भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| ५६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

५६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
मापन्नासि, मर्त्या जन्ममरणाशनायापिपासादिंसंसारधर्मवत्यसि, नामरूपकार्यात्मिका—अमुष्यान्वयाहमिति, स खिल्यभावस्तव कार्यकरणभूतोपाधिसम्पर्कभ्रान्तिजनितो महति भूते स्वयोनौ महासमुद्रस्थानीये परमात्मनि अजरेऽमरेऽभये शुद्धे सैन्धवघनवदेकरसे प्रज्ञानघनेऽनन्तेऽपारे निरन्तरेऽविद्याजनितभ्रान्तिभेदवर्जिते प्रवेशितः ।<br><br>तस्मिन्प्रविष्टे स्वयोनिग्रस्ते खिल्यभावेऽविद्याकृते भेदभावे प्रणाशिते—इदमेकमद्वैतं महद्भूतम् महच्च तद् भूतं च महद्भूतं सर्वमहत्तरत्वादाकाशादिकारणत्वाच्च ।<br><br>भूतं त्रिष्वपि कालेषु स्वरूपाव्यभिचारात्सर्वदैव परिनिष्पन्नमिति त्रैकालिको निष्ठाप्रत्ययः ।<br><br>अथवा भूतशब्दः परमार्थवाची, महच्च पारमार्थिकंमरणधर्मवाली, जन्म, मरण, क्षुधा और पिपासा आदि सांसारिक धर्मोंवाली एवं मैं नामरूपकार्यात्मिका और अमुक वंशमें उत्पन्न हुई हूँ—ऐसे भाववाली हो गयी है। देहेन्द्रियजनित उपाधिके सम्पर्कसे भ्रान्तिके कारण उत्पन्न हुआ तेरा वह खिल्यभाव अपने कारण महासमुद्रस्थानीय अजर, अमर, अभय, शुद्ध, सैन्धवघनके समान एकरस, प्रज्ञानघन, अनन्त, अपार, अखण्ड एवं अविद्याजनित भ्रान्तिमय भेदसे रहित परमात्मामें प्रविष्ट कर दिया गया है।<br><br>उसमें प्रविष्ट होनेपर उस खिल्यभावके अपने कारणद्वारा लीन कर लिये जानेपर अविद्याजनित भेदभावका नाश हो जानेसे यह एक अद्वैत महद्भूत ही रहता है। महान् भूत होनेसे वह महद्भूत कहलाता है; क्योंकि आकाशादिका कारण होनेसे वह सबसे महान् है। तीनों ही कालोंमें उसके स्वरूपका व्यभिचार नहीं होता, वह सर्वदा ही ज्यों-का-त्यों रहता है, इसलिये भूत है। 'भूत' शब्दमें 'त' यह निष्ठाप्रत्यय त्रैकालिक है।<br><br>अथवा 'भूत' शब्द परमार्थवाची है। अर्थात् वह महत् है और

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६९

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६९


संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
चेत्यर्थः; लौकिकं तु यद्यपि महद्भवति, स्वप्नमायाकृतं हिमवदादिपर्वतोपमं न परमार्थवस्तु; अतो विशिनष्टि—इदं तु महच्च तद्भूतं चेति। अनन्तं नास्यान्तो विद्यत इत्यनन्तम्; कदाचिदापेक्षिकं स्यादित्यतो विशिनष्ट्यपारमिति विज्ञप्तिर्विज्ञानम्, विज्ञानं च तद्घनश्चेति विज्ञानघनः, घनशब्दो जात्यन्तरप्रतिषेधार्थः—यथा सुवर्णघनोऽयोघन इति; एवशब्दोऽवधारणार्थः—नान्यज्जात्यन्तरमन्तराले विद्यत इत्यर्थः।पारमार्थिक है; [ इसलिये महद्भूत है ]। यद्यपि हिमालयादि पर्वतोंके समान लौकिक वस्तु भी महान् होती है; किंतु वह स्वप्न या मायाके समान है, परमार्थवस्तु नहीं। इसीसे श्रुति इसे विशेषित करती है कि यह महत् है और भूत भी है। अनन्त अर्थात् इसका अन्त नहीं है, इसलिये अनन्त है। कदाचित् इसकी अनन्तता आपेक्षिक हो, इसलिये ‘अपारम्’ ऐसा विशेषण देती है। विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, जो विज्ञान हो और घन हो उसे विज्ञानघन कहते हैं। यहाँ घनशब्द [विज्ञानमें] अन्य जातिकी वस्तुका निषेध करनेके लिये है; जैसे कि सुवर्णघन, लोहघन आदि। ‘एव’ शब्द निश्चयार्थक है। तात्पर्य यह है कि इसके भीतर कोई दूसरी विजातीय वस्तु नहीं है।
यदीदमेकमद्वैतं परमार्थतः स्वच्छं संसारदुःखासम्पृक्तम्, किन्निमित्तोऽयं खिल्यभाव आत्मनो जातो मृतः सुखी दुःख्यहं ममेत्येवमादिलक्षणोऽनेक संसारधर्मोपद्रुतः ? इत्युच्यते—यदि यह आत्मतत्त्व एक, अद्वैत, परमार्थतः शुद्ध और सांसारिक दुःखोंसे असंस्पृष्ट है तो आत्माका यह खिल्यभाव क्यों है तथा यह मैं उत्पन्न हुआ, मरा, सुखी, दुःखी, अहं, मम इत्यादि लक्षणोंवाले अनेकों सांसारिक धर्मोंसे दूषित क्यों है ? इसपर कहा जाता है—

