भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 688, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 688
६७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| कत्वाज्ज्ञानस्य मोक्षो ज्ञानकार्यमित्युपचर्यते; न तु कर्मणा निवर्तयितव्यमज्ञानम्, न चाज्ञानव्यतिरेकेण मोक्षस्य व्यवधानान्तरं कल्पयितुं शक्यम्, नित्यत्वान्मोक्षस्य साधकस्वरूपाव्यतिरेकाच्च—यत्कर्मणा निवर्त्येत। | वाला है, इसलिये उपचारसे ऐसा कहा जाता है कि मोक्ष ज्ञानका कार्य है; किंतु कर्मसे अज्ञानकी निवृत्ति हो नहीं सकती और अज्ञानके सिवा मोक्षके किसी अन्य व्यवधानकी कल्पना नहीं की जा सकती, जिसकी कि कर्मसे निवृत्ति हो; क्योंकि मोक्ष नित्य है और साधकके स्वरूपसे अभिन्न है। | | अज्ञानमेव निवर्तयतीति चेन्न, विलक्षणत्वात्। अनभिव्यक्तिरज्ञानम्, अभिव्यक्तिलक्षणेन ज्ञानेन विरुद्धयते; कर्म तु नाज्ञानेन विरुध्यते; तेन ज्ञानविलक्षणं कर्म। यदि ज्ञानाभावो यदि संशयज्ञानं यदि विपरीतज्ञानं वोच्यतेऽज्ञानमिति, सर्वं हि तज्ज्ञानेनैव निवर्त्यते, न तु कर्मणा, अन्यतमेनापि विरोधाभावात्। | यदि कहो कि कर्म भी अज्ञानकी ही निवृत्ति करता है तो यह ठीक नहीं; क्योंकि कर्म ज्ञानसे विलक्षण है। अज्ञान अप्रकाशरूप है, वह प्रकाशरूप ज्ञानका ही विरोधी है, कर्मका अज्ञानसे विरोध नहीं है; इसलिये कर्म ज्ञानसे विलक्षण है। यदि ज्ञानाभावको, संशयज्ञानको अथवा विपरीत ज्ञानको अज्ञान कहा जाय तो इन सभीकी निवृत्ति ज्ञानसे ही हो सकती है; किसी भी कर्मसे नहीं हो सकती, क्योंकि उसका [इनमेंसे किसी भी प्रकारके] अज्ञानके साथ विरोध नहीं है। | | अथादृष्टं कर्मणामज्ञाननिवर्तकत्वं कल्प्यमिति चेन्न, ज्ञानेन अज्ञाननिवृत्तौ गम्यमानायाम् | यदि कहो कि कर्मोंका अज्ञाननिवर्तकत्व—यह अदृष्ट फल है ऐसी कल्पना कर लेनी चाहिये तो ठीक नहीं, क्योंकि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति |