बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 656, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| किं ताभिर्जयतीति व्याख्यातम् । तत्र विशेषसम्बन्धसामान्यमनुक्तमिहोच्यते, सर्वमन्यद् व्याख्यातम् । लोकसम्बन्धसामान्येन पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयति, अन्तरिक्षलोकं याज्यया, मध्यमत्वसामान्यात् । द्युलोकं शस्ययोर्ध्वत्वसामान्यात् । ततो ह तस्मादात्मनः प्रश्ननिर्णयादसौ होता अश्वल उपरराम नायमस्मद्गोचर इति ॥ १० ॥ | ‘किं ताभिर्जयति’ (उनसे किसपर विजय प्राप्त करता है)—इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है। वहाँ जो इनका विशेषसम्बन्धसामान्य नहीं बतलाया गया, वह यहाँ बतलाया जाता है; और सब (संख्यासामान्यादि) की व्याख्या तो कर दी गयी है। लोकसम्बन्धी सामान्य होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही विजय प्राप्त करता है। मध्यमत्वमें समानता होनेके कारण याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर जय प्राप्त करता है तथा ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेसे शस्यासे द्युलोकपर जय प्राप्त करता है। तब उस अपने प्रश्नके निर्णयसे होता अश्वल यह समझकर कि ‘यह याज्ञवल्क्य हमारे काबूका नहीं है’ चुप हो गया ॥ १० ॥ |
<div align="center">इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये प्रथममश्वलब्राह्मणम् ॥ १ ॥
</div>१. लोकोंमें पृथिवीलोक प्रथम है और ऋचाओंमें पुरोनुवाक्या ऋचाएँ प्रथम हैं। इस प्रकार 'प्रथमत्व' रूप सम्बन्धकी दोनोंमें समानता होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकको ही जीतता है।