ती-सा है' ॥ ८ ॥

| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत् । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति, कत्याहुतिप्रकाराः ? तिस्र इति, कतमास्तास्तिस्र इति पूर्ववत् । <br><br> इतर आह—या हुता उज्ज्व- | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अपने अभिमुख करनेके लिये ] कहा, 'आज यह अध्वर्यु इस यज्ञमें कितनी आहुतियाँ हवन करेगा ?' अर्थात् आहुतियोंके कितने प्रकार हैं ?' [याज्ञवल्क्य-] 'तीन ।' फिर पूर्ववत् पूछता है—'कौन-कौन तीन ?' <br><br> इसपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) कहता है—'जो हवन की जानेपर |

६४० | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६४०वृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| लन्ति समिदाज्याहुतयः या हुता अतिनेदन्तेऽतीव शब्दं कुर्वन्ति मांसाद्याहुतयः, या हुता अधिशेरतेऽध्यधो गत्वा भूमेरधिशेरते पयःसोमाहुतयः ।<br><br>किं ताभिर्जयतीति, ताभिरेवं निर्वर्त्तिताभिराहुतिभिः किं जयतीति । या आहुतयो हुता उज्ज्वलन्त्युज्ज्वलनयुक्ता आहुतयो निर्वर्तिताः, फलं च देवलोकाख्यमुज्ज्वलमेव, तेन सामान्येन या मया ता उज्ज्वलन्त्य आहुतयो निर्वर्त्यमानास्ता एताः साक्षाद्देवलोकस्य कर्मफलस्य रूपं देवलोकाख्यं फलमेव मया निर्वर्त्यत इत्येवं सम्पादयति ।<br><br>या हुता अतिनेदन्ते आहुतयः पितृलोकमेव ताभिर्जयति कुत्सितशब्दकर्तृत्वसामान्येन । पितृ- | प्रज्वलित होती हैं, वे समिध् और घृतकी आहुतियाँ, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, वे आहुतियाँ और जो होम की जानेपर अधिशयन करतीं अर्थात् नीचे पृथ्वीपर जाकर लीन हो जाती हैं, वे दुग्ध और सोमकी आहुतियाँ।’<br><br>‘इनसे यजमान किसको जीतता है ? अर्थात् इस प्रकार सम्पन्न की हुई उन आहुतियोंसे यजमान क्या जीत लेता है !’ [याज्ञवल्क्य–] जो हवन की हुई आहुतियाँ उज्ज्वलित होती हैं अर्थात् उज्ज्वलनयुक्त होती हैं, उनका देवलोकसंज्ञक फल भी उज्ज्वल ही है । इन दोनोंमें यह समानता होनेके कारण यजमान इस प्रकार सम्पादन (भावना) करता है कि मेरेद्वारा जो ये उज्ज्वलित आहुतियाँ दी जा रही हैं, वे साक्षात् इस कर्मके फलस्वरूप देवलोकका रूप हैं, अतः इनके द्वारा मैं देवलोकरूप फलको निष्पन्न कर रहा हूँ ।<br><br>जो आहुतियाँ होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे यजमान पितृलोकको ही जीतता है, क्योंकि कुत्सित शब्द करनेवाले होनेसे इनके साथ उनकी समानता है। |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४१


| लोकसम्बद्धायां हि संयमन्यां पुर्यां वैवस्वतेन यात्यमानानां ‘हा हताः स्म मुञ्च मुञ्च’ इति शब्दो भवति। तथावदानाहुतयः तेन पितृलोकसामान्यात् पितृलोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति ।<br><br>या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयति भूम्युपरि सम्बन्धसामान्यात् । अध इव ह्यध एव हि मनुष्यलोकः उपरितनान् साध्याँल्लोकानपेक्ष्य, अथवाधोगमनमपेक्ष्य । अतो मनुष्यलोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति पयःसोमाहुतिनिर्वर्तनकाले ॥ ८ ॥ | पितृलोकसे सम्बद्ध संयमनीपुरीमें यमराजके द्वारा यातना भोगते हुए जीवोंका ‘हाय मरे ! छोड़ ! छोड़ !’ ऐसा शब्द होता रहता है। इसी प्रकार अवदान-आहुतियाँ भी शब्द करनेवाली हैं। अतः पितृलोकसे समानता होनेके कारण इनसे मेरेद्वारा पितृलोक ही प्राप्त किया जाता है, इस प्रकार यजमान सम्पादन करता है।<br><br>जो आहुतियाँ होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे यजमान मनुष्यलोकपर ही विजय प्राप्त करता है; क्योंकि पृथ्वीके ऊपरी भागसे सम्बद्ध होनेमें उन दोनोंकी समानता है। मनुष्यलोक ऊपरके साधनसाध्य लोकोंकी अपेक्षा अधः—नीचे ही स्थित है। अथवा अधोगमनकी अपेक्षासे वे मनुष्यलोकको ही जीतते हैं। अतः दूध या सोमकी आहुति देते समय यजमान यही सम्पादन करता है कि इससे मेरेद्वारा मनुष्यलोक ही प्राप्त किया जाता है ॥ ८ ॥ |


