भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
कत्वात्मदर्शनेन सम्पन्नो विद्वान् मृतः समवनीतप्राणो जगदात्मत्वं हिरण्यगर्भस्वरूपं वा प्राप्नुयात्, असमवनीतप्राणो भोज्याज्जीवन्नेव वा व्यावृत्तो विरक्तः परमात्मदर्शनाभिमुखः स्यात् । न चोभयम् एकप्रयत्ननिष्पाद्येन साधनेन लभ्यम् । हिरण्यगर्भप्राप्तिसाधनं चेत्, न ततो व्यावृत्तिसाधनम्। परमात्माभिमुखीकरणस्य भोज्याद् व्यावृत्तेः साधनं चेत्, न हिरण्यगर्भप्राप्तिसाधनम् । न हि यद् गतिसाधनं तद् गतिनिवृत्तेरपि ।कर्मसहित द्वैतैकत्वरूप आत्मदर्शनसे सम्पन्न हुआ विद्वान् मरनेपर प्राणोंके लीन हो जानेपर या तो जगदात्मभावको प्राप्त हो जायगा और या हिरण्यगर्भस्वरूप हो जायगा; अथवा जबतक उसके प्राणोंका लय नहीं होगा तबतक वह जीवित रहता हुआ ही भोज्यवर्गसे व्यावृत्त यानी विरक्त रहकर परमात्मदर्शनके अभिमुख होगा। दोनों फल एक ही प्रयत्नसे निष्पन्न होनेवाले साधनसे प्राप्त नहीं हो सकते। यदि वह प्रयत्न हिरण्यगर्भकी प्राप्तिका साधन होगा तो उससे व्यावृत्त होनेका साधन नहीं हो सकता; और यदि वह परमात्माके सम्मुख करने और भोज्यवर्गसे विरक्ति करानेका साधन होगा तो हिरण्यगर्भकी प्राप्तिका साधन नहीं हो सकता; क्योंकि जो गतिका साधन होता है, वही गतिकी निवृत्तिका भी साधन नहीं होता।
अथ मृत्वा हिरण्यगर्भं प्राप्य ततः समवनीतप्राणो नामावशिष्टः परमात्मज्ञानेऽधिक्रियते, ततोऽस्मदाद्यर्थं परमात्मज्ञानोपदेशोऽनर्थकः स्यात् । सर्वेषां हि ब्रह्मविद्या पुरुषार्थायोपदिश्यते—यदि कहो कि वह मरकर हिरण्यगर्भको प्राप्त होनेके पश्चात् लीनप्राण और नाममात्रावशिष्ट होकर परमात्मज्ञानका अधिकारी होता है तो हम लोगोंके लिये तो परमात्मज्ञानका उपदेश व्यर्थ ही होगा। किंतु “तद्यो यो देवानाम्” इत्यादिश्रुतिके

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७


"तद्यो यो देवानाम्" (बृ० उ० १ । ४ । १०) इत्याद्या श्रुत्या । तस्मादत्यन्तनिकृष्टा शास्त्रबाह्यैवेयं कल्पना । प्रकृतं तु वर्तयिष्यामः । तत्र केन प्रयुक्तं ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनमित्येतन्निर्दिधारयिषया आह—द्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश सभीके पुरुषार्थसाधनके लिये किया गया है । अतः यह कल्पना अत्यन्त निकृष्ट और शास्त्रविरुद्ध ही है । अब हम प्रकृत विषयका अनुसरण करेंगे । यहाँ, यह निश्चय करनेके लिये कि वह ग्रहातिग्रहरूप बन्धन किसकी प्रेरणासे प्राप्त हुआ है ? श्रुति कहती है—

याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीग्ँ शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्कायँ तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागावामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत् सजन इति । तौ होत्क्रम्य मन्त्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव यदूचतुरथ यत् प्रशशग्ँसतुः कर्म हैव तत् प्रशशग्ँसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा 'जिस समय इस मृतपुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें, चक्षु आदित्यमें, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, हृदयाकाश भूताकाशमें, लोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं तथा लोहित और वीर्य जलमें स्थापित हो जाते हैं, उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे प्रियदर्शन आर्तभाग ! तू मुझे अपना हाथ पकड़ा, हम दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेंगे; यह प्रश्न जनसमुदायमें होने योग्य नहीं है।'

६६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

तब उन दोनोंने उठकर [एकान्तमें] विचार किया। उन्होंने जो कुछ कहा वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की वह कर्मकी ही प्रशंसा की। वह यह कि पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी होता है, इसके पीछे जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
यत्रास्य पुरुषस्यासम्यग्दर्शिनः शिरःपाण्यादिमतो मृतस्य वागग्निमप्येति, वातं प्राणोऽप्येति चक्षुरादित्यमप्येतीति सर्वत्र सम्बध्यते। मनश्चन्द्रम्, दिशः श्रोत्रम्, पृथिवीं शरीरम्, आकाशमात्मेति, अत्रात्मा अधिष्ठानं हृदयाकाशमुच्यते; स आकाशमप्येति; ओषधीरपियन्ति लोमानि; वनस्पतीनपियन्ति केशाः; अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयत इति पुनरादानलिङ्गम्। <br><br> सर्वत्र हि वागादिशब्देन देवताः परिगृह्यन्ते, न तु करणा-जिस समय इस सम्यग्ज्ञानहीन शिर एवं हाथ आदि अवयवोंवाले मृत पुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है, प्राण वायुमें लीन हो जाता है और चक्षु आदित्यमें लीन हो जाता है—इस प्रकार 'अप्येति' इस क्रियापदका सर्वत्र सम्बन्ध है। इसी प्रकार मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, आत्मा आकाशमें—'आत्मा' शब्दसे यहाँ उसका आश्रयभूत हृदयाकाश कहा गया है, वह आकाशमें लीन हो जाता है—लोम ओषधिमें लीन हो जाते हैं, केश वनस्पतिमें विलुप्त हो जाते हैं और लोहित तथा शुक्र जलमें स्थापित हो जाते हैं—'निधीयते' यह क्रियापद लोहित और शुक्रके पुनर्ग्रहणको सूचित करनेवाला है [क्योंकि जो वस्तु कहीं स्थापित होती या रक्खी जाती है, उसको पुनः ग्रहण किया जा सकता है]। <br><br> यहाँ वागादिशब्दोंसे सर्वत्र देवता ही ग्रहण किये जाते हैं, मोक्ष होनेसे