५७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

५७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतेभ्यो भूतेभ्यो यान्येतानि कार्यकारणविषयाकारपरिणतानि नामरूपात्मकानि सलिलफेनबुद्बुदोपमानि स्वच्छस्य परमात्मनः सलिलोपमस्य, येषां विषयपर्यन्तानां प्रज्ञानघने ब्रह्मणि परमार्थविवेकज्ञानेन प्रविलापनमुक्तं नदीसमुद्रवत्—एतेभ्यो हेतुभूतेभ्यो भूतेभ्यः सत्यशब्दवाच्येभ्यः समुत्थाय सैन्धवखिल्यवत्—यथा अद्भ्यः सूर्यचन्द्रादिप्रतिबिम्बः, यथा वा स्वच्छस्य स्फटिकस्य अलक्तकाद्युपाधिभ्यो रक्तादिभावः, एवं कार्यकारणभूतभूतोपाधिभ्यो विशेषात्मखिल्यभावेन समुत्थाय सम्यगुत्थाय—येभ्यो भूतेभ्य उत्थितः तानि यदा कार्यकारणविषयाकारपरिणतानि भूतान्यात्मनो विशेषात्मखिल्यहेतुभूतानि शास्त्राचार्योपदेशेन ब्रह्मविद्यया नदीसमुद्रवत्प्रविलापितानि विनश्यन्ति, सलिलफेनबुद्बुदादिवत्तेषु विनश्यत्सु अन्वेवैष विशेषात्मखिल्यभावोइन भूतोंसे—ये जो देह और इन्द्रियरूप विषयके आकारमें परिणत जलके फेन और बुद्बुदोंके समान जलस्थानीय स्वच्छ परमात्माके नामरूपमय विकार हैं; जिनके सम्पूर्ण विषयोंतकका, समुद्रमें नदीके समान, पारमार्थिक विवेकज्ञानसे प्रज्ञानघन ब्रह्ममें लय होना बतलाया गया है, इन सबके हेतुभूत सत्य शब्दवाच्य भूतोंसे लवणखण्डके समान उत्पन्न होकर—जिस प्रकार जलसे सूर्य-चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब अथवा जैसे अलक्तक (महावर) आदि उपाधियोंके कारण स्वच्छ स्फटिकका रक्तादि भाव हो जाता है, इसी प्रकार देहेन्द्रियरूप भूतोंकी उपाधियोंके कारण विशेषात्मरूप खिल्यभावसे समुत्थित अर्थात् सम्यक् प्रकारसे उत्पन्न होकर जिन भूतोंसे यह उत्पन्न हुआ है, वे देह और इन्द्रियोंके आकारमें परिणत एवं आत्माके खिल्यभावरूप विशेषत्वके हेतुभूत भूत जिस समय शास्त्र और आचार्यके ब्रह्मविद्याके उपदेशसे समुद्रमें नदीके समान लीन होते हुए नाशको प्राप्त होते हैं, जलमें फेन और बुद्बुदोंके समान उनके नाश होनेके साथ ही यह विशेषात्मरूप खिल्यभाव भी नष्ट हो जाता है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
विनश्यति; यथा उदकालक्तकादिहेत्वपनये सूर्यचन्द्रस्फटिकादिप्रतिबिम्बो विनश्यति, चन्द्रादिस्वरूपमेव परमार्थतो व्यवतिष्ठते, तद्वत्प्रज्ञानघनमनन्तमपारं स्वच्छं व्यवतिष्ठते।जिस प्रकार जल और अलक्तक आदि हेतुओंके हट जानेपर सूर्य, चन्द्र और स्फटिक आदिका प्रतिबिम्ब नष्ट हो जाता है, केवल चन्द्रादिका पारमार्थिक स्वरूप ही रह जाता है उसी प्रकार फिर अनन्त, अपार और स्वच्छ प्रज्ञानघन ही रह जाता है।
न तत्र प्रेत्य विशेषसंज्ञास्ति कार्यकारणसङ्घातेभ्यो विमुक्तस्य—इत्येवमरे मैत्रेयि ब्रवीमि नास्ति विशेषसंज्ञेति—अहमसावमुष्य पुत्रो ममेदं क्षेत्रं धनं सुखी दुःखीत्येवमादिलक्षणा, अविद्याकृतत्वात्तस्याः, अविद्यायाश्च ब्रह्मविद्यया निरन्वयतो नाशितत्वात्कुतो विशेषसंज्ञासम्भवो ब्रह्मविदश्चैतन्यस्वभावावस्थितस्य? शरीरावस्थितस्यापि विशेषसंज्ञा नोपपद्यते किमुत कार्यकारणविमुक्तस्य सर्वतः? इति होवाचोक्तवान्किल परमार्थदर्शनं मैत्रेय्यै भार्यायै याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥फिर प्रेत्य—देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर उसकी विशेष संज्ञा नहीं रहती, इसीसे हे मैत्रेयि! मैं यह कहता हूँ कि उसकी 'मैं अमुक हूँ, अमुकका पुत्र हूँ, यह क्षेत्र और धन मेरा है, मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ' इत्यादि प्रकारकी विशेष संज्ञा नहीं रहती; क्योंकि वह तो अविद्याजनित ही है, और अविद्याका उसके कारणके सहित ब्रह्मविद्यासे नाश हो चुका है, इसलिये चैतन्यस्वरूप ब्रह्मवेत्ताकी विशेषसंज्ञा रहनेकी सम्भावना कहाँ है? उसकी तो शरीरमें रहते हुए भी कोई संज्ञा होनी सम्भव नहीं है, फिर सब प्रकार देह और इन्द्रियोंसे मुक्त होनेपर तो रह ही कैसे सकती है? इस प्रकार याज्ञवल्क्यने अपनी भार्या मैत्रेयीके प्रति परमार्थदृष्टिका निरूपण किया ॥ १२ ॥