ब्रह्माके यज्ञरक्षाके साधन और उससे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन

याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन

बृ० उ० ४१—

६४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ६ ॥

‘हे याज्ञवल्क्य !’ ऐसा अश्वलने कहा, ‘आज यह ब्रह्मा यज्ञमें दक्षिणकी ओर बैठकर कितने देवताओं द्वारा यज्ञकी रक्षा करता है?’ [ याज्ञवल्क्य–] ‘एकके द्वारा।’ [ अश्वल–] ‘वह एक देवता कौन है?’ [ याज्ञवल्क्य–] ‘वह मन ही है। मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं; अतः उस मनसे यजमान अनन्त लोकको जीत लेता है’ ॥ ६ ॥

| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत्। अयमृत्विग्ब्रह्मा दक्षिणतो ब्रह्मासने स्थित्वा यज्ञं गोपायति। कतिभिर्देवताभिर्गोपायतीति प्रासङ्गिकमेतद्बहुवचनम्, एकया हि देवतया गोपायत्यसौ, एवं ज्ञाते बहुवचनेन प्रश्नो नोपपद्यते स्वयं जानतः। तस्मात् पूर्वयोः कण्डिकयोः प्रश्नप्रतिवचनेषु कतिभिः कति तिसृभिः तिस्र इति प्रसङ्गं दृष्ट्वेहापि बहुवचनेनैव प्रश्नोपक्रमः क्रियते। अथवा प्रतिवादिव्यामोहार्थं बहुवचनम् | ‘हे याज्ञवल्क्य !’ ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अभिमुख करनेके लिये ] कहा ‘यह ब्रह्मानामक ऋत्विक् दक्षिणकी ओर ब्रह्माके लिये निश्चित आसनपर बैठकर यज्ञकी रक्षा करता है। वह कितने देवताओं-द्वारा उसकी रक्षा करता है?’ यहाँ देवता शब्दमें जो बहुवचन है, वह प्रसङ्गवश है; क्योंकि ब्रह्मा एक ही देवतासे यज्ञकी रक्षा करता है–यह स्वयं जानते हुए व्यक्तिके लिये बहुवचनद्वारा प्रश्न करना उचित नहीं है। अतः पहली दो कण्डिकाओं-के प्रश्न और उत्तरोंमें ‘कतिभिः कति’ और ‘तिसृभिः तिस्रः’ ऐसा प्रसङ्ग देखकर यहाँ भी प्रश्नका आरम्भ बहुवचनसे ही किया जाता है। अथवा यह बहुवचन अपने प्रतिवादीको भ्रममें डालनेके लिये भी हो सकता है। |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४३ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ६४३

| इतर आहैकयेति । एका सा देवता यया दक्षिणतः स्थित्वा ब्रह्मा आसने यज्ञं गोपायति । कतमा सैकैति । मन एवेति, मनः सा देवता । मनसा हि ब्रह्मा व्याप्रियते ध्यानेनैव । “तस्य यज्ञस्य मनश्च वाक्च वर्तनी तयोरन्यतरां मनसा संस्क-रोति ब्रह्मा” (छा० उ० ४ । १६ । १) इति श्रुत्यन्तरात् । तेन मन एव देवता तया मनसा हि गोपायति ब्रह्मा यज्ञम् ।<br><br>तच्च मनो वृत्तिभेदेनानन्तम् । वैशब्दः प्रसिद्धार्थद्योतनार्थः । प्रसिद्धं मनस आनन्त्यम् । तदा-नन्त्याभिमानिनो देवाः, अनन्ता वै विश्वे देवाः । “सर्वे देवा यत्रैकं भवन्ति” इत्यादिश्रुत्यन्त-रात् । तेन आनन्त्यसामान्यादन-न्तमेव स तेन लोकं जयति ॥९॥ | इसपर (याज्ञवल्क्य) कहते हैं, 'एकया इति; जिसके द्वारा दक्षिणकी ओर आसनपर बैठकर ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है, वह देवता एक है।' 'वह एक देवता कौन है?' इसपर कहते हैं—वह मन ही है—वह देवता मन ही है। मनके द्वारा ध्यान करके ही ब्रह्मा अपना कार्य करता है। “उस यज्ञके मन और वाक्—ये दो मार्ग हैं, उनमेंसे एक (वाक्) का संस्कार ब्रह्मा मन यानी मौनसे करता है” इस अन्य श्रुतिसे भी यही कहा गया है। अतः मन ही देवता है, उस मनसे ही ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है।<br><br>और वह मन वृत्तिभेदसे अनन्त है। 'वै' शब्द प्रसिद्ध अर्थका द्योतन करनेके लिये है। मनका अनन्तत्व प्रसिद्ध है। उस अनन्तत्वके अभि-मानी जो देव हैं, वे सम्पूर्ण देव भी अनन्त हैं। “जिस मनमें समस्त देव एक (अभिन्न) हो जाते हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिसे भी यही प्रकट होता है। अतः अनन्ततामें समानता होनेके कारण वह उसके द्वारा अनन्तलोकको ही जीत लेता है ॥६॥ |

