भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 652
६४२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ६ ॥

‘हे याज्ञवल्क्य !’ ऐसा अश्वलने कहा, ‘आज यह ब्रह्मा यज्ञमें दक्षिणकी ओर बैठकर कितने देवताओं द्वारा यज्ञकी रक्षा करता है?’ [ याज्ञवल्क्य–] ‘एकके द्वारा।’ [ अश्वल–] ‘वह एक देवता कौन है?’ [ याज्ञवल्क्य–] ‘वह मन ही है। मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं; अतः उस मनसे यजमान अनन्त लोकको जीत लेता है’ ॥ ६ ॥

| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत्। अयमृत्विग्ब्रह्मा दक्षिणतो ब्रह्मासने स्थित्वा यज्ञं गोपायति। कतिभिर्देवताभिर्गोपायतीति प्रासङ्गिकमेतद्बहुवचनम्, एकया हि देवतया गोपायत्यसौ, एवं ज्ञाते बहुवचनेन प्रश्नो नोपपद्यते स्वयं जानतः। तस्मात् पूर्वयोः कण्डिकयोः प्रश्नप्रतिवचनेषु कतिभिः कति तिसृभिः तिस्र इति प्रसङ्गं दृष्ट्वेहापि बहुवचनेनैव प्रश्नोपक्रमः क्रियते। अथवा प्रतिवादिव्यामोहार्थं बहुवचनम् | ‘हे याज्ञवल्क्य !’ ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अभिमुख करनेके लिये ] कहा ‘यह ब्रह्मानामक ऋत्विक् दक्षिणकी ओर ब्रह्माके लिये निश्चित आसनपर बैठकर यज्ञकी रक्षा करता है। वह कितने देवताओं-द्वारा उसकी रक्षा करता है?’ यहाँ देवता शब्दमें जो बहुवचन है, वह प्रसङ्गवश है; क्योंकि ब्रह्मा एक ही देवतासे यज्ञकी रक्षा करता है–यह स्वयं जानते हुए व्यक्तिके लिये बहुवचनद्वारा प्रश्न करना उचित नहीं है। अतः पहली दो कण्डिकाओं-के प्रश्न और उत्तरोंमें ‘कतिभिः कति’ और ‘तिसृभिः तिस्रः’ ऐसा प्रसङ्ग देखकर यहाँ भी प्रश्नका आरम्भ बहुवचनसे ही किया जाता है। अथवा यह बहुवचन अपने प्रतिवादीको भ्रममें डालनेके लिये भी हो सकता है। |

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