बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 650, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६४० | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| लन्ति समिदाज्याहुतयः या हुता अतिनेदन्तेऽतीव शब्दं कुर्वन्ति मांसाद्याहुतयः, या हुता अधिशेरतेऽध्यधो गत्वा भूमेरधिशेरते पयःसोमाहुतयः ।<br><br>किं ताभिर्जयतीति, ताभिरेवं निर्वर्त्तिताभिराहुतिभिः किं जयतीति । या आहुतयो हुता उज्ज्वलन्त्युज्ज्वलनयुक्ता आहुतयो निर्वर्तिताः, फलं च देवलोकाख्यमुज्ज्वलमेव, तेन सामान्येन या मया ता उज्ज्वलन्त्य आहुतयो निर्वर्त्यमानास्ता एताः साक्षाद्देवलोकस्य कर्मफलस्य रूपं देवलोकाख्यं फलमेव मया निर्वर्त्यत इत्येवं सम्पादयति ।<br><br>या हुता अतिनेदन्ते आहुतयः पितृलोकमेव ताभिर्जयति कुत्सितशब्दकर्तृत्वसामान्येन । पितृ- | प्रज्वलित होती हैं, वे समिध् और घृतकी आहुतियाँ, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, वे आहुतियाँ और जो होम की जानेपर अधिशयन करतीं अर्थात् नीचे पृथ्वीपर जाकर लीन हो जाती हैं, वे दुग्ध और सोमकी आहुतियाँ।’<br><br>‘इनसे यजमान किसको जीतता है ? अर्थात् इस प्रकार सम्पन्न की हुई उन आहुतियोंसे यजमान क्या जीत लेता है !’ [याज्ञवल्क्य–] जो हवन की हुई आहुतियाँ उज्ज्वलित होती हैं अर्थात् उज्ज्वलनयुक्त होती हैं, उनका देवलोकसंज्ञक फल भी उज्ज्वल ही है । इन दोनोंमें यह समानता होनेके कारण यजमान इस प्रकार सम्पादन (भावना) करता है कि मेरेद्वारा जो ये उज्ज्वलित आहुतियाँ दी जा रही हैं, वे साक्षात् इस कर्मके फलस्वरूप देवलोकका रूप हैं, अतः इनके द्वारा मैं देवलोकरूप फलको निष्पन्न कर रहा हूँ ।<br><br>जो आहुतियाँ होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे यजमान पितृलोकको ही जीतता है, क्योंकि कुत्सित शब्द करनेवाले होनेसे इनके साथ उनकी समानता है। |