५७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान

एवं प्रतिबोधिता—इस प्रकार बोध कराये जानेपर—

सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥

उस मैत्रेयीने कहा, 'शरीरपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती—ऐसा कहकर ही श्रीमान्ने मुझे मोहमें डाल दिया है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ, अरी ! यह तो उस (महद्भूत) का विज्ञान करानेके लिये पर्याप्त है' ॥ १३ ॥

सा ह किलोवाचोक्तवती मैत्रेयी—अत्रैव एतस्मिन्नेव एकस्मिन्वस्तुनि ब्रह्मणि विरुद्धधर्मवत्त्वमाचक्षाणेन भगवता मम मोहः कृतः; तदाह—अत्रैव मा भगवान्पूजावानमूमुहन्मोहं कृतवान्। कथं तेन विरुद्धधर्मवत्त्वम् उक्तमित्युच्यते—पूर्वं विज्ञानघन एवेति प्रतिज्ञाय पुनर्न प्रेत्य संज्ञास्तीति; कथं विज्ञानघन एव ? कथं वा न प्रेत्य संज्ञा-उस मैत्रेयीने कहा, यही—इस एक वस्तु ब्रह्ममें ही विरुद्ध धर्मवत्ताका वर्णन करनेवाले श्रीमान्ने तो मुझे मोह उत्पन्न कर दिया है। इसी बातको श्रुति कहती है—इस (ब्रह्मके) विषयमें ही मुझे आप भगवान्—पूजावान् अर्थात् पूज्य पुरुषने अमूमुहत्—मोह उत्पन्न कर दिया। उन्होंने ब्रह्मकी विरुद्धधर्मवत्ताका किस प्रकार वर्णन किया है—सो बतलाया जाता है—पहले 'वह विज्ञानघन ही है' ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर 'देहपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती' ऐसा कहा है। सो किस प्रकार वह विज्ञानघन ही है और किस प्रकार देहपातके अनन्तर उसकी कोई संज्ञा नहीं रहती ? एक

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७३


संस्कृत-मूल / भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स्त्वतीति ? न ह्युष्णः शीतश्चाग्नि-रेवैको भवति। अतो मूढास्म्यत्र।ही अग्नि उष्ण और शीतल दोनों प्रकारका नहीं हो सकता; अतः इस विषयमें मुझे मोह (भ्रम) हो गया है।
स होवाच याज्ञवल्क्यः—न वा अरे मैत्रेयहं मोहं ब्रवीमि—मोहनं वाक्यं न ब्रवीमीत्यर्थः। ननु कथं विरुद्धधर्मत्वमवोचः—विज्ञानघनं संज्ञाभावं च ? न मयेदमेकस्मिन्धर्मिण्यभिहितम्, त्वयैवेदं विरुद्धधर्मत्वेनैकं वस्तु परिगृहीतं भ्रान्त्या, न तु मयोक्तम्। मया त्विदमुक्तम्—यस्त्वविद्याप्रत्युपस्थापितः कार्यकारणसम्बन्धी आत्मनः खिल्यभावः, तस्मिन्विद्यया नाशिते, तन्निमित्ता या विशेषसंज्ञा शरीरादिसम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनलक्षणा, सा कार्यकारणसङ्घातोपाधौ प्रविलापिते नश्यति हेत्वभावाद् उदकाधारनाशादिव चन्द्रादिप्रतिबिम्ब-उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ अर्थात् मोह उत्पन्न करनेवाली बात नहीं कह रहा हूँ।' [मैत्रेयी बोली] तो फिर 'वह विज्ञानघन है और उसकी कोई संज्ञा नहीं है, ये आपने उसके दो विरुद्ध धर्म क्यों बतलाये ? [याज्ञवल्क्यने कहा—] मैंने ये धर्म एक ही धर्मीमें नहीं बतलाये हैं; भ्रान्तिसे तूने ही एक वस्तुको विरुद्ध धर्मवाली समझ लिया है, मैंने ऐसा नहीं कहा। मैंने तो ऐसा कहा था कि आत्माका जो अविद्याद्वारा प्रस्तुत किया हुआ देहेन्द्रियसम्बन्धी खिल्यभाव है, उसका विद्याद्वारा नाश कर दिये जानेपर उस खिल्यभावके कारण पड़ी हुई जो शरीरादिसम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनरूपा विशेष संज्ञा होती है, वह कार्यकारणसंघातरूप उपाधिके लीन कर देनेपर कोई हेतु न रहनेके कारण इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार जलादि आधारका नाश हो जानेपर चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब और

