बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 590, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| प्रदर्शनेन, मधुब्राह्मणेन तु निदिध्यासनविधिरुच्यत इति ।<br><br>सर्वथापि तु यथा आगमेनावधारितं तर्कतस्तथैव मन्तव्यम् । यथा तर्कतो मतं तस्य तर्कागमाभ्यां निश्चितस्य तथैव निदिध्यासनं क्रियत इति पृथङ्निदिध्यासनविधिरनर्थक एव। तस्मात् पृथक्प्रकरणविभागोऽनर्थक इत्यस्मदभिप्रायः श्रवणमनननिदिध्यासनानामिति । सर्वथापि तु अध्यायद्वयस्यार्थोऽस्मिन्ब्राह्मणे उपसंह्रियते । | का निरूपण करनेके लिये है और मधुब्राह्मणके द्वारा निदिध्यासनकी विधि बतलायी जाती है ।<br><br>किंतु [ कुछ भी अर्थ किया जाय ] सभी प्रकार जैसा शास्त्रने निश्चय किया हो, वैसा ही तर्कद्वारा मनन करना चाहिये और जैसा तर्कसे मनन किया गया है उस तर्क और शास्त्रसे निश्चित किये हुए अर्थका उसी प्रकार निदिध्यासन किया जाता है, इसलिये निदिध्यासनके लिये पृथक् विधि करना निरर्थक ही है । अतः हमारा यह अभिप्राय है कि श्रवण, मनन और निदिध्यासनके प्रकरणोंका पृथक् विभाग करना व्यर्थ है । सभी तरहसे इस ब्राह्मणमें पूर्ववर्ती दोनों अध्यायोंके अर्थका उपसंहार किया जाता है । |
पृथिवी आदिमें मधुदृष्टि तथा उनके अन्तर्वर्ती पुरुषके साथ शारीर पुरुषकी अभिन्नता
इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १ ॥