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
न्येवापक्रामन्ति प्राङ्मोक्षात् तत्र । देवताभिरनधिष्ठितानि करणानि न्यस्तदात्राद्युपमानानि, विदेहश्च कर्ता पुरुषोऽस्वतन्त्रः किमाश्रितो भवति ? इति पृच्छ्यते—क्वायं तदा पुरुषो भवतीति, किमाश्रितस्तदा पुरुषो भवति ? इति यमाश्रयमाश्रित्य पुनः कार्यकरणसङ्घातमुपादत्ते, येन ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनं प्रयुज्यते, तत् किम् ? इति प्रश्नः ।पूर्व इन्द्रियोंका उच्छेद नहीं होता । उस अवस्थामें देवताओंसे अनधिष्ठित इन्द्रियाँ कर्ताके हाथसे छूटे हुए दराँत आदि औजारोंके समान हो जाती हैं, अतः अस्वतन्त्र कर्ता पुरुष देहहीन होनेपर किसके आश्रित रहता है। यही 'क्वायं तदा पुरुषो भवति' इस वाक्यसे पूछा जाता है, अर्थात् उस समय यह पुरुष किसके आश्रित रहता है ? जिस आश्रयको आश्रित करके यह पुनः कार्य-करण संघातको ग्रहण करता है और जिसकी प्रेरणासे ग्रहातिग्रहरूप बन्धन प्राप्त होता है, वह आश्रय क्या है ? ऐसा प्रश्न है ।
अत्रोच्यते--स्वभावयदॄच्छाकालकर्मदैवविज्ञानमात्रशून्यानि वादिभिः परिकल्पितानि; अतोऽनेकविप्रतिपत्तिस्थानत्वान्नैव जल्पन्यायेन वस्तुनिर्णयः । अत्र वस्तुनिर्णयं चेदिच्छसि, आहर सोम्य हस्तमार्तभाग हे, आवामेवइस विषयमें यह कहा जाता है—वादियोंने स्वभाव, यदृच्छा, काल, कर्म, दैव, विज्ञानमात्र और शून्य ऐसे अनेकों आश्रयस्थानोंकी कल्पना की है; इसलिये अनेक विरोधोंका स्थान होनेके कारण केवल जल्पन्यायसे वस्तुका निर्णय नहीं हो सकता । इस विषयमें यदि तुम वस्तुका निर्णय सुनना चाहते हो तो हे प्रियदर्शन आर्तभाग ! तुम मुझे अपना हाथ पकड़ाओ । तुम्हारे प्रश्नका जो ज्ञातव्य

१. जीतकी इच्छासे किये हुए व्यर्थ उत्तर-प्रत्युत्तर या विवादको 'जल्प' कहते हैं।

६७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| एतस्य त्वत्पृष्टस्य वेदितव्यं यत्, वेदिष्यावो निरूपयिष्यावः; कस्मात् ? न नौ आवयोरेतद्वस्तु सजने जनसमुदाये निर्णेतुं शक्यते; अत एकान्तं गमिष्यावो विचारणाय । | है, उसे हम दोनों ही मिलकर निरूपण करेंगे । क्यों ? क्योंकि हम दोनों इस वस्तुका जनसमुदायमें निर्णय नहीं कर सकते; इसलिये इसका विचार करनेके लिये एकान्तमें चलेंगे । | | तौ हेत्यादि श्रुतिवचनम्, तौ याज्ञवल्क्यार्तभागावेकान्तं गत्वा किं चक्रतुः ? इत्युच्यते—तौ होत्क्रम्य सजनाद्देशान्मन्त्रयाञ्चक्राते; आदौ लौकिकवादिपक्षाणामेकैकं परिगृह्य विचारितवन्तौ । तौ ह विचार्य यदूचतुरपोह्य पूर्वपक्षान् सर्वानैव, तच्छृणु; कर्म हैव आश्रयं पुनः पुनः कार्यकारणोपादानहेतुं तत्रोचतुरुक्तवन्तौ । न केवलम्; कालकर्मदैवेश्वरेष्वभ्युपगतेषु हेतुषु यत् प्रशंसंसतुस्तौ, कर्म हैव तत् प्रशंसंसतुः । | 'तौ ह' इत्यादि श्रुतिका वचन है; उन याज्ञवल्क्य और आर्तभागने एकान्तमें जाकर क्या किया ? सो बतलाया जाता है—उन्होंने जनसमुदाययुक्त स्थानसे निकलकर परस्पर विचार किया । पहले लौकिक वादियोंके पक्षोंमेंसे एक-एकको लेकर मीमांसा की । इस प्रकार मीमांसा कर समस्त पूर्वपक्षोंका निराकरण कर उन्होंने जो कहा, सो सुनो; वहाँ उन्होंने पुनः-पुनः कर्मको ही आश्रय अर्थात् देह और इन्द्रियोंके ग्रहणका हेतु बतलाया । इतना ही नहीं, अपितु स्वीकार किये हुए काल, कर्म, दैव, ईश्वर आदि हेतुओंमें भी उन्होंने जो प्रशंसा की वह कर्मको ही की । | | यस्मान्निर्धारितमेतत् कर्मप्रयुक्तं ग्रहातिग्रहादिकार्यकारणोपादानं पुनः पुनः, तस्मात् पुण्यो वै शास्त्रविहितेन पुण्येन कर्मणा | क्योंकि पुनः-पुनः यही निश्चय किया गया है कि ग्रहातिग्रहादिरूप कार्य-करणसंघातका ग्रहण कर्मजनित है, इसलिये पुरुष पुण्य यानी शास्त्रविहित कर्मसे पुण्य (पुण्ययोनियुक्त) |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६७१ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ६७१

भवति, तद्विपरीतेन विपरीतो भवति पापः पापेन—इत्येवं याज्ञवल्क्येन प्रश्नेषु निर्णीतेषु, ततोऽशक्यप्रकम्पत्वाद् याज्ञवल्क्यस्य, ह जारत्कारव आर्तभाग उपराम ॥ १३ ॥होता है और उससे विपरीत पापकर्मसे पापयोनियुक्त होता है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा प्रश्नोंका निर्णय हो जानेपर याज्ञवल्क्यको वादके द्वारा स्वसिद्धान्तसे विचलित करना अशक्य समझकर जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥
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इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
द्वितीयमार्तभागब्राह्मणम् ॥ २ ॥