| ५७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |

| ५७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ | | :--- | :--- |

| स्तन्निमित्तश्च प्रकाशादिः, न पुनः परमार्थचन्द्रादित्यस्वरूपानाशवदसंसारिब्रह्मस्वरूपस्य विज्ञानघनस्य नाशः; तद्विज्ञानघन इत्युक्तम्; स आत्मा सर्वस्य जगतः, परमार्थतो भूतनाशान्न विनाशी। विनाशी त्वविद्याकृतः खिल्यभावः, "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुत्यन्तरात्। अयं तु पारमार्थिकः—अविनाशी वा अरेऽयमात्मा, अतोऽलं पर्याप्तं वै अरे इदं महद्भूतमनन्तमपारं यथाव्याख्यातं विज्ञानाय विज्ञातुम्। "न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्" (४।३।३०) इति हि वक्ष्यति ॥ १३ ॥ | उससे होनेवाले प्रकाशादिका नाश हो जाता है। किंतु जिस प्रकार वास्तविक चन्द्रमा और सूर्यादिके स्वरूपका नाश नहीं होता, उसी प्रकार असंसारी ब्रह्मके स्वरूप विज्ञानघनका भी नाश नहीं होता; उसीको विज्ञानघन—इस नामसे कहा गया है; वह सम्पूर्ण जगत्‌का आत्मा है और भूतोंका नाश होनेपर भी परमार्थतः उसका नाश नहीं होता। विनाशी तो अविद्याजनित खिल्यभाव ही है, जैसा कि "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। किंतु यह तो पारमार्थिक है और हे मैत्रेयि ! यह आत्मा तो अविनाशी है; अतः जिस प्रकार इसकी व्याख्या की गयी है, उसी प्रकार यह अनन्त और अपार महद्भूत जाना जा सकता है। "विज्ञाताके विज्ञानका विशेषरूपसे लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है" ऐसा श्रुति आगे कहेगी भी ॥ १३ ॥ |

व्यवहार द्वैतमें है, परमार्थ व्यवहारातीत है

| कथं तर्हि प्रेत्य संज्ञा नास्ति ?<br><br>इत्युच्यते, शृणु— | शरीरपातके अनन्तर उसकी संज्ञा किस प्रकार नहीं रहती ? सो बतलाया जाता है, सुनो— |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७५


यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरँ शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कँ शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कं मन्वीत तत्केन कं विजानीयात् । येनेदँ सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥

जहाँ (अविद्यावस्थामें) द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यका मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है। किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है वहाँ किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने ? हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? ॥ १४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यत्र यस्मिन्नविद्याकल्पिते कार्यकरणसङ्घातोपाधिजनिते विशेषात्मनि खिल्यभावे हि यस्मात्, द्वैतमिव--परमार्थतोऽद्वैते ब्रह्मणि द्वैतमिव भिन्नमिव वस्त्वन्तरमात्मनः--उपलक्ष्यते ।<br><br>ननु द्वैतेनोपमीयमानत्वाद् द्वैतस्य पारमार्थिकत्वमिति; न, "वाचा-हि—क्योंकि जहाँ जिस अविद्याकल्पित देहेन्द्रियसङ्घातरूप उपाधिसे उत्पन्न हुए विशेषात्मरूप खिल्यभावमें द्वैत-सा अर्थात् परमार्थतः अद्वैत ब्रह्ममें द्वैत-सा भिन्न-सा अर्थात् आत्मासे भिन्न पदार्थ-सा प्रतीत होता है—[शङ्का—] किन्तु द्वैतसे उपमा दिये जानेके कारण तो द्वैतकी पारमार्थिकता सिद्ध होती है। [समाधान—] नहीं, क्योंकि "विकार

५७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

५७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

| रम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) इति श्रुत्यन्तरात्, “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । १) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इति च। तत्तत्र यस्माद् द्वैतमिव तस्मादेवेतरोऽसौ परमात्मनः खिल्यभूत आत्मापरमार्थः, चन्द्रादेरिवोदकचन्द्रादिप्रतिबिम्बः, इतरो घ्रातेतरेण घ्राणेनेतरं घ्रातव्यं जिघ्रति;<br><br>इतर इतरमिति कारकप्रदर्शनार्थम्, जिघ्रतीति क्रियाफलयोरभिधानम्, यथा छिनत्तीति—यथोद्यम्योद्यम्य निपातनम्; छेद्यस्य च द्वैधीभावः, उभयं छिनत्तीत्येकेनैव शब्देन अभिधीयते—क्रियावसानत्वात्क्रियाव्यतिरेकेण च तत्फलस्यानुपलम्भात्; इतरो घ्राता इतरेण घ्राणेनेतरं घ्रातव्यं | वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है” ऐसी एक अन्य श्रुति है, तथा “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है” “यह सब आत्मा ही है” ऐसी भी श्रुति है। अतः वहाँ चूँकि द्वैत-सा रहता है, इसलिये ही परमात्माका खिल्यरूप वह अपारमार्थिक आत्मा उससे अन्य अर्थात् चन्द्रादिके जलमें पड़े हुए चन्द्रादि प्रतिबिम्बके समान भिन्न है अर्थात् परमात्मासे इतर सूँघनेवाला अन्य घ्राणेन्द्रियसे इतर सूँघनेयोग्य पदार्थोंको सूँघता है।<br><br>यहाँ जो 'इतरः इतरम्' ऐसा कहा गया है वह [कर्ता और कर्म] कारकोंको प्रदर्शित करनेके लिये है और 'जिघ्रति' यह क्रिया और फलको बतलानेके लिये है, जिस प्रकार 'छिनत्ति'—छेदन करता है। जैसे कुल्हाड़ी उठा-उठाकर मारना और छेद्य वस्तुके दो खण्ड हो जाना—ये दोनों ही 'छिनत्ति' इस एक ही शब्दसे कहे जाते हैं, क्योंकि उसीमें क्रियाकी समाप्ति होती है और क्रियाके बिना उस फलकी उपलब्धि भी नहीं होती। अतः [परमात्मासे] भिन्न सूँघनेवाला अपनेसे भिन्न घ्राणेन्द्रियके द्वारा उससे भिन्न घ्रातव्य पदार्थको |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५७७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५७७

