भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 654
६४४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

स्तवनसम्बन्धिनी ऋचाओंका और उनसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन

याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्यापानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकँ शस्यया ततो ह होताश्वल उपरराम ॥१०॥

'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमें उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' [याज्ञवल्क्य-] 'तीनका' [अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [अश्वल-] इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती हैं, वे कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'प्राण ही पुरोनुवाक्या है; अपान याज्या है और व्यान शस्या है।' [अश्वल-] 'इनसे यजमान किनपर जय प्राप्त करता है?' [याज्ञवल्क्य-] पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर और शस्यासे द्युलोकपर विजय प्राप्त करता है। इसके पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥१०॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत्। कति स्तोत्रियाः स्तोष्यतीत्ययमुद्गाता। स्तोत्रिया नाम ऋक्सामसमुदायः कतिपयानामृचाम्। स्तोत्रिया वा शस्या वा याः'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [अभिमुख करनेके लिये] कहा, 'यह उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' 'स्तोत्रिया' यह कुछ ऋचाओंके ऋक्सामसमुदायका नाम है। स्तोत्रिया हो अथवा शस्या, जो कुछ