तृतीय ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-भुज्यु-संवाद

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[पूर्ववृत्तानुवादः]
अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ । ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनमुक्तम्; यस्यात् सप्रयोजकान्मुक्तो मुच्यते, येन वा बद्धः संसरति, स मृत्युः। तस्माच्च मोक्षः उपपद्यते, यस्मान्मृत्योर्मृत्युरस्ति मुक्तस्य च न गतिः क्वचित्, सर्वोत्सादो नाममात्रावशेषः प्रदीपनिर्वाणवत्—इति चावधृतम् ।'अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ' । ग्रहातिग्रहरूप बन्धनका वर्णन किया गया। जिस सप्रयोजक बन्धनसे मुक्त हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है और जिससे बँधा होनेपर वह संसारको प्राप्त होता है, वही मृत्यु है। उससे मुक्त होना सम्भव है, क्योंकि उस मृत्युका मृत्यु भी है। और जो मुक्त है, उसका कहीं गमन नहीं होता; क्योंकि वह तो प्रदीपनिर्वाणके समान सबका उच्छेद होकर केवल नाममात्र अवशिष्ट रह जाता है—ऐसा निश्चय किया जा चुका है।

६७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| [शुभाशुभकर्मक्षये एव मोक्षसम्भवः]<br><br>तत्र संसरतां मुच्यमानानां च कार्यकारणानां स्वकारणसंसर्गे समाने मुक्तानामत्यन्तमेव पुनरनुपादानम्; संसरतां तु पुनः पुनरुपादानं येन प्रयुक्तानां भवति, तत् कर्म इत्यवधारितं विचारणापूर्वकम्। तत्तक्षये च नामावशेषेण सर्वोत्सादो मोक्षः। तच्च पुण्यपापाख्यं कर्म, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन' (बृ० उ० ३ । २ । १३) इत्यवधारितत्वात्, एतत्कृतः संसारः। | उनमें संसारबन्धनको प्राप्त और मुक्त होते हुए देह और इन्द्रियोंका अपने कारणसे संसर्ग होना समान होनेपर भी मुक्त पुरुषोंको उनका पुनः सर्वथा अग्रहण होता है; और जिसकी प्रेरणासे संसारमें आनेवाले पुरुषोंको उनका पुनर्ग्रहण होता है, वह कर्म है—ऐसा विचारपूर्वक निर्णय किया गया है। उस (कर्म) का क्षय हो जानेपर जो नाममात्र शेष रहकर बाकी सबका उच्छेद हो जाता है, उसे मोक्ष कहते हैं। वह कर्म पुण्य और पाप संज्ञावाला है; क्योंकि 'पुण्यकर्मसे पुण्यशरीरयुक्त होता है और पापकर्मसे पापशरीरयुक्त' ऐसा पहले निश्चय किया गया है; इसका किया हुआ ही संसार है। | | [मोक्षस्य पुण्यफलत्वनिरासायोत्तरब्राह्मणम्]<br><br>तत्रापुण्येन स्थावरजङ्गमेषु स्वभावदुःखबहुलेषु नरकतिर्यक्प्रेतादिषु च दुःखमनुभवति पुनः पुनर्जायमानो म्रियमाणश्चेत्येतद् राजवर्त्मवत् सर्वलोकप्रसिद्धम्। यस्तु शास्त्रीयः 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति' तत्रैवादरः क्रियत | उनमें पापकर्मसे जिनमें स्वभावतः ही दुःखकी अधिकता है, उन नरक, तिर्यक् एवं प्रेतादि स्थावरजङ्गमयोनियोंमें पुनः-पुनः जन्म और मरणको प्राप्त होता हुआ पुरुष दुःख अनुभव करता है—यह बात राजमार्गके समान समस्त जगत्में प्रसिद्ध है। यहाँ श्रुति 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति' इस वाक्यसे प्रतिपादित जो शास्त्रीय मार्ग है, उसीमें आदर करती है। पुण्यकर्म ही |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३


| इह श्रुत्या। पुण्यमेव च कर्म सर्वपुरुषार्थसाधनमिति सर्वे श्रुति-स्मृतिवादाः। मोक्षस्यापि पुरुषार्थत्वात् तत्साध्यता प्राप्ता। यावद्यावत्पुण्योत्कर्षः तावत्तावत्फलोत्कर्षप्राप्तिः; तस्मादुत्तमेन पुण्योत्कर्षेण मोक्षो भविष्यतीत्या-शङ्का स्यात्, सा निवर्तयितव्या। ज्ञानसहितस्य च प्रकृष्टस्य कर्मण एतावती गतिः, व्याकृतनाम-रूपास्पदत्वात् कर्मणस्तत्फलस्य च, न त्वकार्ये नित्येऽव्याकृत-धर्मिणि अनामरूपात्मके क्रिया-कारकफलस्वभाववर्जिते कर्मणो व्यापारोऽस्ति; यत्र च व्यापारः स संसार एवेत्यस्यार्थस्य प्रदर्श-नाय ब्राह्मणमारभ्यते। | समस्त पुरुषार्थोंका साधक है—ऐसा समस्त श्रुति-स्मृतियोंका सिद्धान्त है। अतः पुरुषार्थ होनेके कारण मोक्षका भी उस पुण्यकर्मसे साध्य होना प्राप्त होता है जितनी-जितनी पुण्यकी उत्कृष्टता होती है, उतनी-उतनी ही फलकी उत्कृष्टता प्राप्त होती है; इसलिये ऐसी आशङ्का हो सकती है कि उत्तम पुण्योत्कर्षसे मोक्ष प्राप्त होगा, सो इसकी निवृत्ति करनी चाहिये। ज्ञानसहित प्रकृष्ट कर्मकी तो इतनी (संसारमात्र) ही गति है; क्योंकि कर्म और उसके फलके आश्रय व्याकृत नाम-रूप ही हैं। जो किसी-का कार्य नहीं है, उस नित्य अव्या-कृतधर्मा, नामरूपरहित, क्रिया-कारकफलस्वभावहीन मोक्षमें कर्म-का कोई व्यापार नहीं हो सकता; और जहाँ व्यापार है, वहाँ संसार ही है—इस बातको प्रदर्शित करने-के लिये ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। | | यत्तु कैश्चिदुच्यते—विद्यासहितं<br><sub>विद्यासहितस्य</sub> कर्म निरभिसन्धि विष-कर्मण एव दध्यादिवत् कार्यान्तर- | कुछ लोगोंका जो कथन है कि फलाकाङ्क्षासे रहित होकर किया हुआ विद्यासहित कर्म विष और दधि आदिके समान कार्यान्तरका आरम्भ |