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
जिघ्रति—तथा सर्वं पूर्ववद्विजानाति; इयमविद्यावदवस्था।सूँघता है। इसी प्रकार आगेके पर्यायोंमें समझना चाहिये। पहलेहीके समान वह सबको विशेषरूपसे जानता है; यह उसकी अविद्यावान् (अज्ञानी) की अवस्था है।
यत्र तु ब्रह्मविद्ययाविद्या नाशमुपगमिता तत्र आत्मव्यतिरेकेणान्यस्याभावः; यत्र वै अस्य ब्रह्मविदः सर्वं नामरूपाद्यात्मन्येव प्रविलापितमात्मैव संवृत्तम्, यत्र एवमात्मैवाभूत्तत्तत्र केन करणेन कं घ्रातव्यं को जिघ्रेत् ? तथा पश्येद्विजानीयात् ? सर्वत्र हि कारकसाध्या क्रिया, अतः कारकाभावेऽनुपपत्तिः क्रियायाः; क्रियाभावे च फलाभावः। तस्माद् अविद्यायामेव सत्यां क्रियाकारकफलव्यवहारः, न ब्रह्मविदः—आत्मत्वादेव सर्वस्य, नात्मव्यतिरेकेण कारकं क्रियाफलंकिंतु जहां ब्रह्मविद्याके द्वारा अविद्या नाशको प्राप्त हो गयी है, वहाँ आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुका अभाव हो जाता है। और जहाँ इस ब्रह्मवेत्ताके सम्पूर्ण नाम-रूपादि आत्माहीमें लीन किये जाकर आत्मा ही हो गये हैं, इस प्रकार जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया है, वहाँ किस इन्द्रियके द्वारा किस सूँघनेयोग्य पदार्थको कौन सूँघे ? तथा कौन देखे, कौन जाने ? क्योंकि सभी जगह क्रिया तो कारकसाध्य ही होती है, अतः कारकका अभाव हो जानेपर क्रिया सम्भव नहीं रहती तथा क्रिया न रहनेपर फल नहीं रहता। अतः अविद्याके रहते हुए ही क्रिया, कारक और फलका व्यवहार रहता है, ब्रह्मवेत्ताका ऐसा कोई व्यवहार नहीं रहता; क्योंकि वह तो सबका आत्मा ही है; उसकी दृष्टिमें आत्मासे भिन्न कारक, क्रिया अथवा फल है ही नहीं; और न

बृ० उ० ३७—

| ५७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |

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संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वास्ति; न चानात्मा सन्त्सर्वमात्मैव भवति कस्यचित्; तस्मादविद्ययैव अनात्मत्वं परिकल्पितम्; न तु परमार्थत आत्मव्यतिरेकेणास्ति किञ्चित् । तस्मात्परमार्थैकत्वप्रत्यये क्रियाकारकफलप्रत्ययानुपपत्तिः। अतो विरोधाद्ब्रह्मविदः क्रियाणां तत्साधनानां चात्यन्तमेव निवृत्तिः । केन कमिति क्षेपार्थं वचनं प्रकारान्तरानुपपत्तिदर्शनार्थम्, केनचिदपि प्रकारेण क्रियाकरणादिकारकानुपपत्तेः । केनचित् कश्चित् कञ्चित् कथञ्चिन्न जिघ्रेदेवेत्यर्थः ।किसीके लिये अनात्मा रहते हुए सब कुछ आत्मा हो ही सकता है; अतः अनात्मत्व तो अविद्यासे ही कल्पित है, वास्तवमें तो आत्मासे भिन्न कोई वस्तु है ही नहीं। अतः पारमार्थिक आत्मैकत्वका ज्ञान होनेपर क्रिया, कारक और फलकी प्रतीति होनी सम्भव नहीं है। इसलिये [ ज्ञानदृष्टिसे ] विरोध होनेके कारण ब्रह्मवेत्ताके लिये क्रिया और उनके साधनोंकी तो सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। 'केन कम्' ऐसा जो आक्षेपार्थक वचन है, वह प्रकारान्तरकी अनुपपत्ति प्रदर्शित करनेके लिये है; क्योंकि किसी भी प्रकारसे [ ब्रह्मवेत्ताके लिये ] क्रिया और करणादि कारकोंकी उपपत्ति नहीं हो सकती। तात्पर्य यह है कि कोई भी किसीके द्वारा किसी प्रकार कुछ भी नहीं सूंघ सकता !
यत्रापि अविद्यावस्थायामन्योऽन्यं पश्यति, तत्रापि येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्येन विजानाति तस्य करणस्य विज्ञेये विनियुक्तत्वात्, ज्ञातुश्च ज्ञेय एव हि जिज्ञासा नात्मनि । नइसके सिवा अविद्यावस्थामें भी जहाँ अन्य अन्यको देखता है, वहाँ भी जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने, क्योंकि जिसके द्वारा वह जानता है वह इन्द्रिय तो उसके विज्ञेयवर्गमें आ जाती है और ज्ञाताकी जिज्ञासा भी ज्ञेयमें ही होती है, अपनेमें नहीं

