बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 651, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४१
| लोकसम्बद्धायां हि संयमन्यां पुर्यां वैवस्वतेन यात्यमानानां ‘हा हताः स्म मुञ्च मुञ्च’ इति शब्दो भवति। तथावदानाहुतयः तेन पितृलोकसामान्यात् पितृलोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति ।<br><br>या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयति भूम्युपरि सम्बन्धसामान्यात् । अध इव ह्यध एव हि मनुष्यलोकः उपरितनान् साध्याँल्लोकानपेक्ष्य, अथवाधोगमनमपेक्ष्य । अतो मनुष्यलोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति पयःसोमाहुतिनिर्वर्तनकाले ॥ ८ ॥ | पितृलोकसे सम्बद्ध संयमनीपुरीमें यमराजके द्वारा यातना भोगते हुए जीवोंका ‘हाय मरे ! छोड़ ! छोड़ !’ ऐसा शब्द होता रहता है। इसी प्रकार अवदान-आहुतियाँ भी शब्द करनेवाली हैं। अतः पितृलोकसे समानता होनेके कारण इनसे मेरेद्वारा पितृलोक ही प्राप्त किया जाता है, इस प्रकार यजमान सम्पादन करता है।<br><br>जो आहुतियाँ होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे यजमान मनुष्यलोकपर ही विजय प्राप्त करता है; क्योंकि पृथ्वीके ऊपरी भागसे सम्बद्ध होनेमें उन दोनोंकी समानता है। मनुष्यलोक ऊपरके साधनसाध्य लोकोंकी अपेक्षा अधः—नीचे ही स्थित है। अथवा अधोगमनकी अपेक्षासे वे मनुष्यलोकको ही जीतते हैं। अतः दूध या सोमकी आहुति देते समय यजमान यही सम्पादन करता है कि इससे मेरेद्वारा मनुष्यलोक ही प्राप्त किया जाता है ॥ ८ ॥ |
ब्रह्माके यज्ञरक्षाके साधन और उससे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन
बृ० उ० ४१—