बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें५७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
| रम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) इति श्रुत्यन्तरात्, “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । १) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इति च। तत्तत्र यस्माद् द्वैतमिव तस्मादेवेतरोऽसौ परमात्मनः खिल्यभूत आत्मापरमार्थः, चन्द्रादेरिवोदकचन्द्रादिप्रतिबिम्बः, इतरो घ्रातेतरेण घ्राणेनेतरं घ्रातव्यं जिघ्रति;<br><br>इतर इतरमिति कारकप्रदर्शनार्थम्, जिघ्रतीति क्रियाफलयोरभिधानम्, यथा छिनत्तीति—यथोद्यम्योद्यम्य निपातनम्; छेद्यस्य च द्वैधीभावः, उभयं छिनत्तीत्येकेनैव शब्देन अभिधीयते—क्रियावसानत्वात्क्रियाव्यतिरेकेण च तत्फलस्यानुपलम्भात्; इतरो घ्राता इतरेण घ्राणेनेतरं घ्रातव्यं | वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है” ऐसी एक अन्य श्रुति है, तथा “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है” “यह सब आत्मा ही है” ऐसी भी श्रुति है। अतः वहाँ चूँकि द्वैत-सा रहता है, इसलिये ही परमात्माका खिल्यरूप वह अपारमार्थिक आत्मा उससे अन्य अर्थात् चन्द्रादिके जलमें पड़े हुए चन्द्रादि प्रतिबिम्बके समान भिन्न है अर्थात् परमात्मासे इतर सूँघनेवाला अन्य घ्राणेन्द्रियसे इतर सूँघनेयोग्य पदार्थोंको सूँघता है।<br><br>यहाँ जो 'इतरः इतरम्' ऐसा कहा गया है वह [कर्ता और कर्म] कारकोंको प्रदर्शित करनेके लिये है और 'जिघ्रति' यह क्रिया और फलको बतलानेके लिये है, जिस प्रकार 'छिनत्ति'—छेदन करता है। जैसे कुल्हाड़ी उठा-उठाकर मारना और छेद्य वस्तुके दो खण्ड हो जाना—ये दोनों ही 'छिनत्ति' इस एक ही शब्दसे कहे जाते हैं, क्योंकि उसीमें क्रियाकी समाप्ति होती है और क्रियाके बिना उस फलकी उपलब्धि भी नहीं होती। अतः [परमात्मासे] भिन्न सूँघनेवाला अपनेसे भिन्न घ्राणेन्द्रियके द्वारा उससे भिन्न घ्रातव्य पदार्थको |