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७९

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७९


| चाग्नेरिव आत्मा आत्मनो विषयः, न चाविषये ज्ञातुर्ज्ञानमुपपद्यते। तस्माद् येनेदं सर्वं विजानाति तं विज्ञातारं केन करणेन को वान्यो विजानीयात्। <br><br> यदा तु पुनः परमार्थविवेकिनो ब्रह्मविदो विज्ञातैव केवलोऽद्वयो वर्तते तं विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥ | होती [तथा अग्नि जैसे अपनेहीको नहीं जलाता,] उसी प्रकार आत्मा अपना ही विषय नहीं हो सकता। और जो विषय नहीं है, उसका ज्ञाताको ज्ञान नहीं हो सकता। अतः जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उस विज्ञाताको कोई अन्य अनात्मा किस करणके द्वारा जान सकता है। किंतु जिस अवस्थामें परमार्थका विवेक रखनेवाले ब्रह्मवेत्ताके लिये केवल अद्वितीय विज्ञाता ही विद्यमान रहता है, उस समय हे मैत्रेयि! उस विज्ञाताको वह किसके द्वारा जानेगा ? ॥ १४ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये चतुर्थं मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ४ ॥


पञ्चम ब्राह्मण

| उपक्रमः<br>यत्केवलं कर्मनिरपेक्षममृतत्वसाधनं तद्वक्तव्यमिति मैत्रेयीब्राह्मणमारब्धम्, तच्चात्मज्ञानं सर्वसंन्यासाङ्गविशिष्टम्। आत्मनि च विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति, आत्मा च प्रियः सर्वस्मात्; | जो कर्मकी अपेक्षासे रहित अकेला ही अमृतत्वका साधन है, उसका वर्णन करना था, इसीसे मैत्रेयी-ब्राह्मण आरम्भ किया गया था और वह सर्वसंन्यासरूप अङ्गसे युक्त आत्मज्ञान ही है। आत्माका ज्ञान होनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है और आत्मा सबसे अधिक प्रिय है |

५८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| तस्मादात्मा द्रष्टव्यः । स च श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य इति च दर्शनप्रकारा उक्ताः । | इसलिये आत्माका साक्षात्कार करना चाहिये। तथा उसीका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिये—ये उसके साक्षात्कारके प्रकार बतलाये गये हैं। | | तत्र श्रोतव्य आचार्यागमाभ्याम्, मन्तव्यस्तर्कतः । तत्र च तर्क उक्तः ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ इति प्रतिज्ञातस्य हेतुवचनमात्मैकसामान्यत्वम् आत्मैकोद्भवत्वम् आत्मैकप्रलयत्वं च । | इनमें आत्माका श्रवण तो आचार्य और शास्त्रके द्वारा करना चाहिये और मनन तर्कसे करना चाहिये। इसमें तर्क यह बतलाया है कि जहाँ 'यह सब आत्मा ही है' ऐसी प्रतिज्ञा की है, उसमें एकमात्र आत्माका ही सबमें सामान्यरूपसे विद्यमान रहना, एक आत्मासे ही सबका उत्पन्न होना और एक आत्मामें ही सबका लीन होना—ये उसके हेतु बतलाये गये हैं। | | तत्रायं हेतुरसिद्ध इत्याशङ्क्यत आत्मैकसामान्योद्भवप्रलयाख्यः । तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमेतद्ब्राह्मणमारभ्यते । | यहाँ यह शङ्का की जाती है कि यह जो एक आत्माका ही सबमें समानरूपसे रहना, उसीसे सबका उत्पन्न होना एवं उसीमें लय होनारूप हेतु है, वह असिद्ध है। इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। | | यस्मात्परस्परोपकार्योपकारकभूतं जगत्सर्वं पृथिव्यादि; यच्च लोके परस्परोपकार्योपकारकभूतं तदेककारणपूर्वकम् एकसामा- | क्योंकि यह पृथिवी आदि सारा जगत् परस्पर उपकार्य और उपकारकरूप हैं तथा लोकमें जो भी पदार्थ परस्पर उपकार्य-उपकारक-रूप होते हैं, वे एक कारणपूर्वक, |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८१

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८१


न्यात्मकम् एकप्रलयं च दृष्टम् । तस्मादिदमपि पृथिव्यादिलक्षणं जगत्परस्परोपकार्योपकारकत्वात्तथाभूतं भवितुमर्हति । एष ह्यर्थोऽस्मिन्ब्राह्मणे प्रकाश्यते ।एक सामान्यरूप और एक प्रलयस्थानवाले देखे गये हैं; इसलिये यह पृथिवी आदिरूप जगत् भी परस्पर उपकार्य-उपकारकरूप होनेके कारण वैसा ही होना चाहिये । यही विषय इस ब्राह्मणमें प्रकाशित किया जाता है ।
अथवा 'आत्मैवेदं सर्वम्' इति प्रतिज्ञातस्य आत्मोत्पत्तिस्थितिलयत्वं हेतुमुक्त्वा पुनरागमप्रधानेन मधुब्राह्मणेन प्रतिज्ञातस्यार्थस्य निगमनं क्रियते । तथा हि नैयायिकैरुक्तम्—“हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्” इति ।अथवा 'यह सब आत्मा ही है' ऐसी जो प्रतिज्ञा की थी, उसमें आत्मासे उत्पत्ति तथा उसीमें स्थिति और लय होनारूप हेतु बतलाकर अब इस शास्त्रप्रधान मधुब्राह्मणद्वारा प्रतिज्ञा किये हुए उसी अर्थका पुनः निगमन किया जाता है । ऐसा ही नैयायिकोंने कहा है कि “हेतुका प्रतिपादन करके प्रतिज्ञाको पुनः कहना निगमन कहलाता है।”
अन्यैर्व्याख्यातम्—आ दुन्दुभिदृष्टान्ताच्छ्रोतव्यार्थमागमवचनम्, प्राङ्मधुब्राह्मणान्मन्तव्यार्थमुपपत्ति-[भर्तृप्रपञ्चादि] अन्य भाष्यकारोंने ऐसी व्याख्या की है कि¹ दुन्दुभिके दृष्टान्त [ से पहले ] तक जो शास्त्रवचन है, वह 'श्रोतव्यः'² इस विधिवाक्यमें कहे हुए श्रवणका निरूपण करनेके लिये है, फिर³ मधुब्राह्मणके पहलेतक जो शास्त्रवचन है, वह युक्ति दिखलाते हुए 'मन्तव्यः' इस वाक्यमें आये हुए मनन-

