भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 585

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५७७

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
जिघ्रति—तथा सर्वं पूर्ववद्विजानाति; इयमविद्यावदवस्था।सूँघता है। इसी प्रकार आगेके पर्यायोंमें समझना चाहिये। पहलेहीके समान वह सबको विशेषरूपसे जानता है; यह उसकी अविद्यावान् (अज्ञानी) की अवस्था है।
यत्र तु ब्रह्मविद्ययाविद्या नाशमुपगमिता तत्र आत्मव्यतिरेकेणान्यस्याभावः; यत्र वै अस्य ब्रह्मविदः सर्वं नामरूपाद्यात्मन्येव प्रविलापितमात्मैव संवृत्तम्, यत्र एवमात्मैवाभूत्तत्तत्र केन करणेन कं घ्रातव्यं को जिघ्रेत् ? तथा पश्येद्विजानीयात् ? सर्वत्र हि कारकसाध्या क्रिया, अतः कारकाभावेऽनुपपत्तिः क्रियायाः; क्रियाभावे च फलाभावः। तस्माद् अविद्यायामेव सत्यां क्रियाकारकफलव्यवहारः, न ब्रह्मविदः—आत्मत्वादेव सर्वस्य, नात्मव्यतिरेकेण कारकं क्रियाफलंकिंतु जहां ब्रह्मविद्याके द्वारा अविद्या नाशको प्राप्त हो गयी है, वहाँ आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुका अभाव हो जाता है। और जहाँ इस ब्रह्मवेत्ताके सम्पूर्ण नाम-रूपादि आत्माहीमें लीन किये जाकर आत्मा ही हो गये हैं, इस प्रकार जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया है, वहाँ किस इन्द्रियके द्वारा किस सूँघनेयोग्य पदार्थको कौन सूँघे ? तथा कौन देखे, कौन जाने ? क्योंकि सभी जगह क्रिया तो कारकसाध्य ही होती है, अतः कारकका अभाव हो जानेपर क्रिया सम्भव नहीं रहती तथा क्रिया न रहनेपर फल नहीं रहता। अतः अविद्याके रहते हुए ही क्रिया, कारक और फलका व्यवहार रहता है, ब्रह्मवेत्ताका ऐसा कोई व्यवहार नहीं रहता; क्योंकि वह तो सबका आत्मा ही है; उसकी दृष्टिमें आत्मासे भिन्न कारक, क्रिया अथवा फल है ही नहीं; और न

बृ० उ० ३७—