बृ० उ० ४३—

६७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ ]

६७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३ ]

| मोक्षजनकत्वमित्यनूद्य दूषयति—<br>मारभत इति; तन्न; अनारभ्यत्वान्मोक्षस्य। बन्धननाश एव हि मोक्षः; न कार्यभूतः; बन्धनं चाविद्येत्यवोचाम; अविद्यायाश्च न कर्मणा नाश उपपद्यते, दृष्टविषयत्वाच्च कर्मसामर्थ्यस्य। उत्पत्त्याप्तिविकारसंस्कारा हि कर्मसामर्थ्यस्य विषयाः। उत्पादयितुं प्रापयितुं विकर्तुं संस्कर्तुं च सामर्थ्यं कर्मणो नातो व्यतिरिक्तविषयोऽस्ति कर्मसामर्थ्यस्य, लोके अप्रसिद्धत्वात्; न च मोक्ष एषां पदार्थानामन्यतमः, अविद्यामात्रव्यवहित इत्यवोचाम। | करता है,' सो ठीक नहीं है; क्योंकि मोक्षका आरम्भ होनेवाला नहीं है। मोक्ष तो बन्धनका नाशमात्र ही है, वह किसीका कार्य नहीं है और बन्धन अविद्या है—ऐसा हम कह चुके हैं। तथा अविद्याका कर्मसे नाश होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जिनमें कर्मका सामर्थ्य है, वे विषय तो प्रत्यक्ष हैं। उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार और संस्कार ही कर्मके सामर्थ्यके विषय हैं। उत्पन्न करने, प्राप्त कराने, विकार करने और संस्कार करनेमें ही कर्मका सामर्थ्य है; कर्मके सामर्थ्यका इनसे भिन्न कोई विषय नहीं है; कारण, लोकमें कर्मके सामर्थ्यका कोई अन्य विषय प्रसिद्ध नहीं है; और इनमेंसे ही किसी एक पदार्थका नाम मोक्ष है नहीं, वह तो केवल अविद्यासे ही व्यवधानयुक्त है—ऐसा हम कह चुके हैं। | | बाढम्, भवतु केवलस्यैव कर्मण एवंस्वभावता, विद्यासंयुक्तस्य तु निरभिसन्धेः भवत्य- | पूर्व०—ठीक है, केवल कर्मका ऐसा ही स्वभाव रहे, किंतु जो ज्ञानसहित और फलाशासे रहित है, |


१. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार केवल विष और दही मृत्यु तथा ज्वरादिके कारण होते हैं किंतु औषधविशेष और शर्कराके साथ सेवन किये जानेपर वे ही आरोग्यवर्द्धक हो जाते हैं, उसी प्रकार यद्यपि केवल कर्म बन्धनका कारण है, तथापि निष्काम और ज्ञानके सहित होनेपर वही मुक्तिका कारण हो जाता है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६७५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६७५


न्यथा स्वभावः। दृष्टं ह्यन्यशक्तित्वेन निर्ज्ञातानामपि पदार्थानां विषदध्यादीनां विद्यामन्त्रशर्करादिसंयुक्तानामन्यविषये सामर्थ्यम्। तथा कर्मणोऽप्यस्त्विति चेत् ?उसका दूसरा स्वभाव है। यह बात देखी गयी है कि जो अन्य शक्तिवाले माने गये हैं, उन विष एवं दधि आदि पदार्थोंका विद्या, मन्त्र एवं शर्करादिसे संयुक्त होनेपर अन्य विषयमें सामर्थ्य हो जाता है। इसी प्रकार विद्यासहित कर्मका भी अन्य स्वभाव हो सकता है—ऐसा माना जाय तो !
न, प्रमाणाभावात्। तत्र हि कर्मण उक्तविषयव्यतिरेकेण विषयान्तरे सामर्थ्यास्तित्वे प्रमाणं न प्रत्यक्षं नानुमानं नोपमानं नार्थापत्तिर्न शब्दोऽस्ति।सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है। यहाँ कर्मके उक्त विषयोंसे भिन्न किसी अन्य विषयमें सामर्थ्य होनेका न प्रत्यक्ष प्रमाण है, न अनुमान है, न उपमान है, न अर्थापत्ति है और न शब्दप्रमाण है।
ननु फलान्तराभावे चोदनान्यथानुपपत्तिः प्रमाणमिति। न हि नित्यानां कर्मणां विश्वजिन्यायेन फलं कल्प्यते, नापि श्रुतंपूर्व०—किंतु [नित्य और निष्काम कर्मोंका मोक्षके सिवा] कोई अन्य फल न होनेपर किसी अन्य कारणसे इनकी विधिकी उपपत्ति न होना ही इसमें [अर्थापत्ति] प्रमाण है। [तात्पर्य यह है कि] नित्य-कर्मोंका विश्वजित्न्यायसे तो कोई फल कल्पना किया नहीं जाता और उनका कोई

१. 'विश्वजिता यजेत'—विश्वजित्यागसे यजन करे—इस वाक्यमें याग-कर्तव्यतारूप विधि देखी जाती है। इस विधिका कोई नियोज्य पुरुष होना चाहिये अर्थात् यह बतलाना चाहिये कि विश्वजित् यागसे कौन यजन करे। तो वहाँ 'स स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्' अर्थात् 'जहाँ किसी कर्मका कोई विशिष्ट फल न बतलाया गया हो, वहाँ उसका फल स्वर्ग ही समझना चाहिये, क्योंकि स्वर्ग सभी कर्मोंका सामान्य फल है, इस न्यायसे स्वर्गकाम (स्वर्गकी इच्छावाला) ही विश्वजित् यागका नियोज्य है—ऐसी कल्पना कर ली जायगी। यही विश्वजित्-न्याय है।