१. 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादिसे आरम्भ कर ।
२. आत्माका श्रवण करना चाहिये ।
३. दुन्दुभि-दृष्टान्तसे लेकर ।

५८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| प्रदर्शनेन, मधुब्राह्मणेन तु निदिध्यासनविधिरुच्यत इति ।<br><br>सर्वथापि तु यथा आगमेनावधारितं तर्कतस्तथैव मन्तव्यम् । यथा तर्कतो मतं तस्य तर्कागमाभ्यां निश्चितस्य तथैव निदिध्यासनं क्रियत इति पृथङ्निदिध्यासनविधिरनर्थक एव। तस्मात् पृथक्प्रकरणविभागोऽनर्थक इत्यस्मदभिप्रायः श्रवणमनननिदिध्यासनानामिति । सर्वथापि तु अध्यायद्वयस्यार्थोऽस्मिन्ब्राह्मणे उपसंह्रियते । | का निरूपण करनेके लिये है और मधुब्राह्मणके द्वारा निदिध्यासनकी विधि बतलायी जाती है ।<br><br>किंतु [ कुछ भी अर्थ किया जाय ] सभी प्रकार जैसा शास्त्रने निश्चय किया हो, वैसा ही तर्कद्वारा मनन करना चाहिये और जैसा तर्कसे मनन किया गया है उस तर्क और शास्त्रसे निश्चित किये हुए अर्थका उसी प्रकार निदिध्यासन किया जाता है, इसलिये निदिध्यासनके लिये पृथक् विधि करना निरर्थक ही है । अतः हमारा यह अभिप्राय है कि श्रवण, मनन और निदिध्यासनके प्रकरणोंका पृथक् विभाग करना व्यर्थ है । सभी तरहसे इस ब्राह्मणमें पूर्ववर्ती दोनों अध्यायोंके अर्थका उपसंहार किया जाता है । |

पृथिवी आदिमें मधुदृष्टि तथा उनके अन्तर्वर्ती पुरुषके साथ शारीर पुरुषकी अभिन्नता

इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १ ॥

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५८३

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५८३


यह पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है और सब भूत इस पृथिवीके मधु हैं। इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-शारीर तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १॥

| इयं पृथिवी प्रसिद्धा सर्वेषां भूतानां मधु, सर्वेषां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानां प्राणिनाम्, मधु कार्यम्, मध्विव मधु । यथैको मध्वपूपोऽनेकैर्मधुकरैर्निर्वर्तित एवमियं पृथिवी सर्वभूतनिर्वर्तिता । तथा सर्वाणि भूतानि पृथिव्यै पृथिव्या अस्या मधु कार्यम् ।<br><br>किं च यश्चायं पुरुषोऽस्यां पृथिव्यां तेजोमयश्चिन्मात्रप्रकाशमयोऽमृतमयोऽमरणधर्मा पुरुषः, यश्चायमध्यात्मं शारीरः शरीरे भवः पूर्ववत्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः, स च लिङ्गाभिमानी, स च सर्वेषां भूतानामुपकारकत्वेन मधु, सर्वाणि च भूतान्यस्य मधु—चशब्दसामर्थ्यात् । एवमेतच्चतुष्टयं तावदेकं सर्वभूतकार्यम्, | यह प्रसिद्ध पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है; अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूतों-प्राणियोंका मधु—कार्य है। यह मधुके समान मधु है; जिस प्रकार एक मधुका छत्ता अनेकों मधुकरोंद्वारा तैयार किया हुआ होता है, उसी प्रकार यह पृथिवी समस्त भूतोंद्वारा तैयार की गयी है तथा समस्त भूत इस पृथिवीके मधु-कार्य हैं।<br><br>इसके सिवा इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय—चिन्मात्रप्रकाशमय और अमृतमय—अमरणधर्मा पुरुष है और जो यह अध्यात्म शारीर-शरीरमें रहनेवाला पहलेहीके समान तेजोमय और अमृतमय पुरुष है तथा लिङ्ग-देहका अभिमानी है वह भी समस्त भूतोंका उपकारक होनेसे मधु है और समस्त भूत उसके मधु हैं—यह बात [ 'यश्चायमस्याम्' इस वाक्यके ] च शब्दके सामर्थ्यसे जानी जाती है। इस प्रकार ये चारों ही एक मधु अर्थात् समस्त भूतोंके कार्य |