६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६४४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

स्तवनसम्बन्धिनी ऋचाओंका और उनसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन

याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्यापानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकँ शस्यया ततो ह होताश्वल उपरराम ॥१०॥

'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमें उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' [याज्ञवल्क्य-] 'तीनका' [अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [अश्वल-] इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती हैं, वे कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'प्राण ही पुरोनुवाक्या है; अपान याज्या है और व्यान शस्या है।' [अश्वल-] 'इनसे यजमान किनपर जय प्राप्त करता है?' [याज्ञवल्क्य-] पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर और शस्यासे द्युलोकपर विजय प्राप्त करता है। इसके पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥१०॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत्। कति स्तोत्रियाः स्तोष्यतीत्ययमुद्गाता। स्तोत्रिया नाम ऋक्सामसमुदायः कतिपयानामृचाम्। स्तोत्रिया वा शस्या वा याः'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [अभिमुख करनेके लिये] कहा, 'यह उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' 'स्तोत्रिया' यह कुछ ऋचाओंके ऋक्सामसमुदायका नाम है। स्तोत्रिया हो अथवा शस्या, जो कुछ

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५


संस्कृतहिन्दी
काश्चन ऋचः, ताः सर्वास्तिस्र एवेत्याह । ताश्च व्याख्याताः— पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीयेति ।भी ऋचाएँ हैं, वे सब तीन ही प्रकारकी हैं—यही बात अब बतायी जाती है। उन्हींकी पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या—ऐसा कहकर व्याख्या की गयी है।
तत्र पूर्वमुक्तम्—यत्किञ्चेदं प्राणभृत् सर्वं जयतीति तत् केन सामान्येन ? इत्युच्यते—कतमास्तास्तिस्र ऋचो या अध्यात्मं भवन्तीति । प्राण एव पुरोनुवाक्या, पशब्दसामान्यात् । अपानो याज्या, आनन्तर्यात् । अपानेन हि प्रत्तं हविर्देवता ग्रसन्ति, यागश्च प्रदानम् ।यहाँ पहले (मन्त्र ७ में) जो यह कहा गया है कि यह जो कुछ प्राणिवर्ग है, उस सभीको जीत लेता है, सो किस समानताके कारण है—यह कहते हैं अर्थात् 'इनमें जो अध्यात्म (देहान्तर्वर्ती) हैं, वे तीन ऋचाएँ कौन-सी हैं'—इस प्रश्नद्वारा यह बतलाया जाता है—प्राण ही पुरोनुवाक्या है; क्योंकि 'प' शब्दमें इन दोनोंकी समानता है। अपान याज्या है क्योंकि आनन्तर्यमें दोनोंकी समानता है।² इसके सिवा देवगण दी हुई हविको अपानसे ही ग्रहण करते हैं; और प्रदान ही याग है [अतः अपान याज्या ऋचाएँ हैं]।
व्यानः शस्या—"अप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति" (छा० उ० १ । ३ । ४) । इति श्रुत्यन्तरात् ।व्यान शस्या है, जैसा कि "प्राण अपान-व्यापार न करता हुआ ऋचाओंका उच्चारण करता है" इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है।

१. प्रगीत ऋचाओंको स्तोत्र कहते हैं और अप्रगीत ऋचाओंको शस्त्र। इनमें स्तोत्र ही स्तोत्रिया ऋचाएँ हैं और शस्त्र शस्या हैं।
२. कारण जैसे अपान प्राणके अनन्तर है, उसी प्रकार याज्या ऋचाएँ पुरोनुवाक्या ऋचाओंके अनन्तर हैं।