६७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| फलमस्ति; चोद्यन्ते च तानि; पारिशेष्यान्मोक्षस्तेषां फलमिति गम्यते; अन्यथा हि पुरुषा न प्रवर्तेरन् । | श्रुत फल भी है नहीं; तथा उनकी विधि है ही; इसलिये परिशेषतः मोक्ष ही उनका फल है—ऐसा जाना जाता है। नहीं तो पुरुषोंकी उनमें प्रवृत्ति ही नहीं होगी। | | ननु विश्वजिन्न्‍याय एव आयातो मोक्षस्य फलस्य कल्पितत्वात् । मोक्षे वान्यस्मिन् वा फलेऽकल्पिते पुरुषा न प्रवर्तेरन्निति मोक्षः फलं कल्प्यते श्रुतार्थापत्त्या, यथा विश्वजिति। नन्वेवं सति कथमुच्यते विश्वजिन्न्‍यायो न भवतीति । फलं च कल्प्यते विश्वजिन्न्‍यायश्च न भवतीति विप्रतिषिद्धमभिधीयते । | सिद्धान्ती— तब तो यहाँ भी विश्वजित्न्याय ही आ जाता है; क्योंकि मोक्षरूप फलकी कल्पना की गयी है। मोक्ष अथवा किसी अन्य फलकी कल्पना न करनेपर पुरुषोंकी प्रवृत्ति नहीं होगी, इसीसे विश्वजित्यागके स्वर्गरूप फलके समान यहाँ 'श्रुतार्थापत्ति'से मोक्षरूप फलकी कल्पना की जाती है। किंतु ऐसी स्थितिमें यह कैसे कहा जाता है कि यहाँ विश्वजित्न्याय नहीं है। फलकी कल्पना भी की जाती है और विश्वजित्न्याय भी नहीं है—यह कथन तो विरुद्ध है। | | मोक्षः फलमेव न भवतीति चेन्न; प्रतिज्ञाहानात्। कर्म कार्यान्तरं विषदध्यादिवदारभत इति | यदि कहो कि मोक्ष तो किसीका फल ही नहीं है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इससे तुम्हारी प्रतिज्ञा भङ्ग होती है। तुमने यह प्रतिज्ञा की है कि विष और दधि आदिके समान |


१. जहाँ कोई बात स्वीकार किये बिना किसी श्रुत अर्थमें आपत्ति या अनुपपत्ति आती हो, वहाँ उसे स्वीकार करना पड़ता है—यही श्रुतार्थापत्ति प्रमाण है। मोक्षरूप फल स्वीकार किये बिना नित्यकर्मोंमें किसीकी प्रवृत्ति न होनेसे उसकी विधि व्यर्थ हो जायगी, इसलिये श्रुतार्थापत्ति प्रमाणसे वह स्वीकार करना पड़ता है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
हि प्रतिज्ञातम्। स चेन्मोक्षः कर्मणः कार्यं फलमेव न भवतीति सा प्रतिज्ञा हीयेत। कर्मकार्यत्वे च मोक्षस्य स्वर्गादिफलेभ्यो विशेषो वक्तव्यः, अथ कर्मकार्यं न भवति, 'नित्यानां कर्मणां फलं मोक्षः' इत्यस्या वचनव्यक्तेः कोऽर्थ इति वक्तव्यम्। न च कार्यफलशब्दभेदमात्रेण विशेषः शक्यः कल्पयितुम्। अफलं च मोक्षः, नित्यैश्च कर्मभिः क्रियते; नित्यानां कर्मणां फलम्; न कार्यम्; इति चैषोऽर्थो विप्रतिषिद्धोऽभिधीयते यथाग्निः शीत इति।[नित्य और निष्काम] कर्म कार्यान्तरका आरम्भ करता है। यदि वह मोक्ष कर्मका कार्य—फल ही न हो तो वह प्रतिज्ञा भंग हो जाती है। यदि मोक्ष कर्मका कार्य है तो स्वर्गादि फलोंसे उसका भेद बतलाना चाहिये और यदि वह कर्मका कार्य नहीं है तो 'मोक्ष नित्य कर्मोंका फल है' इस वाक्यका क्या अर्थ होगा—यह बतलाना चाहिये। 'कार्य' और 'फल' शब्दोंके भेदमात्रसे ही किसी भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती। मोक्ष किसीका फल नहीं है और नित्य कर्मोंसे होता है, वह नित्य कर्मोंका फल है और कार्य नहीं है—यह सब विषय तो विरुद्ध ही कहा जाता है, जैसे कोई कहे—'अग्नि शीतल है।'
ज्ञानवदिति चेत्— यथा ज्ञानस्य कार्यं मोक्षो ज्ञानेनाक्रियमाणोऽप्युच्यते, तद्वत् कर्मकार्यत्वमिति चेत् ? न; अज्ञाननिवर्तकत्वाज्ज्ञानस्य अज्ञानव्यवधाननिवर्त-यदि कहो कि वह ज्ञानके समान उसका फल है अर्थात् जैसे ज्ञानद्वारा न किया जानेपर भी मोक्ष ज्ञानका कार्य कहा जाता है, उसी प्रकार वह कर्मका भी कार्य हो सकता है—तो यह कथन भी ठीक नहीं है; क्योंकि ज्ञान तो अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला है। ज्ञान मोक्षके अज्ञानरूप व्यवधानकी निवृत्ति करने-