१. पृथिवी, समस्त भूत, पार्थिव पुरुष और शारीर पुरुष।

५८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


| सर्वाणि च भूतान्यस्य कार्यम्; अतोऽस्य एककारणपूर्वकता। यस्मादेकस्मात्कारणादेतज्जातं तदेवैकं परमार्थतो ब्रह्म, इतरत्कार्यं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमात्रमित्येष मधुपर्यायाणां सर्वेषामर्थः सङ्क्षेपतः। <br><br> अयमेव स योऽयं प्रतिज्ञातः "इदं सर्वं यदयमात्मा" (२। ४। ६) इति इदममृतम्; यन्मैत्रेय्या अमृतत्वसाधनमुक्तम्, आत्मविज्ञानमिदं तदमृतम्। इदं ब्रह्म, यत् 'ब्रह्म ते ब्रवाणि, ज्ञपयिष्यामि' इत्यध्यायादौ प्रकृतं यद्विषया च विद्या ब्रह्मविद्येत्युच्यते। इदं सर्वं यस्माद्ब्रह्मणो विज्ञानात्सर्वं भवति ॥ १ ॥ | हैं और समस्त भूत इन चारोंके कार्य हैं; अतः इस जगत्‌की एक कारणपूर्वकता है। जिस एक कारणसे यह उत्पन्न हुआ वही एक तत्त्व परमार्थतः ब्रह्म है, उससे भिन्न उसका कार्य वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार नाममात्र है-इस प्रकार मधुके पर्यायोंका यह संक्षेपतः अर्थ है। <br><br> यही वह है जिसके विषयमें यह प्रतिज्ञा की गयी है कि "यह जो कुछ है सब आत्मा है।" यह अमृत है। मैत्रेयीको जो अमृतत्वका साधन बतलाया गया था वह यह आत्म-विज्ञान अमृत है। यह ब्रह्म है, जिसका 'मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूँगा; ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा' इस प्रकार इस अध्यायके आरम्भमें प्रकरण है तथा जिससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ब्रह्मविद्या इस नामसे कही जाती है। यह सर्व है, क्योंकि ब्रह्मका ज्ञान होनेसे सर्वरूप हो जाता है ॥ १ ॥ |


इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपा ँ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८५

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८५


यश्चायमध्यात्मꣳ रैतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ २ ॥

ये जल समस्त भूतोंके मधु हैं और समस्त भूत इन जलोंके मधु हैं। इन जलोंमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म रैतस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ २ ॥

| तथा आपः। अध्यात्मं रैतस्यपां विशेषतोऽवस्थानम् ॥ २ ॥ | इसी प्रकार जल मधु है। अध्यात्म (शरीरके अन्तर्गत) रेतस् में जलकी विशेषरूपसे स्थिति है ॥ २ ॥ |


अयर्माग्नः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो- ऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ ३ ॥

यह अग्नि समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस अग्निके मधु हैं। इस अग्निमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म वाङ्मय तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ३ ॥

| तथा अग्निः। वाचि अग्नेर्वि-शेषतोऽवस्थानम् ॥ ३ ॥ | इसी प्रकार अग्नि मधु है। वाणीमें अग्निकी विशेषरूपसे स्थिति है ॥ ३ ॥ |


अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो

५८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

५८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ४ ॥

यह वायु समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस वायुके मधु हैं। इस वायुमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-प्राणरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ४ ॥

| तथा वायुः । अध्यात्मं प्राणः। भूतानां शरीरारम्भकत्वेनोपकारान्मधुत्वम् । तदन्तर्गतानां तेजोमयादीनां करणत्वेनोपकारान्मधुत्वम् । तथा चोक्तम् "तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निः" (१।५।११) इति ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार वायु मधु है। अध्यात्ममधु प्राण है। प्राणियोंके शरीरोंके आरम्भकरूपसे उनका उपकारक होनेके कारण यह मधु है । उसके अन्तर्गत जो तेजोमयादि हैं, उनका मधुत्व उसके करणरूपसे उपकारक होनेके कारण है। ऐसा ही कहा भी है—"उस वाणीका पृथिवी शरीर है और यह अग्नि तेजोरूप है" ॥ ४ ॥ |


अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ५ ॥

यह आदित्य समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आदित्यके मधु हैं। यह जो इस आदित्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म चाक्षुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७


आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ५ ॥

तथा आदित्यो मधु । चाक्षुषोऽध्यात्मम् ॥ ५ ॥इसी प्रकार आदित्य मधु है । चाक्षुष पुरुष अध्यात्ममधु है ॥ ५ ॥

इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासामं दिशाँ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ६ ॥

ये दिशाएँ समस्त भूतोंका मधु हैं तथा समस्त भूत इन दिशाओंके मधु हैं । यह जो इन दिशाओंमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ६ ॥

तथा दिशो मधु । दिशां यद्यपि श्रोत्रमध्यात्मम्, शब्दप्रति- <br><br> श्रवणवेलायां तु विशेषतः संनि- <br><br> हितो भवतीत्यध्यात्मं प्रातिश्रुत्कः- <br><br> प्रतिश्रुत्कायां प्रतिश्रवणवेलायां <br><br> भवः प्रातिश्रुत्कः ॥ ६ ॥इसी प्रकार दिशाएँ मधु हैं । यद्यपि श्रोत्र दिशाओंका अध्यात्म परिणाम है तो भी शब्दश्रवणके समय श्रोत्रपुरुष विशेषतः श्रोत्रोंके समीप रहता है, इसलिये वह अध्यात्म प्रातिश्रुत्क है । जो प्रतिश्रुत्कमें अर्थात् प्रत्येक श्रवणवेलामें रहता है, उसे प्रातिश्रुत्क कहते हैं ॥ ६ ॥