भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 591, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 591

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५८३


यह पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है और सब भूत इस पृथिवीके मधु हैं। इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-शारीर तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १॥

| इयं पृथिवी प्रसिद्धा सर्वेषां भूतानां मधु, सर्वेषां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानां प्राणिनाम्, मधु कार्यम्, मध्विव मधु । यथैको मध्वपूपोऽनेकैर्मधुकरैर्निर्वर्तित एवमियं पृथिवी सर्वभूतनिर्वर्तिता । तथा सर्वाणि भूतानि पृथिव्यै पृथिव्या अस्या मधु कार्यम् ।<br><br>किं च यश्चायं पुरुषोऽस्यां पृथिव्यां तेजोमयश्चिन्मात्रप्रकाशमयोऽमृतमयोऽमरणधर्मा पुरुषः, यश्चायमध्यात्मं शारीरः शरीरे भवः पूर्ववत्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः, स च लिङ्गाभिमानी, स च सर्वेषां भूतानामुपकारकत्वेन मधु, सर्वाणि च भूतान्यस्य मधु—चशब्दसामर्थ्यात् । एवमेतच्चतुष्टयं तावदेकं सर्वभूतकार्यम्, | यह प्रसिद्ध पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है; अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूतों-प्राणियोंका मधु—कार्य है। यह मधुके समान मधु है; जिस प्रकार एक मधुका छत्ता अनेकों मधुकरोंद्वारा तैयार किया हुआ होता है, उसी प्रकार यह पृथिवी समस्त भूतोंद्वारा तैयार की गयी है तथा समस्त भूत इस पृथिवीके मधु-कार्य हैं।<br><br>इसके सिवा इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय—चिन्मात्रप्रकाशमय और अमृतमय—अमरणधर्मा पुरुष है और जो यह अध्यात्म शारीर-शरीरमें रहनेवाला पहलेहीके समान तेजोमय और अमृतमय पुरुष है तथा लिङ्ग-देहका अभिमानी है वह भी समस्त भूतोंका उपकारक होनेसे मधु है और समस्त भूत उसके मधु हैं—यह बात [ 'यश्चायमस्याम्' इस वाक्यके ] च शब्दके सामर्थ्यसे जानी जाती है। इस प्रकार ये चारों ही एक मधु अर्थात् समस्त भूतोंके कार्य |


१. पृथिवी, समस्त भूत, पार्थिव पुरुष और शारीर पुरुष।