६७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| कत्वाज्ज्ञानस्य मोक्षो ज्ञानकार्यमित्युपचर्यते; न तु कर्मणा निवर्तयितव्यमज्ञानम्, न चाज्ञानव्यतिरेकेण मोक्षस्य व्यवधानान्तरं कल्पयितुं शक्यम्, नित्यत्वान्मोक्षस्य साधकस्वरूपाव्यतिरेकाच्च—यत्कर्मणा निवर्त्येत। | वाला है, इसलिये उपचारसे ऐसा कहा जाता है कि मोक्ष ज्ञानका कार्य है; किंतु कर्मसे अज्ञानकी निवृत्ति हो नहीं सकती और अज्ञानके सिवा मोक्षके किसी अन्य व्यवधानकी कल्पना नहीं की जा सकती, जिसकी कि कर्मसे निवृत्ति हो; क्योंकि मोक्ष नित्य है और साधकके स्वरूपसे अभिन्न है। | | अज्ञानमेव निवर्तयतीति चेन्न, विलक्षणत्वात्। अनभिव्यक्तिरज्ञानम्, अभिव्यक्तिलक्षणेन ज्ञानेन विरुद्धयते; कर्म तु नाज्ञानेन विरुध्यते; तेन ज्ञानविलक्षणं कर्म। यदि ज्ञानाभावो यदि संशयज्ञानं यदि विपरीतज्ञानं वोच्यतेऽज्ञानमिति, सर्वं हि तज्ज्ञानेनैव निवर्त्यते, न तु कर्मणा, अन्यतमेनापि विरोधाभावात्। | यदि कहो कि कर्म भी अज्ञानकी ही निवृत्ति करता है तो यह ठीक नहीं; क्योंकि कर्म ज्ञानसे विलक्षण है। अज्ञान अप्रकाशरूप है, वह प्रकाशरूप ज्ञानका ही विरोधी है, कर्मका अज्ञानसे विरोध नहीं है; इसलिये कर्म ज्ञानसे विलक्षण है। यदि ज्ञानाभावको, संशयज्ञानको अथवा विपरीत ज्ञानको अज्ञान कहा जाय तो इन सभीकी निवृत्ति ज्ञानसे ही हो सकती है; किसी भी कर्मसे नहीं हो सकती, क्योंकि उसका [इनमेंसे किसी भी प्रकारके] अज्ञानके साथ विरोध नहीं है। | | अथादृष्टं कर्मणामज्ञाननिवर्तकत्वं कल्प्यमिति चेन्न, ज्ञानेन अज्ञाननिवृत्तौ गम्यमानायाम् | यदि कहो कि कर्मोंका अज्ञाननिवर्तकत्व—यह अदृष्ट फल है ऐसी कल्पना कर लेनी चाहिये तो ठीक नहीं, क्योंकि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ६७९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ६७९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अदृष्टनिवृत्तिकल्पनानुपपत्तेः । यथा अवघातेन व्रीहीणां तुषनिवृत्तौ गम्यमानायाम् अग्निहोत्रादिनित्यकर्मकार्या अदृष्टा न कल्प्यते तुषनिवृत्तिः। तद्वदज्ञाननिवृत्तिरपि नित्यकर्मकार्या अदृष्टा न कल्प्यते । ज्ञानेन विरुद्धत्वं चासकृत् कर्मणामवोचाम। यदविरुद्धं ज्ञानं कर्मभिस्तद्देवलोकप्राप्तिनिमित्तमित्युक्तम्; "विद्यया देवलोकः" (१।५।१६) इति श्रुतेः।जब साक्षात् अनुभव होती है, तो अदृष्टफलके रूपमें निवृत्तिकी कल्पना करनी उपयुक्त नहीं है। जिस प्रकार [ मुसलसे ] कूटनेपर धानके तुषकी निवृत्ति होती है—यह स्पष्टतया ज्ञात होनेपर ऐसी कल्पना नहीं की जाती कि वह अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका अदृष्ट कार्य है। इसी प्रकार अज्ञाननिवृत्ति भी नित्यकर्मोंका कार्य एवं अदृष्ट फल है—ऐसी कल्पना नहीं की जाती। ज्ञानसे कर्मोंका विरोध है—यह तो हम अनेकों बार कह चुके हैं। जो ज्ञान कर्मोंसे अविरुद्ध है, वह तो "विद्यासे देवलोककी प्राप्ति होती है" इस श्रुतिके अनुसार देवलोककी प्राप्तिका कारण है—ऐसा पहले बतलाया गया है।
किञ्चान्यत्, कल्प्ये च फले नित्यानां कर्मणां श्रुतानां यत् कर्मभिर्विरुध्यते द्रव्यगुणकर्मणां कार्यमेव न भवति, किं तत् कल्प्यताम्, यस्मिन् कर्मणः सामर्थ्यमेव न दृष्टम् ? किं वा यस्मिन् दृष्टं सामर्थ्यम्, यच्च कर्मणां फलम् अविरुद्धम्, तत् कल्प्यताम् ? इति । पुरुषप्रवृत्तिजननायावश्यंइसके सिवा, यदि श्रुति-प्रतिपादित नित्य कर्मोंके फलकी कल्पना करनी ही है तो जो कर्मोंसे विरुद्ध स्वभाववाला है—जो द्रव्य, गुण और कर्मोंका कार्य ही नहीं हो सकता तथा जिसमें कर्मका सामर्थ्य ही नहीं देखा गया, क्या उसीकी कल्पना करनी चाहिये अथवा जिसमें कर्मोंका सामर्थ्य देखा गया है तथा जो कर्मोंका अविरुद्ध फल है, उसकी कल्पना की जाय ? यदि पुरुषोंकी प्रवृत्ति करानेके लिये कर्मफलकी

६८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
चेत् कर्मफलं कल्पयितव्यम्, कर्माविरुद्धविषय एव श्रुतार्थापत्तेः क्षीणत्वान्नित्यो मोक्षः फलं कल्पयितुं न शक्यः, तद्व्यवधानाज्ञाननिवृत्तिर्वा; अविरुद्धत्वाद् दृष्टसामर्थ्यविषयत्वाच्चेति ।कल्पना करनी आवश्यक ही है तो श्रुतार्थापत्तिका पर्यवसान कर्मके अविरोधी विषयों (उत्पत्ति, आप्ति, संस्कार और विकार) में ही होनेके कारण उन्हींकी कल्पना करनी चाहिये, नित्य मोक्ष अथवा मोक्षके व्यवधानभूत अज्ञानकी निवृत्ति—ये कर्मोंके फलरूपसे कल्पना नहीं किये जा सकते; क्योंकि कर्म और अज्ञानका अविरोध है और जिन (उत्पत्ति आदि) में उनका सामर्थ्य देखा गया है, वे ही उनके विषय हैं।
पारिशेष्यन्यायान्मोक्ष एव कल्पयितव्य इति चेत्—सर्वेषां हि कर्मणां सर्वं फलम्, न चान्यदितरकर्मफलव्यतिरेकेण फलं कल्पनायोग्यमस्ति; परिशिष्टश्च मोक्षः, स चेष्टो वेदविदां फलम्; तस्मात् स एव कल्पयितव्य इति चेत् ?पूर्व०—पारिशेष्यन्यायसे मोक्षको ही नित्यकर्मोंका फल मानना चाहिये—ऐसा कहें तो ? तात्पर्य यह है कि सब कुछ समस्त कर्मोंका ही फल है, नित्य कर्मोंके सिवा अन्य जितने कर्म हैं, उनके फलोंसे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु नहीं है, जो नित्य कर्मोंके फलरूपसे कल्पना किये जानेयोग्य हो; ऐसा तो केवल मोक्ष ही अवशिष्ट रहता है, अतः वेदवेत्ताओंको वही उसका फल इष्ट है; इसलिये उसीकी उसके फलरूपसे कल्पना करनी चाहिये—यदि ऐसा मानें तो ?
न, कर्मफलव्यक्तीनाम् आनन्त्यात्पारिशेष्यन्यायानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती—यह ठीक नहीं है, क्योंकि कर्मफलकी व्यक्तियाँ तो अनन्त हैं, इसलिये उनमें पारिशेष्य-न्याय लगाना उचित नहीं है।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८१

