बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 655, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 655
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| काश्चन ऋचः, ताः सर्वास्तिस्र एवेत्याह । ताश्च व्याख्याताः— पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीयेति । | भी ऋचाएँ हैं, वे सब तीन ही प्रकारकी हैं—यही बात अब बतायी जाती है। उन्हींकी पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या—ऐसा कहकर व्याख्या की गयी है। |
| तत्र पूर्वमुक्तम्—यत्किञ्चेदं प्राणभृत् सर्वं जयतीति तत् केन सामान्येन ? इत्युच्यते—कतमास्तास्तिस्र ऋचो या अध्यात्मं भवन्तीति । प्राण एव पुरोनुवाक्या, पशब्दसामान्यात् । अपानो याज्या, आनन्तर्यात् । अपानेन हि प्रत्तं हविर्देवता ग्रसन्ति, यागश्च प्रदानम् । | यहाँ पहले (मन्त्र ७ में) जो यह कहा गया है कि यह जो कुछ प्राणिवर्ग है, उस सभीको जीत लेता है, सो किस समानताके कारण है—यह कहते हैं अर्थात् 'इनमें जो अध्यात्म (देहान्तर्वर्ती) हैं, वे तीन ऋचाएँ कौन-सी हैं'—इस प्रश्नद्वारा यह बतलाया जाता है—प्राण ही पुरोनुवाक्या है; क्योंकि 'प' शब्दमें इन दोनोंकी समानता है। अपान याज्या है क्योंकि आनन्तर्यमें दोनोंकी समानता है।² इसके सिवा देवगण दी हुई हविको अपानसे ही ग्रहण करते हैं; और प्रदान ही याग है [अतः अपान याज्या ऋचाएँ हैं]। |
| व्यानः शस्या—"अप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति" (छा० उ० १ । ३ । ४) । इति श्रुत्यन्तरात् । | व्यान शस्या है, जैसा कि "प्राण अपान-व्यापार न करता हुआ ऋचाओंका उच्चारण करता है" इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है। |
१. प्रगीत ऋचाओंको स्तोत्र कहते हैं और अप्रगीत ऋचाओंको शस्त्र। इनमें स्तोत्र ही स्तोत्रिया ऋचाएँ हैं और शस्त्र शस्या हैं।
२. कारण जैसे अपान प्राणके अनन्तर है, उसी प्रकार याज्या ऋचाएँ पुरोनुवाक्या ऋचाओंके अनन्तर हैं।