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८१


| न हि पुरुषेच्छाविषयाणां कर्मफलानामेतावत्त्वं नाम केनचिद् असर्वज्ञेनावधृतम्, तत्साधनानां वा पुरुषेच्छानां वा अनियतदेशकालनिमित्तत्वात्, पुरुषेच्छाविषयसाधनानां च पुरुषेष्टफलप्रयुक्तत्वात् । प्रतिप्राणि चेच्छावैचित्र्यात् फलानां तत्साधनानां चानन्त्यसिद्धिः। तदानन्त्याच्चाशक्यमेतावत्त्वं पुरुषैर्ज्ञातुम् । अज्ञाते च साधनफलैतावत्त्वे कथं मोक्षस्य परिशेषसिद्धिरिति । | पुरुषकी इच्छाके विषयभूत कर्मफलोंकी इयत्ताका किसी भी असर्वज्ञ जीवने निश्चय नहीं किया; क्योंकि उनके साधन अथवा पुरुषकी इच्छाओंके देश, काल और निमित्त नियत नहीं हैं; कारण, वे पुरुषकी इच्छाके विषय और उनके साधन पुरुषके इष्ट फलोंद्वारा प्रेरित हैं। अतः प्रत्येक प्राणीकी इच्छाओंमें विचित्रता रहनेके कारण उनके साधन और फलोंकी अनन्तताकी भी सिद्धि होती है। उनकी अनन्तता होनेके कारण पुरुषोंको उनकी इयत्ताका ज्ञान होना असम्भव है तथा साधन और फलोंकी इयत्ताका ज्ञान न होनेपर मोक्षकी परिशेषता कैसे सिद्ध हो सकती है ? | | कर्मफलजातिपारिशेष्यमिति चेत् — सत्यपि इच्छाविषयाणां तत्साधनानां चानन्त्ये, कर्मफलजातित्वं नाम सर्वेषां तुल्यम् । मोक्षस्त्वकर्मफलत्वात् परिशिष्टः स्यात्। तस्मात् परिशेषात् स एव युक्तः कल्पयितुमिति चेत् ? | पूर्व०—कर्मफलोंकी जातिकी परिशेषता तो सिद्ध हो ही सकती है ? इच्छाके विषय और उनके साधन अनन्त होनेपर भी उन सबमें कर्मफलजातित्व तो समान ही है किंतु मोक्ष कर्मफल है नहीं, अतः वही अवशिष्ट होना चाहिये; इसलिये परिशेषतः उसीको नित्य कर्मोंका फल कल्पना करना उचित है—यदि ऐसा मानें तो ? |

६८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

६८२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| न, तस्यापि नित्यकर्मफलत्वाभ्युपगमे कर्मफलसमानजातीयत्वोपपत्तेः परिशेषानुपपत्तिः ।<br><br>तस्मादन्यथाप्युपपत्तेः क्षीणा श्रुतार्थापत्तिः । उत्पत्त्याप्तिविकारसंस्काराणामन्यतममपि नित्यानां कर्मणां फलमुपपद्यत इति क्षीणा श्रुतार्थापत्तिः । | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि यदि उसे भी नित्य कर्मोंका फल माना जायगा तो उसमें भी कर्मफलसे सजातीयताकी उपपत्ति होनेसे परिशेषकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। इससे भिन्न प्रकारसे भी नित्यकर्मोंके फलकी उपपत्ति हो सकती है, इसलिये वहीं यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है। तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति, आप्ति, विकार और संस्कारोंमेंसे कोई भी नित्यकर्मोंका फल हो सकता है, इसलिये उन्हींमें यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है। | | चतुर्णामन्यतम एव मोक्ष इति चेत् ? | पूर्व०—यदि ऐसा मानें कि मोक्ष भी इन चारोंमेंसे ही कोई एक है तो ? | | न तावदुत्पाद्यो नित्यत्वात्, अत एवाविकार्यः, असंस्कार्यश्चात एवासाधनद्रव्यात्मकत्वाच्च, साधनात्थकं हि द्रव्यं संस्क्रियते, यथा पात्राज्यादि प्रोक्षणादिना न च संस्क्रियमाणः, संस्कारनिर्वर्त्यो वा यूपा- | सिद्धान्ती—नहीं, वह नित्य है, इसलिये उत्पाद्य नहीं हो सकता और इसी कारण विकार्य भी नहीं हो सकता और इसी कारणसे तथा साधनात्मक द्रव्य न होनेसे संस्कार्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि संस्कार साधनात्मक द्रव्यका ही होता है, जैसे प्रोक्षणादिसे पात्र और घृत आदि। मोक्ष न तो संस्कृत किया जानेवाला है और न यूपादि-के समान संस्कारद्वारा निष्पन्न होने- |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (शाङ्करभाष्यार्थ)
दिवत्। परिशेष्यादाप्यः स्यात्, नाप्योऽपि, आत्मस्वभावत्वादेकत्वाच्च।वाला है। परिशेषतः आप्य हो सकता है, सो आत्माका स्वभाव और एकमात्र होनेके कारण आप्य भी नहीं है।
इतरैः कर्माभिर्वैलक्षण्यान्नित्यानां कर्मणां तत्फलेनापि विलक्षणेन भवितव्यमिति चेत् ?पूर्व०-किंतु नित्य कर्म अन्य कर्मोंसे विलक्षण हैं, इसलिये उनका फल भी विलक्षण ही होना चाहिये।
न, कर्मत्वसालक्षण्यात् सलक्षणं कस्मात् फलं न भवतीतरकर्मफलैः ?सिद्धान्ती-नहीं, कर्मत्वमें तो वे समान लक्षणवाले हैं, फिर उसका फल भी अन्य कर्मफलोंके समान लक्षणोंवाला ही क्यों न होगा ?
निमित्तवैलक्षण्यादिति चेत् ?पूर्व०-यदि कहें, अन्य कर्मोंसे निमित्तमें विलक्षणता होनेके कारण तो फलमें विलक्षणता होनी ही चाहिये तो ?
न, क्षामवत्यादिभिः समानत्वात्; यथा हि गृहदाहादौ निमित्ते क्षामवत्यादीष्टिः, यथा भिन्ने जुहोति स्कन्ने जुहोतीत्येवमादौ नैमित्तिकेषु कर्मसु न मोक्षः फलं कल्प्यते, तैश्चाविशेषान्नमित्तिकत्वेन, जीवनादिनिमित्ते च श्रवणात्, तथा नित्यानामपि न मोक्षः फलम्। आलो-सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि क्षामवती आदि इष्टियोंसे इनकी समानता है; जिस प्रकार गृहदाहादि निमित्त होनेपर क्षामवती आदि इष्टियोंका विधान है और जैसे 'भिन्ने जुहोति' 'स्कन्ने जुहोति' इत्यादि विधियोंमें भेदन और स्कन्दनके प्रायश्चित्तरूपसे किये हुए नैमित्तिक कर्मोंका फल मोक्ष नहीं कल्पना किया जा सकता, क्योंकि नैमित्तिकत्वमें ये भी उनके समान ही हैं, कारण, श्रुति जीवनादि निमित्तसे इनका विधान करती है, इसी प्रकार नित्य कर्मोंका फल भी मोक्ष नहीं हो सकता। प्रकाश

६८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

६८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

| कस्य सर्वेषां रूपदर्शनसाधनत्वे उलूकादय आलोकेन रूपं न पश्यन्तीत्युलूकादिचक्षुषो वैलक्षण्यादितरलोकचक्षुर्भिनं रसादि-विषयत्वं परिकल्प्यते; रसादि-विषये सामर्थ्यस्यादृष्टत्वात्। सुदूरमपि गत्वा यद्विषये दृष्टं सामर्थ्यं तत्रैव कश्चित् विशेषः कल्पयितव्यः।<br><br>यत् पुनरुक्तं विद्यामन्त्रशर्करा-दिसंयुक्तविषदध्यादिवन्नित्यानि कार्यान्तरमारभन्त इति; आर-भ्यतां विशिष्टं कार्यं तदिष्टत्वाद-विरोधः। निरभिसन्धेः कर्मणो विद्यासंयुक्तस्य विशिष्टकार्यान्त-रारम्भे न कश्चिद् विरोधः। देवयाज्यात्मयाजिनोरात्मयाजिनो विशेषश्रवणात् "देवयाजिनः श्रेयानात्मयाजी" इत्यादौ "यदेव | सबके लिये रूपदर्शनका साधन है, तथापि उल्लू आदिको प्रकाशसे रूपकी उपलब्धि नहीं होती; इस प्रकार उल्लूकी दृष्टिमें अन्य जीवोंकी दृष्टिसे विलक्षणता होनेसे भी उसका विषय रसादि नहीं कल्पना किया जाता; क्योंकि रसादि विषयमें नेत्रका सामर्थ्य नहीं देखा जाता। बहुत दूर जाकर भी जिस विषयमें जिसका सामर्थ्य देखा जाता है, उसीमें कुछ विशेषकी कल्पना करनी चाहिये; [सर्वथा विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है]।<br><br>और ऐसा जो कहा कि विद्या, मन्त्र एवं शर्करादियुक्त विष और दधि आदिके समान नित्यकर्म किसी अन्य कार्यका आरम्भ करते हैं, सो वे भले ही किसी विशिष्ट कार्यका आरम्भ करें, वह इष्ट होनेके कारण उससे हमारा कोई विरोध नहीं है। फलाशारहित विद्यासंयुक्त कर्मके विशिष्ट कार्यान्तर आरम्भ करनेमें हमारा कोई विरोध नहीं है; क्योंकि "देवयाजीसे आत्मयाजी श्रेष्ठ है" तथा "जो भी विद्यासे करता है वह बलवत्तर होता है" इत्यादि |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विद्यया करोति” (छा० उ० १ । १ । १०) इत्यादौ च ।<br><br>यस्तु परमात्मदर्शनविषये मनुनोक्त आत्मयाजिशब्दः “समं पश्यन्नात्मयाजी” (मनु० १२ । ९१) इत्यत्र, समं पश्यन्नात्मयाजी भवतीत्यर्थः, अथवा भूतपूर्वगत्या । आत्मयाजी आत्मसंस्कारार्थं नित्यानि कर्माणि करोति “इदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियते” इति श्रुतेः । तथा “गार्भैर्होमैः” इत्यादिप्रकरणे कार्यकरणसंस्कारार्थत्वं नित्यानां कर्मणां दर्शयति । संस्कृतश्च य आत्मयाजी तैः कर्मभिः समं द्रष्टुं समर्थो भवति । तस्येह वा जन्मान्तरे वा सममात्मदर्शनमुत्पद्यते । समं पश्यन् स्वाराज्यमधिगच्छतीत्येषोऽर्थः । आत्मयाजिशब्दस्तु भूतपूर्वगत्या प्रयुज्यते, ज्ञानयुक्तानां नित्यानां कर्मणां ज्ञानोत्पत्तिसाधनत्वप्रदर्शनार्थम् ।वाक्योंमें देवयाजी और आत्मयाजियोंमें आत्मयाजी विशेष सुना गया है ।<br><br>मनुजीने जो “समं पश्यन्नात्मयाजी” इत्यादि वाक्यमें ‘आत्मयाजी’ शब्दका परमात्मदर्शनके विषयमें प्रयोग किया है, उसका तात्पर्य तो यह है कि समस्त भूतोंमें समदृष्टि रखनेवाला आत्मयाजी है, अथवा वहाँ भूतपूर्व गतिसे इसका प्रयोग हो सकता है । “इसके द्वारा मेरा यह अङ्ग संस्कारयुक्त होता है” इस श्रुतिके अनुसार आत्मयाजी आत्माके संस्कारके लिये नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है तथा “गर्भसम्बन्धी होमोंसे [ बीजगत पाप निवृत्त होते हैं ]” इत्यादि प्रकरणमें भी नित्य कर्मोंका प्रयोजन देहेन्द्रियसंघातका संस्कार दिखाया गया है । जो आत्मयाजी उन कर्मोंसे संस्कृत हो गया है, वही समदर्शनमें समर्थ होता है । उसको ही इस जन्ममें या जन्मान्तरमें सम आत्मदर्शन होना सम्भव है । इसका अर्थ यह है कि समदर्शन करनेवाला पुरुष स्वाराज्य प्राप्त कर लेता है । यहाँ ‘आत्मयाजी’ शब्दका प्रयोग तो ज्ञानयुक्त नित्य कर्मोंको ज्ञानोत्पत्तिकी साधनता प्रदर्शित करनेके लिये भूतपूर्व गतिसे किया जाता है ।